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रोजगार के हाथ खाली, पलायन शुरू:बलौदाबाजार जिले से 15 हजार से अधिक मजदूर पलायन कर चुके, शेष फसल कटने के इंतजार में

बलौदाबाजार12 दिन पहले
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तारा परसवानी | लॉकडाउन की अवधि में जिले के प्रवासी कामगार जहां जिस हालत में थे, वहां से इस उम्मीद पर लौटे थे कि यहां कुछ भी करके अपने परिवार वालों के साथ जीवन यापन कर लेंगे। इसी उम्मीद के अनुरूप मई के दूसरे पखवाड़े से हजारों मजदूर अलग-अलग राज्यों से बस, ट्रक, बाइक तथा पैदल धक्के खाते अपने गांव-घर पहुंचे लेकिन इन दिनों वे फसल कटने के बाद फिर पलायन की तैयारी में है‌ं, क्योंकि इन खेतिहर मजदूरों के पास काम नहीं है।
सूत्रों की मानें तो जिले से 15 हजार से अधिक मजदूरों का पलायन हो चुका है और जो रूके हैं वो फसल कटने के बाद चले जाएंगे। यानी पलायन करने वालों का यह आंकड़ा फिर इस साल 1 लाख से उपर जाएगा। कसडोल विखं के गांवों से ज्यादा पलायन हो रहा है। अधिका कोलिहा, कोसंसरा, नंदनिया, परसदा, डोंगरीडीह, डोंगरा, तिल्दा, बाजारभाठा, गंगई, सुनसुनिया, लाटा गांवों से पलायन शुरू हो चुका है।

मजदूरों की जुबानी... घर की आस परिवार सहित गांव खींच लाई थी पर खाली हाथों ने फिर वापस जाने को मजबूर कर दिया
ग्राम कोलिहा के ग्रामीण दुखवा यादव का कहना है कि अचानक हुए लाॅकडाउन कारण असहनीय तकलीफों का सामना करने के बाद जब अपने घर लौटे थे तो सोचा था अब अपना गांव छोड़कर कभी नहीं जाएंगे मगर गांव में काम नहीं मिलने के कारण मजबूरीवश जाना पड़ रहा है। ग्राम कोसंसरा के ग्रामीण सेमलाल सोनकर का कहना है कि गांव में 15 दिन काम चला, 190 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से लगभग तीन हजार रुपए मिले थे। उन पैसों में कितने दिन हम परिवार का भरण-पोषण कर पाते, ऐसे पलायन करना हमारी मजबूरी है। ग्राम नंदनिया के ग्रामीण रामलाल बारले ने कहा कि पलायन से लौटकर गांव आ गए थे पर गांव में एक दिन भी काम नहीं मिला, अब वापस जाने के सिवा कोई उपाय नहीं है। ग्राम डोंगरीडीह के ग्रामीण मंगलू भगत का कहना है कि, सुना था मनरेगा में काम मिलेगा लेकिन जो काम होता है उसे मुखियाजी मशीन से करवाते हैं, मजदूरों को काम नहीं देते ऐसे कब तक चलेगा। डोंगरा गांव निवासी रवीन्द्र ध्रुव का कहना है कि गांव में कोई काम नहीं है, घर में फांकाकशी की हालत है, देहरादून से काम का ऑफर आया है, कई लोग चले गए हैं, अब हम भी चले जाएंगे। सुनसुनिया गांव के ग्रामीण खिलावन पटेल का कहना है कि मनरेगा में दस दिन काम किया था, आज तक मजदूरी नहीं मिली।

71 हजार को ही मनरेगा जॉब कार्ड मिला पर बरसात में काम नहीं मिला
कोरोना संक्रमण के बाद पूरे प्रदेश में बलौदाबाजार ही इकलौता जिला था जहां सबसे ज्यादा 1 लाख 20 हजार प्रवासी मजदूरों की वापसी हुई थी। इन्हें तत्काल रोजगार की जरूरत थी, प्रशासन सक्रिय भी हुआ और रोजगार सृजन के विकल्पों पर विचार भी हुआ, 14 दिन तक क्वारेंटाइन रहने के कई दिनों बाद 70, 800 मजदूरों को मनरेगा में जाॅब कार्ड भी मिला मगर बारिश की वजह से यह काम कुछ दिनों तक ही चला। उसके बाद से सारे मजदूर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। तात्कालिक उपायों के तहत उन विभागों में भी रोजगार के अवसर तलाशे गए जहां अधिकांश काम मशीनों से कराया जा रहा था। इसके तहत पथ निर्माण, पुल निर्माण, मनरेगा अधीक्षण एवं कार्यपालक अभियंताओं को इस आशय का आदेश जारी किया गया कि मशीनों के बदले मानव बल का उपयोग किया जाए मगर पीएचई, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग में लगातार मशीनों से ही काम कराया जाता रहा जिसकी वजह से मजदूरों को काम नहीं मिल पाया।

सीमेंट संयंत्रों में भी काम नहीं दिला सका प्रशासन
सिर्फ 70 हजार प्रवासियों के लिए जॉब कार्ड बनाए गए जिससे कि वे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार योजना (मनरेगा) के तहत गांव में ही काम कर सकें। मनरेगा में काम बंद होने के बाद ही यह भी तलाशने की कोई कोशिश नहीं की गई कि वर्तमान में जो जिले में विश्व स्तरीय सीमेंट संयंत्रों जैसी बड़ी औद्योगिक इकाइयां चालू हैं उनमें प्रवासी कामगारों को समायोजित किया जा सके। नतीजा अपनों के भरण-पोषण की बेचैनी प्रवासियों को पुनः लौटने को विवश कर रही है। जिले से कामगारों के पलायन के जो कारण पहले थे, कमोबेश वही आज भी मौजूद हैं। जिले में रबी की तुलना में खरीफ का उत्पादन करने वाले कृषक अधिक हैं जिसकी वजह से खरीफ की धान कटाई के बाद 90 फीसदी कृषकों या खेतिहर मजदूरों के पास कोई कृषि कार्य नहीं है।

शिकायत न हो तो पुलिस कुछ नहीं कर सकती : एएसपी
एएसपी निवेदिता पॉल का कहना है कि स्वेच्छा से अगर कोई कहीं जाता है तो हम उन्हें नहीं रोक सकते। अगर हमें यह शिकायत मिलती है कि दलालों के माध्यम से लालच देकर मजदूरों को यहां से ले जाया जा रहा है, उसी स्थिति में हम कार्रवाई कर सकते हैं।

शिकायत मिलने पर ही कार्रवाई करेंगे : श्रम अधिकारी
श्रम विभाग की भी यही लाचारी है, श्रम अधिकारी आशुतोष पाण्डेय का कहना है कि शिकायत मिलने पर ही कार्रवाई की जा सकती है। यानी अधिकारियों की विवशता, विभागों के बीच सामंजस्य की कमी तथा रोजगार साधनों की अनुपलब्धता की वजह से पलायन रुक नहीं सकता।

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