तनाव से मुक्ति के लिए 198 जवानों को ट्रेनिंग:साइकोलॉजिस्ट ने सिखाए स्ट्रेस मैनेजमेंट के 10 तरीके; बस्तर में 20 साथियों की ले चुके हैं जान

कोंडागांव7 महीने पहले
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कोंडागांव में जवानों को तनाव से मुक्ति को लेकर जानकारी दी गई। - Dainik Bhaskar
कोंडागांव में जवानों को तनाव से मुक्ति को लेकर जानकारी दी गई।

छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले में साइकोलॉजिस्ट ने जवानों को तनाव से मुक्त रहने के तरीके बताए हैं। बस्तर जैसे नक्सल इलाके में तैनाती के दौरान पुलिस और जनता के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाता है इसकी जानकारी भी दी गई है। नक्सल मोर्चे पर तैनात होने वाले जवानों को शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से मजबूत होने के बारे में भी बताया गया है।

दरअसल, जिले के बोरगांव पुलिस प्रशिक्षण केंद्र में विभागीय पदोन्नति परीक्षा में योग्य पाए गए जिले के 198 जवानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बिलासपुर स्थित मानसिक रोगी केंद्र में पदस्थ साइकोलाजिस्ट प्रसाद पांडे, फिजिएट्रिक सोशल वर्कर पी अतित राव समेत अन्य डॉक्टरों ने दैनिक जीवन एवं ड्यूटी के दौरान तनाव मुक्त रहने के उपाय एवं मानसिक तनाव के कारणों के संबंध में विस्तृत जानकारी दी।

जिसमें जवानों को बलून एक्टिविटी, कम्युनिकेशन एक्टिविटी कराकर केस स्टडी के माध्यम से सोशल सपोट एवं स्ट्रेस एंड स्ट्रेसर्स, स्ट्रेस एंड सुसाइड, स्ट्रेस मैनेजमेंट स्ट्रेटजी, 4ए टेक्नीक, वैंटिलेशन टेक्नीक, रिलेक्सेशन टेक्नीक, प्रॉब्लम एंड सॉल्यूशन टेक्नीक के बारे में बताया गया। साथ ही डॉक्टरों ने जवानों का मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण भी किया।

198 जवानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
198 जवानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

इस लिए जरूरी है जवानों का तनाव मुक्त रहना
दरअसल, बस्तर के अंदरुनी नक्सल इलाके में पदस्थ जवान किसी न किसी वजह से फ्रस्ट्रेशन का शिकार होते हैं। इस वजह से वे अपना आपा खो बैठते हैं और कई तरह के गलत कदम भी उठा लेते हैं। इसका बड़ा उदाहरण हाल ही में सुकमा जिले के एक CRPF जवान ने साथियों के मजाक का बुरा मान लिया था जिसके कारण उसने बैरक में सोए साथियों पर गोलियां चला दी थी। इस घटना में 4 जवानों की मौत हुई थी जबकि 3 जख्मी थे। आंकड़ों की बात करें तो पिछले कुछ सालों में बस्तर में अलग-अलग जिलों में फ्रस्टेट जवानों ने अपने ही 20 साथियों की हत्या की है।

जवानों के फ्रस्टेशन की क्या ये हो सकती है वजह?

  • 24 घंटे बीहड़ों में समय बिताना।
  • नेटवर्क न होने की वजह से परिवार वालों से बात नहीं कर पाना।
  • मनोरंजन के साधनों की कमी होना।
  • अधिकारियों और जवानों के बीच आपसी तालमेल का न होना।
  • जवानों के बीच आपसी मजाक मस्ती के बाद विवाद का बढ़ना और उनके विवाद के बीच किसी बड़े अधिकारी का हस्तक्षेप न होना।
  • जवानों को समय पर छुट्टी पर घर जाने नहीं दिया जाना।
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