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मन से त्यागें मृत्यु भोज:लोगों ने कहा- मृत्युभोज पर प्रतिबंध लगने से दुखी परिवार पर नहीं पड़ेगा आर्थिक बोझ

जगदलपुर10 महीने पहले
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  • भास्कर की मुहिम से जुड़ते चले जा रहे लोग, कई समाजों ने पहले से लगा रखा है प्रतिबंध, वहीं शहर के युवाओं ने भी रखे विचार, वाट्सएप पर मैसेज भी किए

मृत्युभोज को लेकर छेड़ी गई भास्कर की मुहिम से लोग लगातार जुड़ते चले जा रहे हैं। जहां कई समाजों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है, वहीं कुछ समाजों में आंशिक रूप से प्रतिबंध लगाया हुआ है। इसमें जहां जैन समाज ने सबसे पहले मृत्युभोज पर प्रतिबंध लगाया, वहीं सुंडी सेठिया समाज, धुरवा समाज, सतनामी समाज सहित अन्य समाजों ने भी इस पर रोक लगाई है। बताया जाता है कि मृत्युभोज पर प्रतिबंध लगाया जाना पीड़ित परिवार पर आर्थिक बोझ न पड़े, यही मंशा है। 
कई लोग भास्कर की इस मुहिम से जुड़े, जिसके लोग इसके प्रति दूसरों को भी जागरूक करने की बात कह रहे हैं। इधर साल 1960 में कानून भी बनाया गया, लेकिन इसमें किसी भी तरह की सख्ती नहीं बरती गई है। दूसरी तरफ राजस्थान सरकार ने इसे सख्ती से लागू भी कर दिया है। 
सतनामी समाज में आंशिक रूप से प्रतिबंध, अब पूरी तरह रोक की तैयारी
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज के जिलाध्यक्ष रूपेश नागेकर बताते हैं कि मृत्युभोज और अति कफन अर्पण जैसी सामाजिक कुरीति को नवंबर 2017 में आंशिक रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसमें प्रयास ये है कि मृत्युभोज आडंबरों से मुक्त और विधान परक हो और शांतिपाठ के रूप में ही संपन्न हो। कोशिश यही रहती है कि दु:खी परिवार पर आर्थिक बोझ न पड़े। सतनामी समाज भास्कर की इस मुहिम से जुड़कर इस सामाजिक कुप्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के पक्ष में हमेशा से था, है और रहेगा।
जरूरतमंदों को होती है परेशानी इसलिए जो भूखे उन्हें मिलना चाहिए खाना
शहर के युवा विमल खत्री ने बताया कि मृत्युभोज के आयोजन पर प्रतिबंध लगना चाहिए। एक तो ये समाज के हित में नहीं है, क्योंकि मृत्युभोज के नाम पर सिर्फ एक दिन में एक प्रहर का भोजन कराना जरूरतमंदों के लिए काफी नहीं होता। उन्होंने कहा कि मृत्युभोज का आयोजन न कर इस राशि का उपयोग ऐसे करना चाहिए कि जरूरतमंद, जिन्हें खाना ही नहीं मिल पाता, उन्हें भरपेट भोजन कराया जाए। भास्कर की इस मुहिम के साथ उन्होंने हमेशा खड़े होने की बात कही है। 
सामाजिक कार्य के लिए राशि दें तो दिवंगत को याद रख सकेंगे लोग
शहर के युवा व्यवसायी प्रकाश गुप्ता की मानें तो मृत्युभोज के बजाय इस राशि का उपयोग सामाजिक कार्य के लिए किया जाना चाहिए। इससे जहां जिंदगीभर लोग दिवंगत व्यक्ति को याद रख सकेंगे वहीं आम लोग इनका उपयोग कर सकेंगे। इसमें कई तरह की व्यवस्थाएं हो सकती हैं, जिसमें किसी सार्वजनिक स्थान पर पेयजल, लोगों के बैठने की व्यवस्था, गौशाला के संचालन में मदद सहित कई तरह से काम किया जा सकता है। 
60 साल पहले बना कानून चलन में नहीं शास्त्रों में भी मृत्युभोज अनिवार्य नहीं
वरिष्ठ अधिवक्ता अंजनी कुमार सिंह ने बताया कि सरकार ने 60 साल पहले ही मृत्युभोज निषेध अधिनियम 1960 लागू किया था। मृत्युभोज किसी भी शास्त्र में अनिवार्य नहीं है और न ही आज के दौर में प्रासंगिक है। इसे लेकर कानून तो बनाया गया है, लेकिन इस पर अमल नहीं हो रहा है। दरअसल ये कानून किसी को मृत्युभोज करवाने से नहीं रोकता, लेकिन किसी को मृत्युभोज करवाने बाध्य भी नहीं करता है। समय के साथ बदलाव हो रहे हैं, ऐसे में इस कुप्रथा पर प्रतिबंध लगना जरूरी है।

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