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कैसे चले परिवार, सालभर से बस स्टैंड पर खड़ी बसें:टायर बैठ गए, इलेक्ट्राॅनिक पार्ट्स भी खराब हो चुके, बैटरियां-कई पार्ट चोरी

बलौदाबाजार11 दिन पहले
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  • किश्तें पटाने की स्थिति नहीं तो पेनाल्टी कैसे दें, कर्मचारी भुखमरी तो बस मालिक दिवालिया होने के कगार पर...

पिछली बार की तरह इस बार भी यात्री बस संचालकों की हालत पतली है। इस बार खड़ी बसें जाम हो गई हैं और लंबे लॉकडाउन के बाद इससे जुड़े 500 परिवार भुखमरी की कगार पर हैं, क्यों इनके लिए कोई राहत पैकेज ही नहीं है। साल भर से खड़ी बसों के टायर बैठ गए, इलेक्ट्राॅनिक पार्ट्स भी खराब हो चुके हैं और तो और बैटरियां व कई पार्ट तक चोरी हो गए। आर्थिक तंगी से जूझ रहे बस मालिकों ने 50 से ज्यादा बसों को कौड़ियों के भाव बेच दिया तो 50 से अधिक बसें तो खड़ी-खड़ी कबाड़ बन चुकी हैं।

जिले के सभी बस स्टैंडों से विभिन्न मार्गों के लिए प्रतिदिन यात्रियों से भरी 120 बसें निकलती थीं मगर 2020 में लगे लाॅकडाउन के खत्म होने के बावजूद सवारियों के अभाव में सिर्फ 30-40 बसें ही सड़कों पर दौड़ रही थीं। कोरोनाकाल की वजह से यात्री बस संचालन से जुड़े जिले के 500 परिवारों में कई भुखमरी होने के कगार पर तो बैंकों की किश्त नहीं पटा पाने के कारण दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। बस यूनियन के जिला उपाध्यक्ष मानक ठाकुर ने बताया कि अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे तो वे दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे।

किश्तें नहीं पटाने से पेनाल्टी भी लग रही
बस एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष धर्मेंंद्र वर्मा का कहना है कि परेशानियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। लाॅकडाउन के चलते बैंक की किश्तें नहीं पटा पा रहे हैं उपर से पेनाल्टी भी लग रही है। आधी बसें सालभर से खड़ी हैं, टायर बैठ गए है, इलेक्ट्रानिक पार्ट्स खराब हो गए है, बैटरियां डिस्चार्ज होकर जाम हो गई हैं। कुछ बस स्टैंड पर तो कुछ घरों के बाहर खड़ी गाडियों में से कई गाडियों की बैटरियां और अन्य पार्ट्स भी चोरी हो चुके हैं। अगर बसों को दोबारा सड़कों पर उतारेंगे तो दो से ढाई लाख रुपए रिपेयरिंग खर्च आएगा। यही नहीं जिन 30-35 बसों को इस लाॅकडाउन में खड़ा किया गया है उन्हें भी सड़कों पर उतारने के लिए हमें एक से सवा लाख रुपए खर्च करना पड़ेगा। कोरोना की दूसरी लहर का प्रभाव ऐसा है कि लाॅकडाउन खत्म होने के बाद बसें चलाने की छूट भी मिलती है तो हमें फिलहाल 2 से 3 महीनों तक सवारियां ही नहीं मिलेंगी।

इस बार सब्जी, आलू-प्याज बेचने वाले बहुत हो गए इसलिए आमदनी भी कम हो रही
पिछली बार की तरह बस स्टैंड पर बसों की देखरेख करने वाले ड्राइवरों और खलासी कर्ज लेकर किसी तरह परिवार चला रहे हैं। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो कर्जदारों से भी अब कर्ज मिलना बंद हो जाएगा। ड्राइवर जय कोसले ने बताया कि जिलेभर में 120 बसें चलती हैं। कंडक्टर कमलेश भार्गव का कहना है कि वह कभी सब्जी फल तो कभी आलू प्याज का ठेला लेकर मोहल्लों में बेचकर घर चला रहा है मगर खरीदार से ज्यादा सब्जी बेचने वाले हो गए हैं इसलिए बहुत कम आमदनी होती है, खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।.

प्रशासन से खाद्यान्न की व्यवस्था करने का अनुरोध
बस चालक रमेश चंद्राकर ने बताया कि अब बस के चालक, परिचालक, खलासी, एजेंट, हॉकर जो बस से अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे आज बस का संचालन बंद होने से भुखमरी की कगार पर हैं। अब तो दुकानदार भी सामान देने से मना कर रहे हैं। बस मालिक भी बस बंद होने से अपनी हालत का हवाला देकर कोई मदद करने से मना कर रहे हैं। हमारी मांग है कि बसों के संचालन की व्यवस्था होते तक प्रशासन बस कर्मचारियों को चिह्नित करके खाद्यान्न की व्यवस्था सुनिश्चित करे।

बड़ी समस्या.... आमदनी नहीं है फिर भी टैक्स, ऋण का ब्याज तो पटाना ही है
कोरोनाकाल से पहले जिले में चलने वाली सभी 120 यात्री बसों से प्रतिदिन 8 से 10 लाख रुपए का व्यवसाय होता था। बात अगर इस व्यवसाय से जुड़े मुनाफे की करें तो सारे खर्चे काटने के बाद प्रति बस से 25 सौ से 3 हजार रुपए कमाते थे। उस हिसाब से 120 बसों से प्रतिदिन साढ़े तीन लाख से चार लाख रुपए की आमदनी होती थी मगर इस लाॅकडाउन से पहले सिर्फ 30 से 35 बसें ही चल रही थी जिसकी वजह से आमदनी भी कम हो रही थी जो अब पूरी तरह बंद हो गई हैं। सवाल ये है कि टैक्स, बस मेटेनेंस, ऋण का ब्याज आदि कर्जे जो उन्हें पटाना है वो कहां से लाएंगे।

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