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आत्मनिर्भरता:25 एकड़ में लगाई कोसा फल की बाड़ी सब्जी बेचकर कमाए एक लाख रुपए

जांजगीर5 महीने पहले
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  • लॉकडाउन में रोजी-रोटी की समस्या हुई तो कोसा फल और सब्जी उगाकर महिलाएं बनी सक्षम

महुदा की महिलाओं ने लॉकडाउन से अनलॉक की अवधि के दौरान रोजी-रोटी की समस्या उत्पन्न होने पर हार नहीं मानी और अपने मजबूत इरादों तथा दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत आर्थिक रूप से सक्षम भी बनीं। महिलाओं ने 25 एकड़ में कोसा फल की बाड़ी लगाई और सब्जी बेचकर 1 लाख रुपए की कमाई भी की। मनरेगा मद से रेशम विभाग उन्होंने अर्जुन पौधरोपण में कोसाफल तथा अंतरवर्तीय सब्जी उत्पादन करके स्वयं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाया। जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर ग्राम पंचायत महुदा (च) की मां कंकाली महिला स्व सहायता समूह की महिलाएं कोरोना के संक्रमण काल की विषम परिस्थितियों में रेशम विभाग से कृमिपालन एवं कोसाफल उत्पादन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। जुलाई से अर्जुन के पेड़ों पर कृमि पालन का कार्य कर रही हैं। समूह की महिलाओं ने 45 दिनों की मेहनत, लगन और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने 35 हजार कोसा फल का उत्पादन किया और व्यापारियों को 70 हजार का कोसाफल बेचा। वहीं प्रक्षेत्र के एक हिस्से में आलू, टमाटर, प्याज, लहसुन, मक्का, मूंग, पालक, लालभाजी, धनिया, मिर्ची के अलावा पपीता इत्यादि का उत्पादन करके, उन्हें आस-पास के स्थानीय बाजार में बेचा भी। इससे उन्हें अब तक एक लाख रुपए से अधिक की आमदनी भी हो चुकी है।

अनुपयोगी जमीन को बनाया उपयोगी
महुदा (च) की लगभग 25 एकड़ भूमि वीरान और अनुपयोगी थी। यहां पंचायत की पहल पर करीब चार साल पहले रेशम विभाग ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना अंतर्गत 6 लाख 60 हजार रुपए की प्रशासकीय स्वीकृति से टसर पौधरोपण कराया था। इसमें 41 हजार पौधे लगाए गए। इन चार सालों में अर्जुन के पौधे पर अब 6 से 8 फीट के हरे-भरे पेड़ बन गए हैं। यहां भूमिगत जल की वृद्धि के लिए महात्मा गांधी नरेगा से साल 2020-21 में 5.54 लाख रुपए की लागत से पौधों के निकट 6 हजार 220 गड्ढे खोदे गए हैं। इस कार्य में मनरेगा श्रमिकों को 2 हजार 490 मानव दिवस का सीधा रोजगार प्राप्त हुआ है। जिससे लोगों को राेजगार के साथ ही स्वरोजगार के अवसर बढ़े।

लॉकडाउन में काम बंद था तो बाड़ी में लगाई सब्जी
समूह की अध्यक्ष शांति बाई बरेठ ने बताया कि लॉकडाउन में सब काम बंद हो गया था, जिसके बाद यहां अर्जुन के लगे पेड़ों के बीच की खाली जगह को देखकर सब्जी उगाने का फैसला लिया। कोरोनाकाल की शुरुआत में क्षेत्र के साप्ताहिक बाजारों में रोक होने से सब्जियों के दाम लगातार बढ़ रहे थे। ऐसे में गांव के गरीब लोगों को सब्जियां खरीदने में काफी दिक्कत हो रही थी।

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