भीमा कोरेगांव केस से जुड़ीं सुधा भारद्वाज की कहानी:IIT के बाद वकील बनीं, ताकि मजदूरों को हक दिला सकें; जेल में एप्लिकेशन वाली आंटी बुलाते थे कैदी

रायपुर4 महीने पहलेलेखक: विश्वेश ठाकरे
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ट्रेड यूनियन, मजदूरों, आदिवासियों के लिए, उनके अधिकार की लड़ाई लड़ने वाली सुधा भारद्वाज छत्तीसगढ़ में जाना-पहचाना नाम हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद उनकी गिरफ्तारी ने सुधा को दुनिया भर में चर्चा में ला दिया। 23 साल की उम्र में अमेरिकी पासपोर्ट लौटाकर भारत के दलित-वंचित की लड़ाई के लिए सुधा ने यहीं बस जाने का इरादा किया था।

सामाजिक कार्यकर्ता और एडवोकेट सुधा भारद्वाज पिछले महीने साढ़े तीन साल की जेल काटने के बाद जमानत पर बाहर आई हैं। 1 जनवरी 2018 में पुणे के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा भड़काने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। अगस्त 2018 में उन्हें पहले घर में ही नजरबंद कर रखा गया था और फिर जेल भेज दिया गया। जमानत पर बाहर आने के बाद उन्होंने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की।

सुधा की जमानत शर्तों में मुंबई नहीं छोड़ने के साथ-साथ, भीमा कोरेगांव हिंसा पर सार्वजनिक बयान नहीं देने और मीडिया से इस मसले पर बात नहीं करने की रोक भी शामिल है। इस शर्त को देखते हुए हमने उनसे इस केस के अलावा दूसरे कई मुद्दों पर लंबी बात की।

काल कोठरियों वाली अंधेरी बैरक में लंबा समय काटने के बाद भी सुधा के लड़ने का जज्बा कायम है। वे कहती हैं, सबसे जरूरी है इस देश में गरीबों, मजदूरों, आदिवासियों को बिना छले उनका अधिकार मिलना। सामाजिक समानता से, भाईचारे से ही भारत दुनिया का सबसे खुशहाल देश हो सकता है। पढ़िए उनसे बातचीत के खास अंश...

सबसे पहले बचपन और परिवार के बारे में बताएं?
सुधा ने बताया, 'मेरा जन्म अमेरिका में हुआ। सिटिजनशिप भी वहीं की थी। 4 साल की थी, तब पेरेंट्स अलग हो गए। मां कृष्णा मुझे लेकर इंग्लैंड की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी आ गईं। वे इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर थीं। मेरी शुरुआती यादें कैंब्रिज के विशाल परिसर की हैं। मैं 11 साल की हुई तो मां ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) जॉइन कर लिया। उन्होंने यहां सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग की स्थापना में अहम रोल निभाया। यहां से मेरी भारत की जर्नी शुरू हुई और सामाजिक दायित्व की भी।

जेएनयू एक किशोर होती बच्ची के लिए दिलचस्प जगह थी। खूब चर्चाएं-बहस होती थी। मुझे उस उम्र में वियतनाम मुक्ति समारोह में भाग लेना याद है। इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ निकला मशाल जुलूस याद है। वहां लोग करियर के साथ दुनिया बदलने का सपना देखते थे। ऐसे लोगों का साथ उस उम्र में मिला, जब आप अपने जीवन को दिशा देते हैं। स्वाभाविक रूप से सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास भी आया।'

करियर के बारे में क्या सोच थी?
सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, 'घर में पढ़ाई-लिखाई वाला माहौल था, इसलिए पढ़ने में दिलचस्पी थी। IIT कानपुर में M.SC करने चली गई। वहां गणित विषय लिया। 1979 में IIT गई, पांच साल के इंटिग्रेटेड कोर्स के लिए। वहां भी जातिगत भेदभाव देखा। जब छुट्टियों में घर आती तो दिल्ली में एशियाड की तैयारी देखती। 1982 में एशियाड के लिए JNU के पास पांच सितारा होटल, बड़े स्टेडियम बन रहे थे। कांटेदार तारों के बाड़े के बीच मजदूर काम करते और रहते। उन्हें बाहर आने-जाने की इजाजत नहीं थी।

