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कुरीति को बंद करने का संकल्प:अभियान को लोगों का समर्थन, सतनामी समाज का फैसला- मृत्युभोज नहीं कराएंगे

धमतरी10 महीने पहले
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  • लोगों ने वाट्सएप नंबर पर मैसेज भेजकर भास्कर के अभियान को सराहा, कहा- खुद जुड़ेंगे, दूसरों को भी जोड़ेंगे

मृत्युभाेज के पक्ष में ज्यादातर लाेग नहीं है। लोग इसमें शामिल आडंबरों काे समाप्त करने के पक्ष में है। इसके लिए अलग-अलग समाज अपने स्तर पर प्रयास भी कर रहे हैं। साहू समाज ने मृत्यु भोज पर प्रतिबंध लगाया है। 
हालांकि अभी भी कुछ लाेग करा रहे हैं। इसके लिए समाज के पदाधिकारी लाेगाें काे जागरूक कर रहे हैं। इसी तरह पटेल समाज भी मृत्यु भोज काे बंद कर रहा है। 
लाेगाें काे जागरूक कर रहा। इसी क्रम में सतनामी समाज ने भी मृत्यु भोज की प्रथा समाप्त करने का निर्णय लिया है। भास्कर द्वारा चलाए गए अभियान का लाेगाें ने खूब समर्थन किया है। लाेगाें ने वाट्सएप नंबर पर अपना समर्थन जताया है। कुछ लाेग ऐसे भी हैं जिन्हाेंने मृत्यु भोज की परंपरा काे बंद करने की बजाय सुधार की जरूरत बताई। इसमें शामिल हुईं कुरीतियों को दूर करने की बात कही। ज्यादातर लोगों ने मृत्यु भोज पर प्रतिबंध लगाने की बात कही।
सहयाेग करना ठीक, आडंबर बंद करें 
भास्कर काे भेज संदेशों में लाेगाें ने मृत्यु भोज में शामिल आडंबरों काे समाप्त करने की जरूरत बताई। परिवार के आर्थिक सहयोग को सही बताया है। मराठपारा के दिनेश जगताप ने कहा कि मृत्युभोज को तुरंत समाप्त करने के लिए सबको मिलकर प्रयास करना चाहिए। आर्थिक सहयोग किया जा सकता है। नगरी के राजेश तिवारी ने मृत्युभोज में शामिल नहीं होना चाहिए। लोग ऐसा करते हैं तो धीरे-धीरे यह परंपरा खुद ब खुद समाप्त हाे जाएगी। लता सिंंग ने मत्युभाेज पर चलाए गए अभियान काे भास्कर का बेहतर प्रयास बताया। मड़ेली के भूपेंद्र सोनी ने भी मृत्युभोज की प्रथा समाप्त करने के लिए सहमति जताई। 

सतनामी समाज की कार्यसमिति की बैठक में लिया गया फैसला
कुरूद | सतनामी समाज की कार्यसमिति की बैठक में मृत्युभोज की प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। यह बैठक 12 जुलाई को हुई थी। सतनामी समाज के कुरूद ब्लॉक अध्यक्ष भाव सिंह डहरे ने बताया सतनामी समाज अपनी प्रकृतिवादी संस्कृति के नाम से जाना जाता है, इसलिए शव दफन के बाद मठ पर एक पौधा रोप दिया जाता था। शव दफन से वापस आने के बाद लोगों को खाना खिलाने के लिए 2-2, 3-3 की संख्या में ले जाते हैं। मृत्युभोज की बात आती है तो सतनामी समाज में मृत्युभोज की प्रथा नहीं थी। समाज धीरे-धीरे रूढ़ीवादी परंपरा से प्रभावित हुआ। अनुशरण करते गया। मृत्युभोज की अघोषित कुप्रथा बन गई। सतनामी समाज में मृत्युभोज की अनिवार्यता नहीं है। उन्होंने बताया कि बैठक में मृत्युभोज की अघोषित प्रथा को सतनामी समाज ब्लॉक कुरूद से पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। इसका पालन समाज के सभी लोगों को करना होगा। सतनामी समाज के ब्लॉक अध्यक्ष ने बताया कि शवयात्रा में शामिल होने वाले सभी लोगों को भी कफन लेकर आने की परंपरा को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। कफन की जगह आरती की थाली में यथाशक्ति कुछ रुपए देने की परंपरा को बरकरार रखना है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार इस राशि को गुरु घासीदास शिक्षा, साहित्य एवं जनकल्याण कोष में जमा कराएंगे। 

एक ब्राह्मण, गाय, काैआ, कुत्ता, भिखारी काे भाेजन कराना ही असली मृत्युभाेज
छत्तीसगढ़िया सोनार समाज के निलेश कुमार सोनी ने इस परंपरा में शामिल आडंबर को समाप्त करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि पूर्वजों द्वारा बनाई परंपरा है। इसे पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता है। इसमें कुछ कुरीतियां शामिल हो गईं हैं। उन्हें दूर करने की जरूरत है। मृतक की आत्मा की शांति के लिए भोज किया जाता है। नौ-ग्रह से संबंधित प्राणियों को भोजन करा कर उन्हें संतुष्ट करना मूल उद्देश्य है। एक ब्राह्मण, गाय, काैआ, कुत्ता, भिखारी काे भाेजन कराना ही असली मृत्यु भोज है। यह काेई भी करा सकता है।

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