भोरमदेव मंदिर के रिसाव की जांच शुरू:भास्कर की खबर के बाद पुरातत्व विभाग की तकनीकी टीम पहुंची, छत पर सूखे पत्तों और धूल को बताया पानी रिसने का कारण

रायपुर2 महीने पहले
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पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने मंदिर परिसर का दौरा कर रिसाव के कारण का पता लगाया है। - Dainik Bhaskar
पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने मंदिर परिसर का दौरा कर रिसाव के कारण का पता लगाया है।

छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक भोरमदेव शिव मंदिर को रिसाव से बचाने की कोशिश शुरू हो गई है। पुरातत्व विभाग की एक तकनीकी टीम ने मंदिर की जांच की है। सामने आया है कि मंदिर की छत पर पत्तियां और धूल जमा होने से पानी की निकासी प्रभावित हुई है। ज्यादा बरसात की वजह से यह पानी पत्थरों के जोड़ से होते हुए मंदिर के गर्भगृह और मंडप में पहुंच रहा था। बुधवार को दैनिक भास्कर ने इसकी डिटेल स्टोरी प्रकाशित की थी। इसके बाद सरकार हरकत में आई।

नागर शैली में बना यह शिव मंदिर वास्तु शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है।
नागर शैली में बना यह शिव मंदिर वास्तु शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है।

संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के उप संचालक अमृत लाल पैकरा की अगुवाई में एक तकनीकी टीम गुरुवार को भोरमदेव पहुंची। इसमें पुरातत्व विभाग के सहायक अभियंता सुभाष जैन, उप अभियंता दिलीप साहू, केमिस्ट विरेन्द्र धिवर, मानचित्रकार चेतन मनहरे शामिल थे। कबीरधाम प्रशासन की ओर से कवर्धा SDM विनय सोनी, डिप्टी कलेक्टर रश्मि वर्मा और बोडला तहसीलदार अमन चतुर्वेदी भी मौके पर पहुंचे। इस जांच दल ने भोरमदेव मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों का बारीकी से निरीक्षण किया। मंदिर प्रबंधन ने उन्हें वह जगह दिखाई जहां से पानी का रिसाव हो रहा था। बताया जा रहा है, ऐसे 16 स्थान चिन्हित किए गए थे, जहां से पानी मंदिर के गर्भगृह और मंडप में भर रहा था।

जांच के बाद पुरातत्व अधिकारियों ने बताया, पतझड़ के मौसम में आसपास के पेड़ों के पत्ते मंदिर के ऊपरी भाग में जम गए हैं, जिसकी वजह से पानी की निकासी सही नहीं हो पा रही है। पुरातत्व विभाग ने मंदिर में रिसाव रोकने और उसके संरक्षण के लिए एक फौरी रिपोर्ट बनाकर कलेक्टर रमेश कुमार शर्मा को दी है। इसके आधार पर मंदिर का रिसाव बंद करने और उसको मजबूत करने की कोशिश होगी। कलेक्टर रमेश कुमार शर्मा ने बताया, इस रिपोर्ट के आधार पर पुरातत्व विभाग जल्दी ही मंदिर की मरम्मत शुरू करेगा।

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यह करने की सिफारिश की गई
भोरमदेव मंदिर के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में मंदिर के ऊपरी भाग की विशेष साफ सफाई करने को कहा है। पत्थरों के जोड़ों को फिर फिलिंग करने और विशेष कोटिंग की भी सिफारिश की गई है। पुरातत्व विभाग की टीम ने मंदिर के आसपास के पेड़ों की छटाई करने को भी कहा है। इसके अलावा मंदिर के चारों दिशा में जमीन के भीतर नए सिरे से फिलिंग करने की भी योजना बनाई है ताकि नींव को ज्यादा मजबूती मिल सके।

मंदिर की बाहरी दीवारों से रिसाव की जांच करते पुरातत्व विभाग के अधिकारी।
मंदिर की बाहरी दीवारों से रिसाव की जांच करते पुरातत्व विभाग के अधिकारी।

मंदिर की दीवारों पर सिंदूर-कुमकुम लगाने की मनाही
तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ने मंदिर के गर्भगृह की बाहरी दीवार पर चावल और केमिकल युक्त गुलाल, सिंदूर-कुमकुम लगाने से मना किया है। SDM विनय सोनी ने बताया कि इन बातों के लिए पहले से प्रतिबंध लगाया जा चुका है। मंदिर के मुख्य पुजारी आशीष शास्त्री ने बताया कि प्रबंधन समिति की ओर से सूचना पट पर इसे लिखा भी गया है।

11वीं शताब्दी का मंदिर, खजुराहो जैसा शिल्प
कवर्धा जिला मुख्यालय से करीब 18 किमी दूर चौरा गांव में ऐतिहासिक भोरमदेव मंदिर स्थित है। 11वीं शताब्दी में बना यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर खजुराहो जैसा शिल्प देखने को मिलता है। इसलिए इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है। यह मंदिर नागर शैली का अनुपम नमूना है। एक पांच फीट ऊंचे चबूतरे पर बने इस मंदिर में 3 ओर से प्रवेश द्वार हैं। तीनों से सीधे मंदिर के मंडप में प्रवेश किया जाता है। मंडप की लंबाई 60 फीट और चौड़ाई 40 फीट है। मंडप के बीच 4 स्तंभ हैं और किनारे की ओर 12 स्तंभ हैं। इन स्तंभों ने मंडप की छत को संभाल रखा है। इन स्तंभों पर सुंदर कलाकृतियां है।

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