विधिवत रूप से पूजे गये भगवान चित्रगुप्त:कायस्थ समाज के लोगों ने घर में की अक्षर के देव की पूजा

जशपुर21 दिन पहले
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भगवान चित्रगुप्त की पूजा करते कायस्थ परिवार के लोग - Dainik Bhaskar
भगवान चित्रगुप्त की पूजा करते कायस्थ परिवार के लोग

कार्तिक शुक्ल द्वितीया के मौके पर शुक्रवार को कायस्थ समाज के लोगों ने अक्षर के देव भगवान चित्रगुप्त की विधिवत पूजा की। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कायस्थ समाज के लोग लेखनी को अक्षर प्रदान करने वाले भगवान चित्रगुप्त के वंशज हैं। भगवान चित्रगुप्त यमलोक में धर्म अधर्म का हिसाब रखने का काम करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को भगवान चित्रगुप्त की पूजा से प्राणी के सभी पापों का नाश होता है, और मृत्यु के बाद वह बैकुंठधाम को जाता है। पूजन के पीछे छिपी मान्यता के मुताबिक पुलस्य मुनि ने भगवान चित्रगुप्त की पूजन व उसके महत्व को महाभारत काल में गंगापुत्र भीष्म को बताया था।

भीष्म ने विधि-विधान से भगवान चित्रगुप्त की पूजा थी। भीष्म की पूजा से प्रसन्न होकर भगवान चित्रगुप्त ने उन्हें अपनी इच्छामृत्यु का वरदान दिया था। चित्रगुप्त के आर्शीवाद के कारण ही बाणों से छलनी होने के बावजूद भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे रहे और पूरी महाभारत की लड़ाई उन्होंने देखी।

कायस्थ समाज के लोग जो अपना टाइटल सिन्हा, अंबस्ट, भटनागर, श्रीवास्तव आदि लिखते हैं वे चित्रगुप्त के वंशज माने जाते हैं। कायस्थों ने शुक्रवार को विधि-विधान से ना सिर्फ भगवान चित्रगुप्त की पूजा की बल्कि अपनी भगिनियों को दान भी दिया। मान्यता है कि यमराज ने कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथी को अपनी बहन के घर भोजन किया था। यम द्वितीया के दिन भगिनी को दान करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है।

राजा सौदास की कथा सुनी
पूजन के पीछे राजा सौदास की कथा जुड़ी है। कथा के अनुसार राजा सौदान मृत्युलोक में अत्यंत पापकर्म में रत राजा था, जिसमें अपने राज्य में रहते हुए सभी धार्मिक कार्यों पर प्रतिबंध लगा दिया था। उसके राज्य में कोई भी यज्ञ, हवन,पूजा पाठ नहीं होते थे। धर्म-कर्म को अपने राज्य से बाहर करने वाले पापी राजा ने सिर्फ चित्रगुप्त की पूजा कर सभी पापों से मुक्ति पायी थी और मृत्यु के बाद उसे स्वर्ग में जगह मिली थी।

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