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बोली का संरक्षण:हिंदी के साथ हल्बी-गोंडी में भी पहली व दूसरी की पढ़ाई शुरू, बच्चों में बढ़ी रुचि

दंतेवाड़ाएक महीने पहले
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मोहल्ला क्लास में हल्बी-गोंडी बोली में पढ़ाई करते बच्चे।
  • शिक्षक और बच्चों के बीच मजबूत होगा संवाद, दंतेवाड़ा में पहली और दूसरी के बच्चों के लिए आईं 9554 किताबें, अब पढ़ने में होगी आसानी

इस शिक्षा सत्र में कोरोना के कारण भले ही इलाके में पढ़ाई की रफ्तार बेहद धीमी हो, लेकिन पहली व दूसरी की मोहल्ला कक्षाओं में आसान हुई पढ़ाई से अंदरूनी गांवों के बच्चे बेहद खुश हैं। इस बार पहली और दूसरी कक्षाओं के करीब 9500 से ज़्यादा बच्चे हिंदी के साथ हल्बी- गोंडी में भी पढ़ाई कर रहे हैं। 15 दिन पहले दंतेवाड़ा नई किताबें पहुंचीं व बच्चों को पढ़ाना भी शुरू कर दिया गया है। दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार ने इस शिक्षा सत्र स्थानीय बोलियों में भी पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया है। इस घोषणा के बाद से शैक्षणिक सत्र शुरू होने के ढाई महीने बाद दंतेवाड़ा में 9554 नई किताबें पहुंची। किताब के एक पन्ने पर हिंदी जबकि दूसरे पन्ने पर हल्बी व गोंडी का अनुवाद है। डीईओ राजेश कर्मा ने कहा कि दोनों कक्षाओं के लिए दोनों बोलियों की 9554 किताबें मंगाई गई थी। स्कूलों में किताबें भेज दी गई हैं। जहां बच्चे हिंदी के साथ हल्बी- गोंडी में भी पढ़ाई कर रहे हैं। हाल ही में दंतेवाड़ा पहुंचे शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव आलोक शुक्ला ने भी हल्बी- गोंडी में बच्चों को पढ़ते देख तारीफ की थी। पहले भी हुआ था प्रयोग: दंतेवाड़ा में स्थानीय बोली हल्बी- गोंडी में बच्चों की पढ़ाई के लिए पहले भी प्रयोग हुआ था। स्थानीय रहवासी सिकंदर खान उर्फ दादा जोकाल ने हिंदी- हल्बी- गोंडी की डिक्शनरी व वर्णमाला चार्ट तैयार की थी। जिसे दंतेवाड़ा की सभी स्कूलों में बांटा गया था। सुकमा- दंतेवाड़ा के एक्सपर्ट की टीम ने किया था अनुवाद, उस पर लगी मुहर: लॉकडाउन के बीच सुकमा व दंतेवाड़ा के हल्बी व गोंडी बोली के एक्सपर्ट 15 शिक्षकों ने मिलकर स्टडी मटेरियल को हिंदी से हल्बी व गोंडी में ट्रांसलेट किया था। इस पर एससीईआरटी की मुहर लगी व इस बार पाठ्यक्रम में हिंदी के साथ गोंडी व हल्बी ट्रांसलेशन भी है।

पहले ये समस्याएं रही हैं

  • दंतेवाड़ा के अधिकांश गांवों के बच्चों को हिंदी की समझ नहीं है।
  • अधिकांश क्षेत्रों में हल्बी व गोंडी बोली जाती है।
  • हिंदी की समझ नहीं होने के कारण नवप्रवेशी बच्चे पढ़ाई से दूर भागते हैं।
  • बच्चे स्कूल नहीं आते हैं या तो कई बार पढ़ाई छोड़ देते हैं।

अब ये फायदे

  • बोली का संरक्षण होगा।
  • शिक्षकों व बच्चों को पढ़ने पढ़ाने में आसानी होगी।
  • ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या कम होगी।

एक्सपर्ट व्यू: ग्रामीण बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने का अच्छा विकल्प
सिकन्दर खान उर्फ दादा जोकाल ने कहा कि अंदरूनी गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखने सबसे अच्छा विकल्प है। मैं शुरू से इसका पक्षधर रहा हूं, कई सालों से कोशिशें भी करता आया हूं। लेकिन अब सफलता मिली है। शिक्षक व बच्चों के बीच संवाद मजबूत होगा, बोली का संरक्षण होगा।

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