बस्तर दशहरा के दो अनूठे विधान:कांटों के झूले में बैठकर काछनदेवी देती हैं राजा को पर्व मनाने की अनुमति; उपवास रहकर कुंड में बैठकर जोगी 9 दिनों तक करते हैं तप

जगदलपुर8 दिन पहले
गुरुवार की रात जोगी बिठाई की रस्म की गई।

75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के वैसे तो सारे विधान अपने आप में अनूठे हैं, लेकिन 2 को महत्वपूर्ण माना जाता है। एक काछनगादी, तो दूसरा जोगी बिठाई की रस्म है। इन दोनों रस्मों के बिना बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति नहीं मिलती है। सालों पुरानी इन परम्पराओं को पूरे विधि विधान के साथ पूरा किया जाता है। 6 अक्टूबर को काछनदेवी ने बस्तर के राजा कमलचंद भंजदेव को दशहरा मनाने की अनुमति दे दी है। इधर गुरुवार को जोगी बिठाई की रस्म भी पूरी की गई है। परंपरा के अनुसार नवरात्र के पहले दिन जोगी उपवास रख कुंड में तप करने के लिए बैठ गए हैं। जो अब सीधे विजयादशमी के दिन ही उठेंगे।

बस्तर दशहरा का सबसे प्रमुख विधान काछनगादी है। मान्यता अनुसार पनका जाति की एक बालिका पर काछन देवी आती हैं, जिन्हें बेल के कांटों के झूले में झुलाया जाता है। इसके बाद बस्तर के राजा सहित राज परिवार के द्वारा देवी से बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति ली जाती है। कांटों पर झूलते हुए काछन देवी बस्तर के राजा को दशहरा मनाने की अनुमति देती हैं। पिछले 6 सालों से एक बालिका अनुराधा इस विधान को पूरा करते आ रही हैं।

परंपरा अनुसार कांटों के झूले में झूलती का काछनदेवी।
परंपरा अनुसार कांटों के झूले में झूलती का काछनदेवी।

काछनगुड़ी में होती है यह रस्म ​​​​​​
जगदलपुर के भंगाराम चौक के पास स्थित काछनगुड़ी में यह रस्म होती है। इसे देखने व माता से आशीर्वाद लेने सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। काछनदेवी के पुजारी गणेश दास ने बताया कि, बस्तर महाराजा दलपत देव ने काछनगुड़ी का जीर्णोद्धार कराया था। करीब 700 साल से यह परंपरा इसी गुड़ी में संपन्न हो रही है। उन्होंने बताया कि, काछनदेवी को रण की देवी भी कहा जाता है। पनका जाति की महिलाएं धनकुल वादन के साथ गीत भी गाती हैं। बुधवार को बस्तर राजा ने देवी से दशहरा मनाने की अनुमति भी ले ली है।

रंगीन रोशनी से सजाया गया जगदलपुर का मां दंतेश्वरी मंदिर।
रंगीन रोशनी से सजाया गया जगदलपुर का मां दंतेश्वरी मंदिर।

विधान को पूरा करने करना होता है इन नियमों का पालन
काछनगादी रस्म के पहले 12 साल की अनुराधा को 7 दिन पहले से कठोर व्रत रखवाया गया था। रोज शाम को विशेष पूजा में भी शामिल किया गया। इसके अनुग्रह से ही बस्तर दशहरा बिना किसी अड़चन के होना माना जाता है। 75 दिनों तक चलने वाले इस बस्तर दशहरा पर्व संपन्न कराने की अनुमति देने से पहले काछन गुड़ी से देवी के रूप में विराजित अनुराधा का पुजारी ने आह्वान किया। बाद में देवी ने बेल के कांटों से बने झूले की 3 बार परिक्रमा की। इसके बाद उन्हें कांटे के झूले पर झुलाया गया। माता ने माटी पुजारी का निवेदन स्वीकार किया और उन्हें फूल दिया।

परंपरा को देखने उमड़ी लोगों की भीड़।
परंपरा को देखने उमड़ी लोगों की भीड़।

राजा की जगह जोगी उपवास रख करते हैं तप
बस्तर दशहरा की दूसरी सबसे बड़ी रस्म जोगी बिठाई है। केवल पुरुष ही इस रस्म की अदायगी करते हैं। इस परंपरा को इस बार आमाबाल गांव के रघुनाग ने निभाई है। मांझी-चालकी व पुजारी की मौजूदगी में जोगी को नए वस्त्र पहनाए गए। इसके बाद उसे गाजे-बाजे के साथ कपड़ों के पर्दे की आड़ में सिरासार के पास स्थित मावली माता मंदिर ले जाया गया। इसके बाद वहां रखे तलवार की पूजा कर फिर तलवार लेकर जोगी को दिया गया है। इस तलवार को लेकर जोगी वापस सिरासार भवन में पहुंचे। पुजारी के प्रार्थना उपरांत उपवास कर संकल्प लेकर एक कुंड में बैठे। जोगी ने कहा कि, इस साल बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के संपन्न होगा।

कुंड में बैठे जोगी।
कुंड में बैठे जोगी।

बस्तर दशहरा पर्व का महत्वपूर्ण विधान जोगी बिठाई की रस्म गुरुवार शाम सिरहासार भवन में पूरी की गई। सालों से चली आ रही परंपरा के अनुसार आमाबाल गांव के रघुनाग बने जोगी को इस विधान को पूरा करने के लिए जहां पर मंदिर में पुजारी द्वारा दीप जलाकर मावली देवी की पूजा-अर्चना की। इसके बाद वहां रखे तलवार की पूजा कर उस तलवार लेकर जोगी दिया गया है। इस तलवार को लेकर जोगी वापस सिरासार भवन में पहुंचे। पुजारी के प्रार्थना उपरांत जोगी 8 दिनों तक साधना का संकल्प लेकर गड्ढे में बैठे। जोगी ने कहा कि इस साल भी बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के संपन्न होगा।

काछनगुड़ी में देव परिक्रमा कराई गई।
काछनगुड़ी में देव परिक्रमा कराई गई।

जोगी बिठाई की यह है मान्यता
मान्यता के अनुसार, जोगी के तप से देवी प्रसन्न होती हैं। सालों से दशहरा विधान में जोगी नवरात्र के पहले दिन से लेकर विजयादशमी तक साधना में लीन रहता है। नवरात्र के दूसरे दिन की शुरुआत के साथ ही मां दंतेश्वरी के प्रथम पुजारी के रूप में जोगी एक ही जगह बैठकर कठिन व्रत रखते हैं। बताया जाता है कि, देवी की उपासना बस्तर राजा को करनी होती थी, ताकि यहां खुशहाली रहे। लेकिन 9 दिनों तक राजा की जगह जोगी को देवी की उपासना के लिए बैठाया जाता है और आज भी ये परंपरा जारी है। जिससे दशहरा का पर्व शांतिपूर्ण तरीके से मनाया जा सके।

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