इनमें से ज्यादातर ओडिशा और छत्तीसगढ़ के थे। JNU और AIIMS के छात्र, इंटर्न डॉक्टर मजदूरों की मदद करने, इलाज करने वहां जाते। मैं भी उनके साथ जाती और बच्चों को पढ़ाती। इसी दौरान मजदूरों के शोषण का पता चला। एक मजदूर ने बताया कि उसके पिता की मौत हो गई, लेकिन ठेकेदार ने उसे घर जाने नहीं दिया। बाद में वह मजदूर लापता हो गया। इस तरह की कई कहानियां वहां देखने मिलीं। तब तय किया कि गरीबों के लिए एक या दो दिन काम करने से नहीं चलेगा। पूरा समय देना होगा।'

यह तो सामाजिक जीवन की शुरुआत हुई, पूरी तरह समर्पित कैसे हुईं?
उन्होंने कहा, 'पूरी तरह सामाजिक कार्य से जुड़ने और छत्तीसगढ़ से जुड़ने की भी शुरुआत 1983 से हुई। जाने माने ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी का संगठन था छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा। वे माइंस में काम करने वाले मजदूरों के लिए लड़ रहे थे। उन्हें 1983 में गिरफ्तार कर लिया गया था। दिल्ली के क्लाथ मिल में उनकी रिहाई के लिए हड़ताल हुई। यहां मैंने उनके बारे में सुना और रिहाई के आंदोलन में शामिल हो गई। जब वे रिहा हुए तो हमसे मिलने आए। उनके साथ पहली बार मैं छत्तीसगढ़ के दल्ली राजहरा आई। यहां मजदूरों की सक्रियता, संगठन की गतिविधियां देखकर मैं बेहद प्रभावित हुई।'

अमेरिकी पासपोर्ट क्यों वापस किया, वहां सुविधाजनक जीवन गुजार सकती थीं?​​​​​​​
वे बताती हैं, 'मैं जब 21 साल की हुई तो मुझे आजादी थी, कि मैं अमेरिकी रहूं या भारतीय। मुझे लगता था, कि अमेरिका में जन्म तो संयोग था, क्योंकि माता-पिता वहां थे। बुनियादी तौर पर मैं भारतीय थी, लिहाजा भारतीय बनी। यहां सामाजिक मुद्दों से भी मैं जुड़ चुकी थी, इसलिए भी भारत की नागरिकता लेने का निर्णय और मजबूत हुआ। 1984 में सिख विरोधी दंगों और भोपाल त्रासदी ने मुझे हिला दिया था। तब मेरा जनता की बेहतरी के लिए काम करने का इरादा और मजबूत हुआ। मुझे इस बात का कभी अफसोस नहीं हुआ कि मैं अमेरिकी से भारतीय क्यों हो गई। यह मेरा फैसला था।'

इस तरह के जीवन में आने को लेकर मां क्या सोचती थीं?
सुधा ने कहा, 'मां को चिंता थी। जैसी हर माता-पिता को होती है। वे सुरक्षित जीवन चाहती थीं, लेकिन मैंने 1986 में पूरी तरह छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से जुड़ने का मन बना लिया। मैं दल्ली राजहरा में मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने लगी। यहां यूनियन स्कूल और अस्पताल चलाता था। उनके सांस्कृतिक दल थे, जो क्रांतिकारियों की जीवन गाथा के जरिए संदेश देते थे। मैंने भी मजदूरों को एक करने का बीड़ा उठाया।'

यूनियन नेताओं और मजदूरों पर हमले हुए, ऐसे में क्या भूमिका चुनी?
सुधा ने बताया, 'मुझे सीधे तौर पर ऐसे किसी हमले का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन साथियों पर जानलेवा हमले हुए। 1991-92 में जब ठेका मजदूरों को नियमित करने का आंदोलन चलाया जा रहा था, उसी समय शंकर गुहा नियोगी की हत्या हो गई। उससे पहले रायपुर, सिम्पलेक्स फैक्ट्री के सामने धरना दे रहे मजदूरों पर तलवारों से हमला किया गया। ऐसी कई घटनाएं हुईं, लेकिन मैंने ठाना था कि अब ना डरना है ना झुकना है। मैं डटी रही।'

गणित में Msc करने के बाद वकील क्यों बनीं?
उन्होंने कहा, 'नियोगी जी की हत्या के बाद कई मुकदमे करने पड़े। मजदूरों के पास वकीलों को देने के लिए पैसे नहीं थे। यूनियन को बड़े कॉरपोरेट के खिलाफ लड़ाई लड़नी थी। ऐसे में समझ में नहीं आता था कि आपका पक्ष रखने वाले ही खरीद तो नहीं लिए जाएंगे। ऐसे में निर्णय लिया कि मैं ही वकालत करूंगी। 40 साल की उम्र में सन 2000 में मैं वकील बन गई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में कई मुकदमे लड़े, कई चल रहे हैं। इनमें आदिवासियों के अधिकार, विस्थापन के गलत तरीकों के हैं तो कई शोषण के दूसरे तरीकों के खिलाफ।'

अगस्त 2018 में हाउस अरेस्ट, फिर अक्टूबर में पुणे की यरवदा जेल; आखिर कैसे दिन काटे क्या मुश्किलें आईं?
वे बताती हैं, 'मुझे सेपरेट यार्ड में रखा गया। मेरे साथ ही प्रोफेसर शोमा सेन को भी बाजू वाली कोठरी में रखा गया था। सेपरेट यार्ड में 2 और महिलाएं थीं, जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। बात करना उनके स्वभाव में नहीं था। हमें इस पिंजरे जैसी इमारत से सिर्फ 12 से 12.30 दोपहर को बाहर धूप लेने के लिए निकाला जाता। उस समय दूसरे कैदी अपनी बैरक में होते।

यरवदा जेल में पानी की कमी है। हमें दिन में सिर्फ 4 बाल्टी पानी मिलता था, जिसे हमें अपनी कोठरी में रखना पड़ता था। वहां प्रोफेसर सेन को छोड़कर आपस में बात करने के लिए कोई नहीं था। हमें खाना भी सबके साथ नहीं, अपनी कोठरी में ही खाना पड़ता। जब कोर्ट जाते थे तो गाड़ी में ही हम दूसरे बंदियों से मिल पाते थे। यरवदा में मैं दिनभर कुछ ना कुछ लिखती थी। यहीं मैंने मराठी भी सीखी। उसकी लिपि देवनागरी है, लिहाजा पढ़ने में आसानी हुई। मराठी में अनुवाद की गईं पुस्तकें भी पढ़ीं।'

यरवदा से भायखला जेल भेजा गया, उसका अनुभव कैसा था?
कहती हैं, 'फरवरी 2020 में मुंबई की भायखला जेल भेज दिया। यहां सामान्य बैरक में रही। यरवदा के मुकाबले यहां थोड़ी आजादी थी। मैंने कैदियों के मुकदमे पर नोट्स, बंदियों की जमानत के लिए अर्जियां लिखनी शुरू कीं। पूरे जेल में बात फैल गई थी कि आंटी एप्लीकेशन लिखती हैं। कोरोना के दौरान उन्हें जमानत देने, घर भेजने की मैनें ढेरों एप्लीकेशन लिखीं।

यहां दूसरी लहर के दौरान कोरोना फैल गया। हमारी जेल में 56 पॉजिटिव मरीज निकले। मेरी बैरक में ही 13 संक्रमित थे। मैं निगेटिव थी, लेकिन मुझे बुखार था, इसलिए हमें एक क्वारैंटाइन बैरक में रख दिया गया। बाहर से खाना दे दिया जाता। साफ-सफाई वाले भी नहीं आते। हम एक ही बाथरूम इस्तेमाल कर रहे थे। यह तकलीफदेह था।'

क्या प्रिजनर्स डायरी जैसी कोई किताब लिखने की योजना है?
'​​​​​​​नोट्स तो लिखे हैं, अनुभव भी बहुत हैं, हो सकता है कि कभी किताब की शक्ल में भी आए।'

