आदिवासियों को साधने में जुटी भाजपा-कांग्रेस:रायपुर में कांग्रेस का नृत्य महाेत्सव तो भाजपा का चिंतन शिवर सरगुजा में

रायपुर2 महीने पहले
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प्रदेश में 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा ने अभी से आदिवासी वोटरों को साधने की कवायद शुरू कर दी है। कांग्रेस जहां दूसरी बार आदिवासी नृत्य महोत्सव के बहाने आदिवासियों को रिझाने की तैयारी में लगी है, वहीं भाजपा भी बस्तर के बाद सरगुजा में चिंतन शिविर आयोजित करने जा रही है। छत्तीसगढ़ की सत्ता में आदिवासियों की भूमिका अहम होती है। प्रदेश की एक तिहाई आबादी और एक तिहाई विधानसभा सीटों पर इनका दबदबा है।

यही वजह है कि प्रदेश में सरकारें किसी की भी हो उनके फोकस में आदिवासी हमेशा से रहे हैं। यही वजह है कि ढाई साल में ही कांग्रेस की सरकार ने छोटी-बड़ी 20 से ज्यादा योजनाएं उन क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के लिए लागू की हैं। दूसरी ओर भाजपा ने भी अपने स्तर पर आदिवासियों वोटरों को साधने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। बस्तर के बाद सरगुजा में चिंतन शिविर का आयोजन किया जा रहा है।

राज्य में हुए पहले चुनाव के बाद से लगातार आदिवासी सीटों पर भाजपा का ग्राफ गिरता गया। असर यह हुआ कि 15 साल सत्ता में रहने के बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 15 सीटों पर सिमट गई। दूसरी तरफ कांग्रेस आदिवासियों का विश्वास जीतने में सफल रही और 29 में से 25 आदिवासी सीटों पर जीत दर्ज कर दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। सरकार बनाने के बाद लोहांडीगुड़ा में आदिवासियों की 42 सौ एकड़ जमीन वापसी कराकर बड़ा काम किया।

राज्य सरकार लगातार आदिवासियों का विश्वास जीतने की कोशिश में लगी है इसके तहत 52 प्रकार के लघु वनोपजों की समर्थन मूल्य में खरीदी, स्थानीय लोगों को भर्ती में प्राथमिकता के लिए कनिष्ठ चयन आयोग का गठन, तेंदूपत्ता संग्राहकों काे 4000 हजार रुपए प्रति मानक बोरा दिया जा रहा है। ऐसी लगभग 20 से अधिक छोटी बड़ी योजनाएं शुरु की गई हैं, लेकिन इन सबके बाद भी आदिवासियों की नाराजगी बीच-बीच में उभरती रही है। इसे देखते हुए भाजपा भी सक्रिय हो गई। बस्तर में भाजपा का चिंतन शिविर इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

नाराजगी दूर करने में जुटी राज्य सरकार
बस्तर से लेकर सरगुजा तक कई मसलों को लेकर आदिवासी समाज सरकार का विरोध कर रहा है। सरगुजा के परसा कोल ब्लॉक के अलॉटमेंट को लेकर विरोध जारी है। वहीं, लेमरू एलीफेंट रिजर्व एरिया में विस्थापन का मुद्दा हो या फिर बस्तर में बोधघाट परियोजना और बैलाडीला के नंदीमाइंस का मुद्दा, आदिवासी समाज में नाराजगी है। सिलगेर आंदोलन ने तो सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

13 साल आंदोलन तब 32% आरक्षण
आदिवासी समुदाय को 2012 तक सरकारी नौकरियों में 20 फीसदी आरक्षण दिया जाता रहा। आबादी के प्रतिशत के अनुसार 32 फीसदी आरक्षण के लिए आदिवासियों ने 13 साल संघर्ष किया। बता दें कि राज्य की आबादी में 32 फीसदी आदिवासी हैं।

आदिवासी सीटों का गणित
भाजपा के दो आदिवासी विधायक हैं। इनमें कोरबा से ननकीराम कंवर और गरियाबंद से डमरूधर पुजारी हैं। बस्तर और सरगुजा में भाजपा के पास एक भी विधायक नहीं हैं। राज्य बनने के बाद भाजपा ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 23 सीटें जीती थीं। 2008 में 19 और 2013 में 11 सीटों पर जीत हासिल की थी। 2018 में कांग्रेस ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 29 में से 25 सीटों पर जीत दर्ज की।

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