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रंग इंसानियत का:पिछले 30 सालों से होली के दिन खुली रहती है ये क्लीनिक, किसी की आंखों में कलर चला जाए तो करते हैं मुफ्त इलाज

रायपुरएक महीने पहले
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तस्वीर में नजर आ रहे डॉ मिश्र,कई ग्रामीण इलाकों में लोगों के लिए मुफ्त हेल्थ कैंप भी लगाते हैं। इन्हें छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से राज्य अलंकरण से सम्मानित किया जा चुका है। - Dainik Bhaskar
तस्वीर में नजर आ रहे डॉ मिश्र,कई ग्रामीण इलाकों में लोगों के लिए मुफ्त हेल्थ कैंप भी लगाते हैं। इन्हें छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से राज्य अलंकरण से सम्मानित किया जा चुका है।
  • रायपुर के फुल चौक इलाके में है डॉ दिनेश मिश्र की क्लीनिक, दूर-दराज के गांव से भी आते हैं मरीज
  • अब तक लगभग 900 लोगों को होली के दौरान एमरजेंसी में दे चुके हैं इलाज और मुफ्त दवाओं की सुविधा

रंगों के बीना होली अधूरी है और इन रंगों की पहचान करने के बिना जिंदगी। अक्सर होली खेलते वक्त लोगों की आंखों में रंग चले जाने से मेडिकल एमरजेंसी की नौबत आ जाती है। होली के दिन कई अस्पताल और दवा की दुकानें भी बंद होती है। ऐसे में हर साल लोगों की मदद करते हैं डॉक्टर दिनेश मिश्र। रायपुर के आई और कॉन्टेक्ट लेंस एक्सपर्ट डॉक्टर मिश्र सन 1991 से एक अभियान चला रहे हैं।

डॉक्टर मिश्र हर साल होली के दिन अपनी क्लीनिक खुली रखते हैं। अगर इस दिन किसी की आंख में कलर चला जाए तो उसका इलाज फ्री में करते हैं। डॉ दिनेश ने बताया कि मैं सेवा के पेशे में हूं, करियर की शुरूआत में जब लोगों को मैंने होली के दिन परेशान होते देखा तो इस अभियान की शुरूआत की, जो अब तक जारी है।

900 लोगों को मिली मदद
डॉ मिश्र ने बताया कि इस दौरान वो लगभग 900 मरीजों को मदद पहुंचा चुके हैं। रायपुर के अलावा, दुर्ग, भिलाई, आरंग, अभनपुर, मंदिर हसौद, तिल्दा जैसे रायपुर के आस-पास के इलाकों से भी लोग होली के दिन या दूसरे दिन आंखों के एमरजेंसी केस लेकर पहुंचते हैं। किसी को रंगों से इंफेक्शन हो जाता है तो किसी की आंखों में केमिकल वाले रंग जाने के कारण उनकी स्थिति बिगड़ जाती है। ऐसे लोगों को दवा और इलाज डॉ मिश्र अपनी क्लीनिक में देते हैं।

डॉ मिश्र की टीम अंधविश्वास के प्रति जागरुकता काम भी करती है, रविवार को सामाजिक कुरितियों की होली इन्होंने जलाई।
डॉ मिश्र की टीम अंधविश्वास के प्रति जागरुकता काम भी करती है, रविवार को सामाजिक कुरितियों की होली इन्होंने जलाई।

हर्बल रंगों से होली खेलने की सलाह इस वजह से
डॉ. दिनेश मिश्र ने बताया कि पहले होली प्राकृतिक वस्तुएं जैसे विभिन्न फूलों, पत्तियों, जड़ों व बीजों से तैयार रंगों से खेली जाती थी जो शरीर के लिए नुकसानदायक नहीं थे। अब बाजार में उपलब्ध रंग-गुलाल कृत्रिम व रासायनिक पदार्थो से बनते हैं। इन्हें बनाने में खर्च कम लगता है समय कम लगता है तो कंपनियां इन्हीं पर फोकस करती हैं। मगर रंगों के केमिकल शरीर की त्वचा, पलकों, आंखों पर बुरा प्रभाव डालते हैं। इनकी वजह से आंखों व चेहरे में जलन, खुजलाहट, सूजन, दाने आना, एलर्जी होना जैसी दिक्कतें होती हैं। गुलाल में चमक के लिए अभ्रक मिलाया जाता है, इसमें मिट्टी व बारीक पिसी रेत मिला दी जाती है, इससे आंख के नाजुक हिस्से में खरोंच आ जाती है।

दैनिक भास्कर को डॉ मिश्र ने बताया कि तकलीफ होने पर लोग आंखों को रगड़ते हैं, इससे दिक्कत और बढ़ जाती है।
दैनिक भास्कर को डॉ मिश्र ने बताया कि तकलीफ होने पर लोग आंखों को रगड़ते हैं, इससे दिक्कत और बढ़ जाती है।

अगर आंखों में रंग चला जाए तो ये करें
डॉ. दिनेश मिश्र ने बताया कि यदि आंख के अंदर रंग गुलाल चला जाए तो आंखों को रगड़े नहीं, बल्कि उसे धीरे से आंखों से निकालने की कोशिश करें। सूखा रंग व गुलाल पलकों व साथ ही आंख की पुतली में रगड़ से जख्म बनाता है तथा रासायनिक पदार्थ के कारण आंख में कंजक्टीवाइटिस या रगड़ से कार्नियल अल्सर भी हो सकता है। हर साल की तरह इस साल भी होली के दिन डॉ. दिनेश मिश्र अपने फूल चौक स्थित अस्पताल में 29 मार्च को सुबह 11.30 बजे से दोपहर 2 बजे तक मरीजों की मदद के लिए मौजूद रहेंगे। किसी भी एमरजेंसी में लोग इनसे मदद ले पाएंगे।

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