आफत / गाज की चपेट में आने से इस साल 13 लोगों की मौत

X

  • हाई मैग्नेटिक पत्थरों के कारण गाज की घटनाएं ज्यादा

दैनिक भास्कर

Jun 28, 2020, 04:00 AM IST

जशपुर. जिले में 10 वर्षों में गाज की चपेट में आने से 224 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इसमें इस साल हुई 13 लाेगाें की माैतें शामिल हैं। 
जिले में हाई मेग्नेटिक एवं हाई ग्रेविटी एरिया एलट्राबेसिक रॉक की अधिकता एवं समुद्र तल से ऊंचाई के कारण जिले में गाज गिरने की घटना ज्यादा होती है। इस साल गाज से अब तक 13 लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि बीते 10 सालों में वज्रपात से मरने वालों की संख्या 211 है। जिले में प्री मानसून बारिश के साथ ही आकाशीय कहर का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। गाज से जहां लोगों की जान जाती है, वहीं मवेशी भी इसकी चपेट में आते हैं। अधिकांश घटनाओं में पेड़ों के नीचे पानी से बचने का प्रयास करते हुए लोग ही वज्रपात की चपेट में आते हैं। हालांकि घरों के अंदर रहने वाले लोग भी इस प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित नहीं हैं।  इस साल हुई 13 मौतें मानसून के दस्तक के पूर्व की है।

साल दर साल बढ़ रहे हैं मौत के आंकड़े
जिले में मानसून के दस्तक के साथ ही आकाशीय गाज का कहर शुरू हो जाता है। पिछले 10 वर्षों में जिले में आकाशीय गाज की चपेट में आने से 224 लोगों की मौत हो चुकी है। 
वर्ष -मौत
2010-23
2011 -16
2012 -18
2013 - 21
2014 -19
2015 -35
2016 -18
2017- 23
2018 -20
2019 -19
2020  में अबतक -13 
पुलिस रिकार्ड के अनुसार

बगीचा और जशपुर जिले के डेंजर जोन 
आकाशीय बिजली के कहर से जिले के सभी आठों विकासखंड प्रभावित हैं, लेकिन इसका सबसे अधिक प्रभाव बगीचा और जशपुर क्षेत्र में दिखाई देता है। मौसम बदलते ही सबसे अधिक वज्रपात बगीचा और जशपुर में ही होता है। इन दोनों विकासखंड के पाठ इलाकों में बिजली गिरने के हादसे अधिक होते हैं। जिला मुख्यालय जशपुर में जिला अस्पताल व कल्याण आश्रम के आसपास अधिक पेड़ों की वजह से वज्रपात हो चुका है। इसलिए यह इलाका भी संवेदनशील माना जाता है। इन क्षेत्रों में पहाड़ों में हाई मैग्नेटिक पत्थर ज्यादा मिलते हैं। जिसके कारण गाज की घटनाएं ज्यादा हाेती हैं।

कार्य योजना नहीं, भारी पड़ रही है लापरवाही 
गाज से मौत का साल दर साल बढ़ रहे आंकड़े को काबू में करने के लिए अब तक शासन और प्रशासन कोई योजना नहीं बना पाई है। बीते 10 सालों में वज्रपात से मरने वालों की संख्या 211 है। गाज को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जो छोटे-मोटे प्रयास हुए हैं, वे भी अधिकारियों की लापरवाही और भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ गए हैं। तकरीबन 6 साल पूर्व प्रशासन ने छात्रावासों में तड़ित चालक लगाने का प्रयास किया था। इसके लिए बाकायदा टेंडर कराकर खरीदी भी की गई थी। लेकिन ये कभी छात्रावासों में लग नहीं पाए। छात्रावास में रखे हुए ही ये तड़ित चालक कबाड़ में तब्दील हो गए।

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना