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कोरोना ने छीना रोजगार:बस मालिक 8 हजार रोज कमाता था, दूसरे की गाड़ी चलाकर ~400 कमा पा रहा

खरोराएक महीने पहले
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श्याम अग्रवाल | कोरोना संक्रमण के कारण केंद्र सरकार द्वारा मार्च में लगाए लॉकडाउन से हर वर्ग का व्यापार प्रभावित हुआ है। अनलॉक के बाद कुछ काराेबार तो पटरी पर आ गए हैं लेकिन बस संचालकों के अलावा ड्राइवर-कंडक्टराें को आर्थिक परेशानी से जूझना पड़ रहा है। ड्राइवर-कंडक्टर सहित बस व्यवसाय से जुड़े लोग मजबूरी में मजदूरी, फल दुकान, सब्जी दुकान या अन्य कोई काम कर रहे हैं। खरोरा के पास स्थित ग्राम फरहदा में रहने वाले हीरालाल यादव भी 4 बसों के मालिक हैं पर अनलॉक के सख्त नियमों के कारण वे अपनी बस न चलाकर दूसरे के बस में ड्राइवरी कर रहे हैं, जबकि पहले ने 12 लोगों को रोजगार दे रहे थे। आर्थिक तंगी से परेशान होकर वर्तमान में वे खरोरा में श्याम बिल्डिंग मटेरियल कंपनी में 400 रुपए रोजी पर गाड़ी चला रहे हैं। पत्नी व 2 बच्चों का किसी तरह गुजारा हो जा रहा है।

मार्च से खड़ी कर दी हैं 4 बसें हीरालाल यादव ने
वे बोल बम ट्रैवल्स कंपनी के मालिक थे जिनकी 4 बसें ग्राम समोदा से कोसरंगी, मंदिरहसौद होते हुए रायपुर आना-जाना करती थीं। मार्च से इनकी 4 बसें खड़ी हो गई हैं। वे लॉकडाउन के पहले तक खुद 12 लोगों को रोजगार देते थे व प्रतिदिन खर्चे काटकर 8000 रुपए कमा लेते थे। वहीं लॉकडाउन में 6 महीने बस सेवा बंद होने से मानो इनकी जिंदगी पलट दी हो, लॉकडाउन में नियम इतने सख्त कि उनका पालन करना मुश्किल है। जैसे 32 सीटर बस में सामाजिक दूरी का पालन करते हुए केवल 16 लोग सवार होंगे, अगर बस में 16 लोगों को ले जाया जाएगा तो उससे पेट्रोल व ड्राइवर का भी खर्चा नहीं निकलेगा। अभी सवारी भी कोरोना से डरी हुई हैं जिससे वे बस में सफर न करके अपने निजी साधनों से सफर कर रही हैं।

दर्द भरी कहानियां और भी हैं... कोई मजदूरी कर रहा तो कोई सब्जी बेच रहा
वहीं माठ ग्राम के दिनेश यादव जो कि पहले रायपुर में बस चलाया करते थे, उन्हें भी मालिक ने नौकरी से निकाल दिया तो अब गांव में ही 150 रुपए रोजी पर दिहाड़ी मजदूरी कर रहे हैं, जबकि पहले 7 हजार रुपए एकमुश्त तनख्वाह मिल जाती थी, अब तो रोज कमाओ रोज खाओ...जिस काम नहीं उस दिन दाम भी नहीं। माता-पिता व 3 बच्चों का भार उन्हीं पर है, पति-पत्नी दोनों मजदूरी करने लगे हैं जबकि पहले पत्नी मजदूरी नहीं करती थी। उन्होंने कहा-जीवन हर पल सबक देता है, ये सबक भी सही।

वहीं खरोरा के जागेश्वर महारा जो पहले 7 हजार रुपए माहवारी पर जीप के ड्राइवर थे, अब कोरोनाकाल में बेरोजगार होकर सब्जी बेचने लगे हैं। उन्होंने अपना दर्द भास्कर से साझा कर कहा कि अब अगर जीप शुरू भी हुई तो भी वह सब्जी ही बेचेंगे क्योंकि जीप चलाने में जान का खतरा भी रहता है व दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। सब्जी बेचकर प्रतिदिन 200 रुपए कमा लेता हूं, लेकिन खुद का धंधा है अगर किसी दिन तबीयत ठीक नहीं लगती तो उस दिन सब्जी बेचने नहीं जाता लेकिन पहले ऐसा नहीं था। पहले जब मालिक की गाड़ी चलाता था तो रोज जाना पड़ता था, डर रहता था कि मालिक किसी और को काम पर न रख ले।

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