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स्वावलंबन:नक्सल प्रभावित गांव में गोबर से दीए बना रहीं महिलाएं, 12 हजार दीपक बनाने का लक्ष्य

जगदलपुरएक महीने पहले
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  • भैरमगढ़ ब्लॉक के नक्सल प्रभावित गांव पाथरपारा की संतोषी स्वसहायता समूह की महिलाएं अब तक 2 हजार दीए बना चुकीं, जिला प्रशासन की ओर से दिया गया था प्रशिक्षण

बीजापुर जिले के नक्सल प्रभावित ब्लॉक भैरमगढ़ को इस साल दिवाली पर गोबर के दीये से रोशन करने की तैयारी शुरू हो गई है। पर्यावरण संरक्षण और महिला स्वसहायता समूहों को रोजगार मुहैया कराने की दिशा में गोबर से बने दीये को अहम माना जा रहा है। रंग-बिरंगे गोबर के ये दीये भैरमगढ़ में पहली बार बनाए जा रहे हैं। प्रदेश के कई शहरों में तेजी से इसकी बिक्री हो रही है। इसको देखते हुए इस ब्लॉक के पाथरपारा की संतोषी महिला स्वसहायता समूह की महिलाएं इन दिनों तेजी से दीये बना रही हैं। कुछ समय पहले तक यहां महिलाएं खेतों में काम करतीं, घर संभालतीं और गोठान में गाय का गोबर उठाते नजर आती थीं। इन्हीं महिलाओं ने गाय के गोबर को आर्थिक और सामाजिक स्थिति मजबूत करने का जरिया बना लिया है। समूह की महिला ओं ने कहा कि इस साल उन्होंने 12 हजार दीपक बनाने की ठानी है। महिलाओं ने कहा यह पहली बार जब इस ब्लॉक में रहने वाले लोग गोबर के दीये से घरों को रोशन कर दिवाली मनाएंगे। गौरतलब कि भैरमगढ़ ब्लॉक नक्सली मामलों को लेकर संवेदनशील ब्लॉक की श्रेणी में आता है। जून 2019 में केशुकुतूल में हुई मुठभेड़ में दो जवान शहीद हो गए थे।

ऐसे आत्मनिर्भर बन रहीं गांव की स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाएं
महिलाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, बिहान के स्वसहायता समूहों से जोड़कर प्रशासन द्वारा महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया गया। यह प्रयास सफल रहा और अब महिलाएं इस कलाकारी के जरिए आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। गोबर से निर्मित दीये इस दिवाली में घरों को रोशन करने तैयार हैं। समूह की अध्यक्ष हेमबती कुदराम और सचिव बसंती यादव के साथ ही अन्य महिलाओं ने कहा कि वे पहले गोठान में वर्मी कंपोस्ट बनाते थे। दीया बनाने का प्रशिक्षण मिलने के बाद वे इस काम को कर रही है। इससे उनकी आमदनी में जहां बढ़ोतरी होगी तो वहीं दूसरी ओर उन्हें रोजगार भी मिला है।

गाय के गोबर में मिलाते हैं गोंद फिर दीए को आकार देते हैं
महिलाओं ने बताया कि करीब ढाई किलो गोबर के पाउडर में एक किलो प्रीमिक्स और गोंद मिलाते हैं। गीली मिट्टी की तरह सानने के बाद इसे हाथ से खूबसूरत आकार दिया जाता है। इसके बाद इसे दो दिनों तक धूप में सुखाने के बाद अलग-अलग रंगों से सजाया जाता है। अभी तक दो हजार दीयों का निर्माण हुआ है। इको फ्रेंडली होने के कारण जिले के अन्य शहरों इसकी मांग होगी इसकी पूरी संभावना है। उन्होने कहा कि इसके अलावा गोबर के बचे हुए चूर्ण और पत्तियों से ऑर्गेनिक खाद भी बना रही हैं।

24 रुपए दर्जन में गोबर के दीये बेचने की बनाई गई है योजना
विकास खंड परियोजना प्रबंधक रोहित सोरी ने बताया कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से पाथरस की 10 महिलाओं को हमने गोबर के दीये और ऑर्गेनिक खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया है। ईको फ्रेंडली होने के कारण इन दीयों की काफी मांग आ रही है। दीपक को बेचने में समूह को कोई परेशानी नहीं हो, इसके लिए 24 रुपए दर्जन के हिसाब से ये दीये बेचे जाएंगे। दीये को दीपावली में उपयोग करने के बाद जैविक खाद बनाने उपयोग में लाया जा सकता है। दीये के अवशेष को गमला या कीचन गार्डन में भी उपयोग किया जा सकता है। इस तरह मिट्टी के दीये बनाने और पकाने में पर्यावरण को होने वाले नुकसान के स्थान पर गोबर को दीये को इकोफ्रेंडली माना जा रहा है।

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