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जिले के पौराणिक स्थल:भगवान राम जहां से गुजरे वहां रामझरना, सीता झूला और लक्ष्मण चरण पादुका

रायगढ़2 महीने पहले
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जिले में रामझरना, लक्ष्मण चरण पादुका और सीता झूला महत्वपूर्ण स्थल हैं। तीनों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं। लोगों का मानना है कि 14 साल के वनवास के दौरान भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के साथ जिले के इन महत्वपूर्ण स्थानों से गुजरे और प्रवास भी रहा। शोधकर्ताओं ने रामझरना पर्वत को मैकल पर्वत श्रेणी का हिस्सा माना है, जो गुजरात के गिरनार और अयोध्या को जोड़ती है। प्राचीन समय में लोग पर्वत चोटी को ही रास्ते के रूप में इस्तेमाल करते थे। इस पहाड़ पर शोधकर्ताओं ने कई ऐसे साक्ष्य भी ढूंढे हैं, जो राम वनगमन पथ होने की पुष्टि करता है।

रामझरना को लेकर यह मान्यता
रामझरना पर भगवान राम और सीता वनवास पर थे, वे भूपदेवपुर के आसपास जंगली इलाकों में पहुंचे। यहां सीता माता को प्यास लगी तो भगवान राम ने जमीन पर तीर चलाया। जिससे एक कुंड बन गया और उससे पानी की धार निकलने लगी। उसी पानी की धार से सीता माता ने अपनी प्यास बुझाई। तब से लेकर आज तक उस कुंड से पानी बह रहा है और इसी वजह से स्थल का नाम रामझरना दिया गया। यह पानी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। इससे 28 से ज्यादा गांव में सिंचाई वर्तमान में हो रही है।

भाभी के लिए भोजन लेने गए तो पत्थर पर रखी थी खड़ाऊ
भूपदेवपुर पर्वत से ठीक सामने जंगल के रास्ते करीब 10 किमी दूर लक्ष्मण चरण पादुका स्थित है। मान्यता है कि यहां लक्ष्मण सीता के लिए भोजन की तलाश में आए थे। भोजन हाथ में होने कारण अपनी खड़ाऊ एक पत्थर पर रखी थी। इसलिए इस जगह को लक्ष्मण चरण पादुका कहा जाता है। यहां पत्थर पर बड़े चरण पादुका के निशान है। ग्रामीण बताते हैं कि चरण पादुका के निशान हैं। इसके बाद यहां छोटा सा मंदिर बनाया गया है।

प्राकृतिक कुंड में किया था सीता ने स्नान
लक्ष्मण चरण पादुका और रामझरना के बीच केलो नदी के तट पर प्राकृतिक कुंड है। लोगों का मानना है कि यहां सीता स्नान करने आती थी। इसे क्षेत्र वासी रानी कुंड व सीता झूला के नाम से जानते हैं। यह क्षेत्र पहले लाखा और गेरवानी का ही हिस्सा था। इसकी दूसरी लाखा से जंगल के रास्ते करीब पांच किलो मीटर है, जिसे घूम कर बड़गांव के रास्ते देखा जा सकता है।

यह वनगमन का मार्ग है
"मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व जिले के पुरातत्व विभाग ने इसे राम वनगमन पथ माना है। प्राचीन और भौगोलिक परिवेश के हिसाब से यह अति सुंदर वन क्षेत्र हैं। राम झरना जिस पहाड़ी पर स्थित है, वह मैकल पर्वत श्रेणी का हिस्सा है, जो अयोध्या समेत कई राज्यों को जोड़ती है। यहां भगवान के निवास के कई सांकेतिक तथ्य मौजूद है, इन कड़ियों को जोड़ने पर लगता है कि भगवान यहां से गुजरे थे।''
-शिव राजपूत, पुरातत्वविद

ट्रेन, बस और पैदल...अयोध्या पहुंचने का ऐसा जुनून
अविभाजित रायगढ़ जिले से कार सेवकों को अयोध्या पहुंचने के लिए कहा गया था। भोपाल में कार सेवकों के लिए समन्वय समिति बनी थी। जिले का नेतृत्व नंदकुमार साय ने किया था। रायगढ़-जशपुर जिले के तीन हजार से अधिक लोग अलग-अलग ट्रेनों में शहडोल तक गए। खरसिया ब्लाक के संयोजक और तब मध्यप्रदेश की पटवा सरकार में खनिज निगम के अध्यक्ष गिरधर गुप्ता ने भास्कर को बताया, हम लोगों को शहडोल से इलाहाबाद जाना था। हम चाकघाट (यूपी और एमपी का बॉर्डर) पहुंचे। यूपी में जगह-जगह कारसेवकों के रुकने और खाने की व्यवस्था थी। ऐसा सत्कार कि जबरन रोककर खाना खिलाते थे। कोई थका दिखे तो उसे आराम के लिए जगह देते थे। बस, गाड़ी, पैदल चलते हुए तीन दिन में अयोध्या पहुंचे। उमा भारती के नेतृत्व में एक रैला निकलने वाला था। रायगढ़ के कार सेवक उसमें शामिल नहीं हो सके। वहां गोली चलने के बाद हड़कंप मचा था लेकिन कारसेवक डटे रहे। रायगढ़ के लोगों मानस भवन में शरण ली। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराया गया। पुलिस ने सबको पकड़ फैजाबाद रेलवे स्टेशन ले जाकर जबरन ट्रेनों में बैठाया।

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