बस्तर दशहरा में रावण दहन नहीं, रथ परिक्रमा:साल और तिनसा की लकड़ी से बने 2 मंजिला रथ पर मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ होती है परिक्रमा; 610 साल से है परम्परा

जगदलपुर4 महीने पहले

75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के सभी विधान अनूठे हैं। यहां रावण का दहन नहीं होता, बल्कि रथ की परिक्रमा कराई जाती है। शारदीय नवरात्रि के शुरुआती 5-6 दिनों तक चार पहियों वाले फूल रथ की परिक्रमा होती है। विजयादशमी तक विजय रथ की परिक्रमा कराने की परम्परा है। बस्तर के इतिहास के अनुसार, यह विधान लगभग 610 साल पुराना है। यहां रथ परिक्रमा की कई मान्यताएं भी हैं। बस्तर दशहरा में शामिल होने संभाग भर से विभिन्न जनजातियों के लोग पहुंचते हैं। हर दिन अलग-अलग रस्म की अदायगी होती है।

सैकड़ों ग्रामीणों ने मिलकर रथ को खींचा है।
सैकड़ों ग्रामीणों ने मिलकर रथ को खींचा है।

बस्तर के इस दशहरा का शुभारंभ चक्रकोट राज्य में हुआ था। बताया जाता है कि तत्कालीन राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में उन दिनों चक्रकोट की राजधानी बड़े डोंगर थी। चक्रकोट एक स्वतंत्र राज्य था। राजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। बस्तर के इतिहास के अनुसार, साल 1408 के कुछ समय पश्चात राजा पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथ पुरी की पदयात्रा की थी। वहां भगवान जगन्नाथ की कृपा से उन्हें रथपति की उपाधि दी गई थी। उपाधि के साथ उन्हें 16 पहियों वाला विशाल रथ भी भेंट किया गया था। उन दिनों बस्तर के किसी भी इलाके की सड़कों में इन्हें चलाना मुश्किल था।

सोमवार को बस्तर दशहरे में फूल रथ की चौथी परिक्रमा पूरी की गई है।
सोमवार को बस्तर दशहरे में फूल रथ की चौथी परिक्रमा पूरी की गई है।

तीन हिस्सों में बांटा गया था रथ
16 पहियों वाले विशाल रथ को तीन हिस्सों में बांटा गया था। भगवान जगन्नाथ के लिए चार पहियों वाला रथ बनाया गया। बस्तर दशहरा के लिए दो रथ बनाए गए, जिनमें से एक फूल रथ और दूसरा विजय रथ है। फूल रथ तिथि अनुसार 5 -6 दिनों तक चलता है। इसमें चार पहिए होते हैं, वहीं दशहरा व दूसरे दिन चलने वाले आठ पहिए के विशाल रथ को विजय रथ कहते हैं। इस रथ संचलन को स्थानीय भीतर रैनी और बाहर रैनी कहते हैं। बस्तर दशहरा की विभिन्न रस्में होती हैं, जो 75 दिनों तक चलती रहती हैं। चार पहियों वाले फूल रथ को कचोरापाटी और अगरवारा परगना के ग्रामीण खींचते हैं। आठ पहियों वाले विजय रथ को किलेपाल क्षेत्र के माड़िया खींचते हैं।

रथ में केवल साल और तिनसा प्रजाति की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।
रथ में केवल साल और तिनसा प्रजाति की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।

साल और तिनसा प्रजाति की लकड़ी से बनता है रथ
बस्तर दशहरा के लिए बनने वाले रथ में केवल साल और तिनसा प्रजाति की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है। इस साल भी डेरीगड़ाई रस्म अदा करने के बाद ही तिनसा प्रजाति की लकड़ियों से पहिए का एक्सल तो वहीं साल की लकड़ियों से रथ का निर्माण हुआ है। परम्परा अनुसार बस्तर के झारउमरगांव व बेड़ाउमरगांव के ग्रामीण ही रथ का निर्माण करते हैं। रथ बनाने के लिए आधुनिक नहीं बल्कि पारम्परिक औजारों का ही उपयोग किया जाता है। इस साल भी लगभग 100 से ज्यादा कारीगरों ने मिलकर लगभग 15 दिनों में ही 2 मंजिला रथ का निर्माण किया।

मां दंतेश्वरी मंदिर के पास ली गई रथ की तस्वीर। (फोटो -अंजार नबी)
मां दंतेश्वरी मंदिर के पास ली गई रथ की तस्वीर। (फोटो -अंजार नबी)

सोमवार को फूल रथ की हुई चौथी परिक्रमा
परम्परा अनुसार सोमवार को बस्तर दशहरा में फूल रथ की चौथी परिक्रमा पूरी की गई है। रथ में मां दंतेश्वरी का छत्र रखा गया। मां दंतेश्वरी के छत्र को पहली बार महिला पुलिस बल ने हर्ष फायर कर सलामी दी। साथ ही पुलिस के बैंड से परंपरानुसार भक्ति धुन बजाई गई। माई जी का छत्र दंतेश्वरी मंदिर से पहले मावली मंदिर, काली कंकाली और जगन्नाथ राम मंदिर लाया गया। इसके बाद सिरहासार के पास खड़े विशाल फूल रथ में विराजित किया गया। विभिन्न गांवों से आए ग्रामीणों ने रथ खींचना प्रारंभ किया। रथ को सबसे पहले जगन्नाथ मंदिर के सामने रोका गया, यहां केवट जाति की महिलाओं ने रथ पर लाई-चना न्यौछावर किए।