कोरवा उपेक्षित:4 पहाड़ी कोरवाओं की हफ्ते भर में उल्टी-दस्त से हुई माैत, मामूली बीमारियों से जा रही राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों की जान

जशपुर2 महीने पहले
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ग्राम सरधापाठ जहां हुई घटना। - Dainik Bhaskar
ग्राम सरधापाठ जहां हुई घटना।
  • इस साल अबतक 15 लोगों की उल्टी दस्त से हो चुकी है मौत
  • पीने की पानी की सुविधा भी नहीं, ढोड़ी का पानी पी रहे हैं ग्रामीण

बगीचा विकासखंड के ग्राम सरधापाठ में बीते एक सप्ताह में उल्टी-दस्त से चार पहाड़ी कोरवाओं की मौत हो गई है। मरने वालों में तीन एक ही परिवार के सदस्य हैं, वहीं एक अन्य कोरवा की मौत दस दिन पहले हुई है। घटना के बाद कलेक्टर रितेश अग्रवाल के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग ने बुधवार को सरधापाठ में मेडिकल कैंप लगाकर ग्रामीणों के स्वास्थ्य की जांच की है। विभाग के मुताबिक इस गांव में कोई नया मरीज नहीं मिला है। अब रोजाना इस गांव में मोबाइल मेडिकल यूनिट भेजी जाएगी।

बगीचा विकासखंड का सरधापाठ पहाड़ी कोरवा बाहुल्य गांव है। पहाड़ी कोरवा अत्यंत पिछड़ी जनजाति है, जिनको समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राष्ट्रपति ने गोद लिया है। इसलिए ये राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाते हैं। उल्टी-दस्त से एक ही गांव के चार कोरवाओं की मौत के बाद प्रशासनिक अफसरों ने गांव की दौड़ शुरू कर दी है। जानकारी के मुताबिक कुछ दिन पहले इस गांव की गर्भवती महिला प्रमिला बाई 22 वर्ष को उल्टी-दस्त की शिकायत पर बगीचा के सीएचसी में भर्ती कराया था, जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई थी।

गांव लाकर इस महिला का अंतिम संस्कार किया गया। बीते चार दिनों के भीतर प्रमिला के परिवार के ही सुरती बाई 60 वर्ष और जेहला राम 65 वर्ष की भी मौत हो गई। इनकी मौत की वजह भी उल्टी-दस्त ही है। ग्रामीणों के मुताबिक सधिया राम नामक एक ग्रामीण की मौत भी सात दिन पहले उल्टी-दस्त से हुई थी।

पहाड़ी कोरवाओं की मौतों की खबर सुनकर भाजपा के जिला उपाध्यक्ष मुकेश शर्मा अपनी टीम के साथ बुधवार को सरधापाठ पहुंचे थे। मुकेश शर्मा का कहना है कि हर साल कोरवाओं के नाम पर करोड़ों खर्च हो रहे है, पर इनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं है। कोरवाओं की बस्ती में हैंडपंप तो हैं पर खराब पड़ा है। दूसरा हैंडपंप दूर है। कोरवा अभी भी खेत की ढाेढ़ी का पानी ही पी रहे हैं। कोरवाओं को पौष्टिक आहार तक मुहैया नहीं कराया जा रहा है। पहाड़ी कोरवा भोजन के लिए कंदमूल पर आश्रित हैं।

संभावना है कि विषाक्त भोजन या दूषित जल के सेवन के कारण बस्ती में डायरिया फैला होगा और एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई। बस्ती में जनवरी से लेकर अब तक उल्टी दस्त से 15 ग्रामीणों की मौत हो चुकी है। वर्तमान में इस गांव में विधवा महिलाओं की संख्या 35 है। परिवार के पुरुष सदस्यों की मौतों की वजह छोटी मोटी बीमारियां रही हैं। कोई उल्टी दस्त से मर गया तो किसी की जान बुखार ने ले ली है। यदि यही हाल रहा तो पहाड़ी कोरवा जनजाति विलुप्त हो जाएगी।

दूसरे राज्य की चिंता छोड़ कभी अपना भी घर झांके: साय
घटना को लेकर भाजपा ने मुख्यमंत्री को घेरा है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा कि प्रदेश के मुखिया उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी के मृत किसानों को 50-50 लाख रुपए का मुआवजा दे रहे हैं पर उनके ही प्रदेश में अति पिछड़ी जनजाति और आदिवासी अव्यवस्था के शिकार होकर मर रहे हैं।

बस्तर के सिलेगर के आदिवासी 300 किमी की पदयात्रा कर मुख्यमंत्री से मिलने रायपुर पहुंचे पर उनसे मिलने का सीएम के पास वक्त नहीं है। सरकारी व्यवस्था में कमियों की वजह से जशपुर के सरधापाठ में उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों से अति पिछड़ी जनजाति कोरवा बेमौत मर रहे हैं। पर इनके लिए भी मुख्यमंत्री को समय नहीं है विष्णुदेव साय ने कहा कोरवाओं की मौत को लेकर हम राष्ट्रपति व राज्यपाल से मुलाकात करेंगे।

पूरे गांव में नहीं फैला है डायरिया: विभाग

गांव में एक महिला की मौत अस्पताल में इलाज के दौरान हुई है। महिला को मितानिन के माध्यम से अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहीं अन्य मौत गांव में ही हुई हैं। गांव में मेडिकल कैंप लगाकर ग्रामीणों का स्वास्थ्य जांच की गई है। पूरे गांव में डायरिया फैलने जैसी कोई बात नहीं है। गांव की मितानिन को आवश्यक दवाओं का पर्याप्त स्टॉक दिया है। साथ ही विभाग की निगरानी इस गांव पर बनी हुई है। रोजाना मोबाइल मेडिकल यूनिट गांव भेजी जाएगी।''
-डॉ पी सुथार, सीएमएचओ, जशपुर

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