अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:दिव्यांगता को भूल लड़कियों ने ऐसा प्रोफेशन चुना जिसे माना जाता है पुरुषों के लायक काम

जांजगीर9 महीने पहले
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  • महिला नेतृत्व, काेविड 19 की दुनिया में एक समान भविष्य को प्राप्त करना

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी नींव 1908 में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में रखी गई थी। तब वहां की महिलाओं ने आंदोलन किया था। बेहतर वेतन, मतदान का अधिकार, आठ घंटे ड्यूटी आदि को लेकर। 1910 में महिला दिवस के रूप में इस दिन को पहली बार मनाया गया। यूएनओ ने 1975 में इस दिन को महिला दिवस के रूप में मान्यता दी। पढ़िए जिले की तीन युवतियों की जुबानी। उन्होंने ऐसे प्रोफेशन को चुना जो उनके लिए वास्तव मेंं कठिन था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और सफलता प्राप्त की। आज वे खुद को सक्षम मान रहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जिले की तीन ऐसी युवतियों की जुबानी पढ़िए जिनमें से दो युवतियां दिव्यांग है, बैसाखी के सहारे चलती हैं। लेकिन उन्होंने अपनी इसी कमजोरी को अवसर बना लिया है।

दिव्यांगता देखकर पिता चिंतित थे, लेकिन मैंने हार नहीं मानी
5 भाई और दो बहनों का मेरा बड़ा परिवार है। मैं चौथे नंबर की हूं। पैर से दिव्यांग हूं। मुझे देखकर पिता विश्राम बघेल चिंतित रहते थे कि मैं भविष्य में क्या करुंगी। गरीब हैं लेकिन उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और मुझे पढ़ाने में कमी नहीं की। पहले पढ़ने के लिए बाहर भेजने से डरते थे, लेकिन लोगों ने समझाया तो हॉस्टल भेजे। मैंने अपनी दिव्यांगता और पिता की मजबूरी को अपना हथियार बनाया। खूब पढ़ाई की। जूलॉजी में एमएससी, बीएड, पीजीडीसीए कर चुकी हूं। पढ़ाई के दौरान ही मुझे पता चला कि दिव्यांगाें के लिए भी दौड़ स्पर्धा होती है तो पहली बार 2017 में रायपुर में आयोजित प्रतियोगिता में शामिल हुई। रजत पदक जीता। दूसरे साल भी मैंने रजत पदक जीता। व्हील चेयर बास्केट बाल के लिए राजनांदगांव में शामिल हुई। वहां चयन होने पर रेस्ट ऑफ इंडिया की ओर से खेलने के बाद नेशनल लेबल पर छग का तीन साल नेतृत्व भी किया है। इसके अलावा दिव्यांग क्रिकेट स्पर्धा में भी नेशनल लेबल के लिए चयन हुआ है। मैं दिव्यांग हूं, परिवार गरीब है, लेकिन चाहती हूं कि कोई भी महिला अपने आप को कमजोर न समझें। अपनी क्षमता पर विश्वास करे और मेहनत करे तो सफलता मिलेगी।’’
-अनिता बघेल, व्हील चेयर बास्केट बॉल व दिव्यांग क्रिकेट की नेशनल खिलाड़ी

लड़कियों के मन में बचपन से असुरक्षा की भावना न भरें
मेरे पापा वरुण पांडेय कराते मास्टर हैं। दो साल की थी तब से पापा को मैंने कराते के एक्शन में देखा है। कराते अपने पापा से मुझे मिला है। वे घर में कराते सिखाते थे बाहर भी सिखाने के लिए जाते थे। मुझे भी अपने साथ ले जाते थे, इसलिए कराते के लिए लगन शुरू से मन में थी। जैसे जैसे बड़ी होती गई, इस ओर रुझान बढ़ता गया। तब मैंने इसे अपनी सुरक्षा के लिए सीखना शुरू किया था। कक्षा नवमीं में मैंने तलवारबाजी भी सीखना शुरू किया। कराते को प्रोफेशन बनाकर किशोरी व युवतियों को सिखाएं ताकि वे कभी विपरीत परिस्थिति में पड़ जाएं तो खुद की सुरक्षा कर सकें। कानून भले ही बहुत हैं, लेकिन जिस तरह से अपराध घटित होते हैं, उससे भी पालकों के मन में असुरक्षा की भावना बनी रहती है, इसलिए बेटियों को सुरक्षा के लिए मजबूत बनाएं, ताकि वे अपनी सुरक्षा कर सकें व विपरीत परिस्थिति में मुंहतोड़ जवाब दे सकें। इसीलिए मैंने कराते को चुना है। मुंबई, मध्यप्रदेश व रायपुर में नेशनल प्रतियोगिता में शामिल हो चुकी हूं। फिलहाल कराते सिखने 10-15 लोग आ रहे हैं।’’
-साक्षी पांडेय, कराते मास्टर

बैसाखी के सहारे चली, गांव में तैरना सिखा फिर पार की कैटलिना आईलैंड
बलौदा के गरीब परिवार में पैदा हुई। चलने में असमर्थ थी तो पिता को मेरे बचपन से ही चिंता थी। मैंने बैसाखी के सहारे चलना सिखा। पर मैंने अपनी इस कमजोरी को अवसर में बदलना शुरू किया। गांव के तालाब में ही तैरना शुरू किया। तैराकी में मन लगा, फिर इसे ही प्रोफेशन बनाने का इरादा बना लिया। जब मौका मिला तो दिव्यांगों के लिए हुई तैराकी स्पर्धा में भी शामिल हुई। वहां जीत मिली तो हौसला बढ़ा और लगातार मेहनत करती रही। इलाहाबाद में 2007 में आयोजित दिव्यांगों के एक किमी राष्ट्रीय तैराकी स्पर्धा में शामिल हुई। यहां मुझे कांस्य पदक मिला, इसके बाद मैने पलट कर नहीं देखा। तब से लेकर अभी तक मैंने 49 पदक जीते हैं। जिसमें 17 स्वर्ण, 20 रजत और 12 कांस्य पदक शामिल है। वर्ष 2019 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता में भी शामिल हुई। कैटलिना आईलैंड से मेन आईलैंड की 35 किमी की दूरी 11 घंटे 46 मिनट में पूरा की। इसलिए कोई भी महिला अपने आप को कमजोर न समझे। अपनी कमजोरी को ही हथियार बना ले तो सफलता जरूर मिलेगी।’’
-अंजनी पटेल, दिव्यांग पैरालंपिक तैराक

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