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पितृ पक्ष:आज आखिरी दिन, अज्ञात पितरों का करें श्राद्ध और कुतुब काल में करें तर्पण

रायपुर10 दिन पहले
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पितृ पक्ष का आखिरी तर्पण गुरुवार को दिया जाएगा। इस दिन शुभ योग है। साथ ही विश्वकर्मा जयंती भी इसी दिन मनाई जाएगी। पितृ पक्ष का आखिरी दिन सर्वपितृ अमावस्या का होता है। मान्यता ऐसी है कि इस दिन श्राद्ध पक्ष का समापन होता है और पितृ लोक से आए हुए पितृजन अपने लोक को लौट जाते हैं। इस दिन ब्राह्मण भोजन और दान आदि से पितृजन तृप्त होते हैं और जाते समय अपने पुत्र, पौत्रों और परिवार को आशीर्वाद देते हैं। इस दिन अज्ञात पितरों का श्राद्ध किया जाता है, साथ ही उन्हें विदा भी किया जाता है। इसके साथ ही शुभ मुहूर्त शुरू होता है। वहीं इस बार ऐसा नहीं है, इसके अगले ही दिन से अधिकमास शुरू हो जाएगा। इस अवधि में विवाह, प्राण-प्रतिष्ठा, स्थापना, मुंडन आदि नहीं होगा। जबकि इस दौरान पूजा-पाठ करने से दोगुना फल मिलता है। ज्योतिषाचार्य डॉ. दत्तात्रेय होस्केरे बताते है कि गुरुवार को पितृ पक्ष का आखिरी दिन है। इस दिन पितरों को विदाई दी जाती है। साथ ही इसी दिन अज्ञात पितरों काे तर्पण दिया जाता है। इसमें 6वीं-7वीं पीढ़ी के पूर्वज शामिल है, जिनकी तिथि का ज्ञान हमें नहीं होता है। किसी कारण से पितृपक्ष की सभी तिथियों पर पितरों का श्राद्ध चूक जाएं या पितरों की तिथि याद न हो तब इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। इस सर्वपितृमोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है। इस तर्पण को कुतुब काल में करें, जो कि सुबह 11.36 से दोपहर 12.24 बजे तक रहेगी। इस समय तर्पण देना शुभ माना जाता है। वहीं 165 वर्ष बाद ऐसा संयोग है कि पितृ पक्ष के एक महीने बाद नवरात्रि 17 अक्टूबर हो शुरू होगी। जिसमें कि अधिकमास 16 अक्टूबर तक चलेगा।

श्राद्ध पक्ष में कष्टों से मिलती है मुक्ति
असाध्य और पारिवारिक अशांति का कारण पितृ दोष को माना गया है। संतान संबंधी समस्या जैसे विवाह न होना, विकृति होना, रोजगार न मिलना और मानसिक समस्या का होना आदि पितृ दोष के कारण ही उत्पन्न होते हैं। पितृ पक्ष में पितराें को प्रतिदिन तर्पण देने के साथ ही एक निर्दिष्ट प्रक्रिया का पालन किया जाए तो, इन सभी समस्याओं से मुक्ति अवश्य मिलती है।

पितृलोक जाने में आत्मा को लगता है समय
मान्यता ऐसी है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति जब देह छोड़ता है तो जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति की स्थिति अनुसार तीन दिन के भीतर वह पितृलोक चला जाता है। कुछ आत्माएं तेरह दिन में पितृलोक चली जाती हैं, इसीलिए त्रयोदशाकर्म किया जाता है और कुछ सवा माह अर्थात सैंतीसवें या चालीसवें दिन। फिर एक वर्ष के बाद तर्पण किया जाता है। पितृलोक के बाद उन्हें फिर धरती पर कर्मानुसार जन्म मिलता है या वे सदाचरण और सन्मार्गी रहे हैं, तो वे जन्म-मरण के चक्र से मु‍क्त हो जाती हैं।

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