300 साल बाद महाराष्ट्र पहुंचा 22 हाथियों का दल:जिन हाथियों ने छत्तीसगढ़ में उत्पात मचाया, वे गढ़चिरौली पहुंचे, अब महाराष्ट्र उन्हें वहीं रोकेगा, इसके लिए बनाया प्लान

धमतरी6 महीने पहलेलेखक: अजय देवांगन
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धमतरी के जंगल में सालभर रहने के बाद गढ़चिरौली पहुंचा हाथियों का दल। - Dainik Bhaskar
धमतरी के जंगल में सालभर रहने के बाद गढ़चिरौली पहुंचा हाथियों का दल।

9 साल पहले 2013 में ओडिशा से आए चंदा हथिनी के दल के हाथी अब महाराष्ट्र के जंगल काे आबाद करेंगे। चंदा का दल करीब 2 महीने पहले छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र के गढ़चिराैली चला गया है। गढ़चिराैली जिले के वन विभाग के अफसराें ने 300 साल बाद महाराष्ट्र में पहुंचे करीब 22 हाथियाें के दल काे वहीं राेकने के लिए करीब 1.40 कराेड़ रुपए की कार्ययोजना बनाई है।

वन विभाग के अफसराें के मुताबिक महाराष्ट्र सरकार और वहां के अफसर हाथियाें के आने से उत्साहित हैं। दल काे राेकने और सुरक्षा के लिए जरूरी उपाय किए जा रहे हैं। काॅलर आईडी भी लगाने की तैयारी है। जानकारी के मुताबिक चंदा हथिनी का दल 12 हाथियों के साथ ओडिशा से छत्तीसगढ़ आया था। इनका नामकरण महासमुंद जिले में हुआ। सबसे बड़ी हथिनी का नाम सिरपुर की चंदा देवी के नाम पर रखा गया है। हाथियाें का यह दल करीब 6 साल तक रहा और 18 हाथी हाे गए।

इसके बाद चंदा हथिनी का यह दल महासमुंद बारनवापारा के जंगल से 4 मई 2019 को निकला। गरियाबंद होते हुए 2020 में धमतरी जिले में अाया। सालभर धमतरी सहित पड़ोसी जिले कांकेर, बालोद, गरियाबंद, महासमुंद के जंगल में घूमता रहा। करीब 2 महीने पहले हाथियों का यह चंदा दल बालोद से राजनांदगांव होते महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में प्रवेश कर गया है। अब इसके दोबारा छत्तीसगढ़ लौटने की संभावनाएं कम हैं, महाराष्ट्र सरकार हाथियों को पर्यटन की दृष्टि से देख रही है और अपने राज्य में रोकने की कार्ययोजना बनाई है। जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र में करीब 300 साल बाद एक साथ इतने हाथियों ने प्रवेश किया है। इसलिए महाराष्ट्र सरकार हाथियों को रोकने हरसंभव प्रयास कर रही है। चंदा हथिनी के दल में अभी करीब 22 हाथी हैं।

महासमुंद में हुआ था नामकरण, दल में नन्हें हाथी अल्फा, बीटा, गामा भी शामिल
हथिनी चंदा का नामकरण महासमुंद में हुआ था। इनका नामकरण सेवानिवृत्त सीसीएफ केके बिसेन ने 2014 में किया था, इस समय वे सरगुजा में सीएफ(वन संरक्षक) थे। उन्होंने बताया कि एक साथ आए 12 हाथियों को पहचानने में परेशानी होती थी, तो इसलिए महासमुंद के सिरपुर स्थित चंदादेवी मंदिर के नाम पर दल की प्रमुख हथिनी का नाम चंदा रखा गया। चंदा को कॉलर आईडी भी पहनाई गई। दल के अन्य छाेटे सदस्यों का नाम भी रखा गया जिनमें मीरा, मीना, नैना, इंद्र, अरुण, वरुण, अल्फा, बीटा, गामा, प्रकृति व छाया शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ में यह 13 दल मौजूद, 300 की संख्या
वन विभाग के मुताबिक छत्तीसगढ़ में अभी 13 हाथियों का दल मौजूद हैं। इनकी करीब 300 संख्या है। इनमें रोहासी दल, सहज दल, अपना दल, गुरुघासीदास दल, बंकी दल, तपकराई दल, अशोक दल, करमा दल, गौतनी दल, शांत दल, धरमजयगढ़ दल, कोरबा दल व खुदंमुरा दल हैं।

महाराष्ट्र में घना जंगल इसलिए हाथियाें काे भाया
हाथियाें का दल छत्तीसगढ़ में बेहतर रहवास की तलाश में आया, यहां बेहतर था लेकिन गांवाें में हाथियाें काे भगा ने पटाखे चलाने और हांका दल द्वारा हांकने के कारण उन्हें संभवत: परेशानी हुई। इसी कारण पहले राम-बलराम मप्र चले गए। हाथियाें का चंदा दल गढ़चिराैली चला गया है। वहां घना और पुराना जंगल है। वहां बांस व पर्याप्त चारा भी है इस कारण हाथी उस जंगल काे सुरक्षित मान रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार भी उन्हें राेकने की तैयारी कर रही है।
-केके बिसेन, सेवानिवृत्त सीसीएफ

अब लौटने के आसार कम
हथिनी चंदा का दल महाराष्ट्र के जंगल में प्रवेश कर गया है। महाराष्ट्र सरकार हाथियों को रोकने की कार्ययोजना बना रही रही है। अब चंदा दल के छत्तीसगढ़ में दोबारा लौटने की उम्मीद कम है।
-सतोविशा समाजदार, डीएफओ

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