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मनुष्य के विनाश का कारण अंहकार:ग्राम धनगांव में श्रीमद्भागवत कथा प्रवचन का आयोजन, सहजता और सौम्यता हैं बड़प्पन के गुण

नवागढ़/अंधियारखोरएक महीने पहले
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ग्राम धनगांव में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन गौरव कृष्ण शास्त्री के शिष्य अमर कृष्ण शास्त्री महाराज ने कहा कि प्रभु तक पहुंचने के लिए गुरु की शिक्षा व सत्संग सुगम सीढ़ी है। अहंकार को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए। मनुष्य के विनाश का मूल कारण अहंकार ही होता है। सहजता और सौम्यता बड़प्पन के गुण हैं। मनुष्य को अहंकार से दूर रहकर भगवान का स्मरण करना चाहिए तभी भगवान की प्राप्ति संभव है।

प्रवचन का आयोजन रामसजीवन तिवारी के निवास पर किया गया है। कथा प्रवचन में शास्त्री ने महाराज शुकदेव व राजा परीक्षित के बीच संवाद की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि शुकदेव जी कहते है कि हे राजन भगवत कथा का श्रवण कर बुद्धि एवं अहंकार का परित्याग करें। राजा के कारण पूछने पर जवाब मिला कि जीव जब साधना की पराकाष्ठा पर पहुंचता है तो बुद्धि गौण हो जाती है। वक्ता भी बुद्धि का त्याग कर कथा कहता है। शुकदेव जी ने रहस्य अनावृत करते हुए समझाया कि जिस तरह मयूर सावन ऋतु आते ही स्वत: मनोहारी नृत्य करने लगता है। वसंत के आगमन के साथ ही कोयल कू-कू गीत गाने लगती है। उसी प्रकार वक्ता प्रभु की कृपा से कथा का वाचन करता है।

दूसरे दिवस की कथा में परीक्षित जन्म

दूसरे दिवस की कथा में अमर कृष्ण शास्त्री ने कहा कि उत्तरा के गर्भ से मृत बालक के जन्म का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण तुरन्त ही सात्यकि को साथ लेकर अन्तःपुर पहुंचे। वहां रनिवास में करुण क्रंदन को सुनकर उनका हृदय भर आया। इतना करुण क्रंदन युद्ध में मरे हुए पुत्रों के लिए भी सुभद्रा और द्रौपदी ने नहीं किया था, जितना कि उस नवजात शिशु की मृत्यु पर कर रही थीं।

श्रीकृष्ण ने उस बालक पर अपनी अमृतमयी दृष्टि डाली और बोले यदि मैंने कभी झूठ नहीं बोला है, सदा ब्रह्मचर्य व्रत का नियम से पालन किया है, युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई है, मैंने कभी भूल से भी अधर्म नहीं किया है तो अभिमन्यु का यह मृत बालक जीवित हो जाए। उनके इतना कहते ही वह बालक हाथ पैर हिलाते हुए रुदन करने लगा। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सत्य और धर्म के बल से ब्रह्मास्त्र को पीछे लौटाकर ब्रह्मलोक में भेज दिया। श्रीकृष्ण ने उस बालक का नाम परीक्षित रखा।

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