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रायपुर को मिली हाईटेक लैब:वीडियो-फोटो की जांच के लिए चार-चार महीने का इंतजार खत्म, अब राजधानी में ही 15 दिन में रिपोर्ट

रायपुर8 दिन पहले
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  • हाईटेक फोरेंसिक जांच के लिए हैदराबाद, कोलकाता और भोपाल पर निर्भरता खत्म

राजधानी में अब पुलिस समेत जांच एजेंसियों को बड़े मामलों की हाईटेक फोरेंसिक जांच के लिए हैदराबाद, चंडीगढ़, कोलकाता और भोपाल पर निर्भर नहीं रहना होगा। इस वजह से कई महत्वपूर्ण मामलों की जांच रुक जाती थी और रिपोर्ट के लिए चार-चार माह तक इंतजार करना पड़ता था। अब यहां की फोरेंसिंक लैब में इसी हफ्ते से हाईटेक इमेज आइडेंटिफिकेशन और वीडियो ऑथेंटिकेशन जैसी जांच शुरू कर दी गई हैं।

साइबर क्राइम में इस समय टैंपर्ड वीडियो और फोटो की शिकायतें बड़ी संख्या में हैं। साइबर क्रिमिनल इनके जरिए लोगों को परेशान भी कर रहे हैं और कार्रवाई के लिए पुलिस को भी इंतजार करना पड़ रहा है क्योंकि दूसरे शहरों से रिपोर्ट आने में समय लगता है। अब जांच यही होगी, इसलिए साइबर क्रिमिनल पर काबू करना पुलिस के लिए ज्यादा आसान हो जाएगा। फोरेंसिक लैब के लिए शासन ने महंगे और हाईटेक साफ्टवेयर खरीदे हैं। इस सिस्टम के जरिए टैंपर्ड वीडियो से जुड़े दो मामलों की जांच भी शुरू कर दी गई है। यह सिस्टम किसी भी फोटो, वीडियाे, सीसीटीवी फुटेज या क्लिपिंग की सत्यता की जांच कर सकता है। यह तुरंत बताया जा सकता है कि फोटो या वीडियो से किस तरह की छेड़छाड़ हुई या नहीं।

यह भी कि किसी फोटो का वीडियो में दूसरे का चेहरा जोड़ा गया या नहीं और इसे कितने लोगों को शेयर किया गया वगैरह? इसके अलावा धुंधले फुटेज में भी नई टेकनालाॅजी से चेहरे या घटनास्थल को आइडेंटिफाई करना आसान होगा। दरअसल राजधानी में सोशल मीडिया में रोजाना ऐसे वीडियो-फोटो वायरल हो रहे हैं, जिनसे किसी न किसी की छवि खराब करने की कोशिश की जा रही है।

एसएसपी अजय यादव के अनुसार वीडियो-फोटो की हाईटेक जांच शुरू होने से किसी भी मामले की पड़ताल में समय नहीं लगेगा। पुलिस को जल्द से जल्द रिपोर्ट मिल जाएगी। इससे पुलिस का समय और श्रम दोनों की बचत होगी। क्योंकि अब तक इस तरह की जांच के लिए ज्यादातर हैदराबाद और चंडीगढ़ की फोरेंसिक लैब भेजा जाता था। जहां जांच के लिए नंबर लगाना पड़ता था। वहां से रिपोर्ट आने में भी समय लगता था। जब तक रिपोर्ट नहीं मिली, तब तक जांच को रोकना पड़ता था।

स्पीकर आइडेंटिफिकेशन भी
राज्य में पिछले साल सितंबर से स्पीकर आइडेंटिफिकेशन और ऑथेंटिकेशन जांच शुरू हुई है। इसमें किसी भी ऑडियो-वीडियो की आवाज की जांच की जाती है। इससे पहले वाइस सैंपल की जांच के लिए ज्यादातर चंडीगढ जाना पड़ता था। वहां से रिपोर्ट आने में भी 2-3 महीने लग जाता था, लेकिन अब फोन या किसी भी माध्यम से रिकार्ड की गई आवाज की जांच यहीं होगी। राजधानी में ही सालभर में ऐसे 25 से ज्यादा मामले आ रहे हैं, जिनमें इस तरह की जांच की जरूरत पड़ रही है।

4 साल में 613 डीएनए टेस्ट
राज्य फोरेंसिक लैब में 2016 में डीएनए टेस्ट करने वाली मशीन खरीदी गई थी। पिछले 4 साल में राज्य फोरेंसिक लैब में 613 डीएनए टेस्ट हो चुके हैं। इसकी रिपोर्ट 10-12 दिन आ जाती है, जो पहले 3 महीने में मिलती थी। ज्यादातर दुष्कर्म, हत्या या लावारिस लाश के मामलों में डीएनए टेस्ट की जरूरत होती हैं। अब डीएनए के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता हैं।

हर वायरल का सच
सोशल मीडिया में रोज तरह के वीडियो और फोटो वायरल हो रहे हैं। दो दिन पहले ही एक फोटो वायरल हुआ था, जिसकी जांच में साफ हो गया कि यह फर्जी है। इसकी जांच भी चल रही है। दो साल पहले राज्य में सीडी क केस भी आया था, जिसकी जांच चंडीगढ़ लैब और भोपाल लैब में हुई थी और रिपोर्ट चार महीने बाद आई। इस तरह के कई मामले हैं, जिनमें जांच रिपोर्ट तुरंत आने से पीड़ितों को राहत मिलेगी।

"फोरेंसिक लैब को देश की दूसरी हाईटेक लैब की तरह डेवलप कर रहे हैं। अब वीडियो-फोटो की जांच की सुविधा शुरू की गई है। आने वाले कुछ महीने में कई और हाईटेक जांच शुरू कर देंगे।"
-प्रदीप गुप्ता, डायरेक्टर राज्य फोरेंसिक लैब

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