जेल, बंदियों, वहां की व्यवस्था देखने के बाद संविधान, कानून को लेकर नजरिया कितना बदला?
'सुधा भारद्वाज ने कहा, 'कानून में बहुत सुधार की जरूरत है। विशेषरूप से जमानत की प्रक्रिया में तो पूरा बदलाव किया जाना चाहिए। मैंने देखा कि जेल में बंद करीब 20-30 महिला कैदी ऐसी हैं जो सिर्फ इसलिए वहां हैं कि उनकी जमानत लेने वाला कोई नहीं है।

जेल में हमारे साथ एक बुजुर्ग महिला थी मथुराबाई काले। वह मांगकर, गाना गाकर अपना जीवन चलाने वाले समुदाय की थी। उसकी 15 हजार रुपए की जमानत हुई थी, लेकिन वह यह राशि जमा नहीं कर सकी और कोरोना से उसकी मौत हो गई। जमानत कानूनों को ठीक तरीके से लागू नहीं करना, जमानतदार के पास राशन कार्ड नहीं होना जैसे छोटे-बड़े कई कारण हैं, जिनके चलते हजारों ऐसे लोग जेल में हैं, जिन्हें आजाद होना चाहिए।'

इनके लिए विधिक सेवा प्राधिकरण हैं। छत्तीसगढ़ में आप भी सदस्य रही हैं। उसका क्या?
'प्राधिकरण तो हैं लेकिन उनकी वित्तीय व्यवस्था शून्य है। वकील की फीस मिलाकर महज 4-5 हजार रुपए मिलते हैं। जमानत के लिए कोई फंड नहीं है। दूसरे कागजी खर्चों के लिए फंड नहीं है। ऐसे में ये प्राधिकरण जिन उद्देश्यों के लिए बनाए गए हैं वो पूरे नहीं हो रहे हैं। इन्हें पर्याप्त बजट देना होगा।

अब आप बाहर हैं, अब क्या योजना है?
वे बताती हैं, 'मैं जेल से बाहर हूं, पर पूरी तरह आजाद नहीं। मुझ पर ठाणे नहीं छोड़ने जैसी पाबंदियां हैं। मैं आर्थिक रूप से बहुत सक्षम नहीं हूं, बैंक बैलेंस नहीं है, लेकिन इस समय मुझे काम कौन देगा यह देखना है। मेरे कुछ सहृदय दोस्त हैं जिन्होंने जमानत दी है, मदद करते हैं। मेरी बेटी मायशा के भविष्य को लेकर भी बहुत कुछ तय करना है। मुंबई मेहनतकश लोगों का शहर है। उम्मीद है यहां कुछ ना कुछ हो ही जाएगा।

जेल के दिनों में मायशा कैसे रही, मुलाकात कैसे होती थी?
सुधा ने कहा, 'जेल में सप्ताह में एक बार मुलाकात का नियम है। मायशा, दिल्ली या भिलाई में होती थी तो बार-बार आना नहीं हो पाता था, इसलिए वह 2-3 महीने में एक बार आती रही। इस दौरान हर शनिवार और सोमवार मुलाकात होती थी पर बीच में कांच की दीवार होती थी। हम अपनी-अपनी तरफ से हथेलियों पर हथेली रख देते थे। वह कई बार रोई। अदालत में कभी सुरक्षाकर्मियों ने तरस खाकर मायशा को मुझ तक आने दिया तो गले लग जाती थी। वह मेरे लिए कभी कुछ खाने के लिए लाती, लेकिन वो उसे देने नहीं देते थे। समय मुश्किल था, लेकिन कट गया। अब मुंबई में मैं उसके साथ हूं यही खुशी है।''

छत्तीसगढ़ आएंगी क्या?
'छत्तीसगढ़ मेरा घर है, मेरी कर्मस्थली है। 30 साल गुजारे हैं वहां, संघर्ष किया है, वकालत की है। मौका मिला तो जरूर आऊंगी। मेरे अपने है वहां, उन्हीं की हिम्मत से जूझ रही हूं।'

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