बीजापुर में 'पत्थरों का परिवार':युवाओं ने खोजा दोबे की पहाड़ियों के बीच पर्यटन स्थल; मान्यता- यहां देवता करते हैं वास, कई चट्‌टानें किलेनुमा हैं

जगदलपुर2 महीने पहले
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छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले के स्थानीय युवाओं ने एक और पर्यटन स्थल की खोज की है। बीहड़ों में दोबे की पहाड़ियों के बीच पत्थरों का एक गांव है, जिसे पत्थरों का परिवार भी कहा जाता है। यहां घास के मैदान, बीच में गुजरता नाला और इन सब के बीच दूर तक पत्थरों की अद्भुत कलाकृतियां हैं। बीजापुर के उसूर ब्लॉक में नीलम सरई और नम्बी जलधारा के बीच एक पहाड़ी है, जिसे दोबे के नाम से जाना जाता है। यहां छोटी-बड़ी सैकड़ों चट्टानें हैं।

इसे पत्थरों का परिवार भी कहा जाता है।
इसे पत्थरों का परिवार भी कहा जाता है।

दोबे तक पहुंचने के लिए बीजापुर जिला मुख्यालय से सड़क मार्ग से आवापल्ली, फिर उसूर पहुंचने पर यहां सोढ़ी पारा से नीलम सरई तक पहाड़ी की चढ़ाई को पूरी करनी होगी। नीलम सरई से लगभग डेढ़ से दो किमी घना जंगल और पहाड़ी रास्ते का सफर करना होगा। प्राकृतिक सुंदरता के बीच यहां कोसों तक इंसानों की बस्ती नजर नहीं आती है। यहां कई ऊंची चट्टानें किलेनुमा दिखती हैं।

इस पहाड़ी पर एक या दो नहीं बल्कि छोटी-बड़ी सैकड़ों चट्टानें हैं।
इस पहाड़ी पर एक या दो नहीं बल्कि छोटी-बड़ी सैकड़ों चट्टानें हैं।

खोह में आदिम युग का होता है एहसास
कई फीट ऊंची चट्टानों में खोह को देखकर आदिम युग का एहसास होता है। एक खोह काफी बड़ी है, जिसमें एक साथ दर्जन भर लोग आ सकते हैं। स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो इन खोह में अकसर जंगली जानवर होते हैं। शिकार के दौरान जब वो यहां पहुंचते हैं तो खोह ही उनके ठहरने का स्थल होता है। गर्मियों के मौसम में चट्टानों के ऊपर विश्राम करते हैं, अचानक बारिश हो जाए तो खोह के भीतर शरण लेते हैं।

स्थानीय युवाओं की टीम ने बोन फायर और कैंपिंग कर एडवेंचर का लुत्फ उठाया था।
स्थानीय युवाओं की टीम ने बोन फायर और कैंपिंग कर एडवेंचर का लुत्फ उठाया था।

मान्यता है- पहाड़ पर देवताओं का है वास
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि दोबे पर देवताओं का वास है। रविवार-सोमवार की मध्य रात्रि पहाड़ पर बाजा, मोहरी, ढोल आदि पारंपरिक वाद्य के साथ नृत्य की ध्वनि सुनाई पड़ती है। सब कुछ अदृश्य होता है, लेकिन ध्वनि कानों तक स्पष्ट सुनाई पड़ती है। ग्रामीणों के अनुसार इस वक्त देवी-देवताओं क आगमन होता है और उनके स्वागत में ढोल, बाजा, मोहरी बजते हैं। इसके अलावा भी और कई रोचक कहानियां इन पहाड़ियों से जुड़ी हुई हैं।

स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि दोबे पर देवताओं का वास है।
स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि दोबे पर देवताओं का वास है।

पहली बार बोन फायर और कैंपिंग
नीलम सरई में पर्यटन को बढ़ावा देने वाली दर्शनीय बीजापुर नाम की स्थानीय युवाओं की टीम कुछ दिन पहले दोबे पहुंची थी। नीलम से आगे दोबे पहुंचकर टीम के सदस्यों ने एक खोह में रात बिताई। यहीं बोन फायर और कैंपिंग कर एडवेंचर का लुत्फ उठाया था। टीम के सदस्य रंजन दास कहते हैं कि प्रकृति को नुकसान ना पहुंचा कर भ्रमण के उद्देश्य से सैलानी यहां पहुंच सकते हैं। स्थानीय प्रशासन दोबे तक सैलानियों की पहुंच आसान बनाने और सुरक्षात्मक पहलुओं को ध्यान में रखकर ठोस कदम उठाए तो आने वाले दिनों में दोबे सैलानियों के लिए रोमांच भरे पर्यटन से कम नहीं होगा।

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