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पानी है, हम बचा नहीं पाते:हर साल 87 अरब लीटर पानी की जरूरत, निगम दे रहा 72 अरब लीटर, 94 अरब लीटर बारिश का पानी ऐसे ही बह जाता है

रायपुर3 महीने पहलेलेखक: ठाकुरराम यादव
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125 तालाब बचे; रायपुर में पहले लगभग 300 तालाब थे। अब सिर्फ 125 ही बचे हैं। इनमें भी दर्जनभर से ज्यादा खत्म होने की कगार पर हैं। इस तस्वीर कोे ही लीजिए। ये रामसगरी तालाब है। एक समय पानी से लबालब रहता था। अगर ये तालाब रहता, तो आसपास ग्राउंड वाटर लेवल नहीं गिरता। - Dainik Bhaskar
125 तालाब बचे; रायपुर में पहले लगभग 300 तालाब थे। अब सिर्फ 125 ही बचे हैं। इनमें भी दर्जनभर से ज्यादा खत्म होने की कगार पर हैं। इस तस्वीर कोे ही लीजिए। ये रामसगरी तालाब है। एक समय पानी से लबालब रहता था। अगर ये तालाब रहता, तो आसपास ग्राउंड वाटर लेवल नहीं गिरता।

रायपुर की 16 लाख आबादी को सालभर में करीब 87 अरब लीटर पानी की जरूरत है। यह जरूरत प्रति व्यक्ति प्रतिदिन की राष्ट्रीय औसत खपत 150 लीटर के आधार पर है। नगर निगम सालभर में 72 अरब लीटर पानी की आपूर्ति कर रहा है। यानी शहर के लोगों को 16 अरब लीटर कम पानी मिल रहा है, जबकि अव्यवस्थित विकास और लापरवाहियों के कारण हर साल 94 अरब लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है।

अगर इस पानी को बचा लिया जाता तो न सिर्फ इस समय पानी की आपूर्ति पूरी हो पाती, बल्कि आने वाले समय के लिए भी ग्राउंड वाटर लेवल बहुत अच्छा हो जाता। पड़ताल में ये बात सामने आई है कि तीन बड़े कारणों से हम ये पानी नहीं रोक पा रहे हैं। इसमें तालाबों के कैचमेंट एरिया में कब्जा प्रमुख कारण है। इसके बाद सड़क के दोनों ओर मिट्‌टी की जगह न छोड़ना है और तीसरा अहम कारण रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को ठीक से लागू न करवा पाना है।

कई सरकारी इमारतों में ही वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर इन तीन बिन्दुओं पर गंभीरता से काम हो, तो काफी हद तक पानी की समस्या कम हो सकती है। अगले करीब 15 दिन में मानसून शुरू होने वाला है। इसलिए दैनिक भास्कर ने शहर में पानी की जरूरत, मानसून के पानी को संग्रह नहीं कर पाने के कारण और निगम की वाटर सप्लाई को लेकर पड़ताल की।

शहर के मास्टर प्लान 2021 के अनुसार राजधानी के 16 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग आधा क्षेत्र आवासीय है। बाकी 50 प्रतिशत हिस्सा व्यावसायिक, औद्योगिक, ट्रांसपोर्टेशन, रिक्रिएशनल और अन्य हैं। इन क्षेत्रों में बारिश के पानी का रनआफ परसेंटेज (पानी का बह जाना) अलग-अलग है।

वैज्ञानिकों के अनुसार बारिश का जितना पानी इन अलग-अलग क्षेत्रों से बहकर नालों से होकर नदी में चला जाता है, उसे सहेज लिया जाए तो शहर की वर्तमान ही नहीं आने वाले कई वर्षों तक पानी की जरूरत पूरी हो जाएगी। इस मामले में शहर में कई तरह की खामियां हैं। इसकी पड़ताल करने पर पता चला कि तीन मुख्य कारण जिसकी वजह से बारिश का पानी बह जाता है-

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​​​​​​​रेन वाटर हार्वेस्टिंग का सख्ती से पालन कराएंगे

​​​​​​​शहर में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का सख्ती से पालन करवाया जाएजाज ढेबर, महापौर रायपुर

इस कारण बह जाता है पानी

1. तालाबों के कैचमेंट एरिया में कब्जा
तालाबों के कैचमेंट एरिया खत्म होने के कारण ज्यादातर तालाब सूख गए। इसके बाद लोगों ने तालाबों को पाटकर घर बना लिए। इतनी बड़ी संख्या में अवैध कब्जे हुए कि अब तालाब ही गायब हो गए हैं। जो तालाब बचे हैं, उसमें भी जलस्तर कम रहता है, क्योंकि पानी जाने का रास्ता ही नहीं बचा है। विशेषज्ञों के अनुसार जिन क्षेत्रों में अधिक तालाब होते हैं, वहां का जलस्तर काफी अच्छा रहता है। कैचमेंट में कब्जे के कारण बारिश का पानी तालाबों तक नहीं पहुंच रहा।

2. ड्रेन टू ड्रेन सड़क
राजधानी की ज्यादातर सड़कें ड्रेन टू ड्रेन हैं। यानी सड़क के एक तरफ की नाली से लेकर दूसरे तरफ की नाली तक पक्की सड़क बनी हुई है। ज्यादातर इलाकों में यही स्थिति है। नियमत: सड़क के दोनों किनारों पर नालियों से पहले तीन-तीन फीट जगह छोड़ी जाती है। ऐसा इसलिए कि बारिश के पानी का जमीन के भीतर पहुंचने का रास्ता बना रहे। सड़क में ऐसी जगह नहीं छूटने के कारण पूरा पानी नाली में बहकर नालों से होते हुए नदी में चला जाता है।

3. वाटर हार्वेस्टिंग नहीं
रेन वाटर हार्वेस्टिंग बेहद जरूरी है। राज्य सरकार ने 2009 से सभी नगर निगमों में यह अनिवार्य कर दिया है। सभी सरकारी दफ्तरों और 120 वर्गमीटर से बड़े निजी मकानों के लिए यह अनिवार्य है। इसके बावजूद अब तक शहर में सिर्फ पांच हजार मकान-भवनों में ही यह सिस्टम लगा है। ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में यह नहीं है। जहां लगा है, वहां भी मेंटनेंस नहीं होने के कारण सिस्टम खराब पड़ा है। इस वजह से भी बारिश का पानी बहकर निकल जा रहा है।

एक्सपर्ट व्यू

डॉ. जितेंद्र सिंह, सहप्राध्यापक मृदा व जल अभियांत्रिकी, इंदिरा गांधी कृषि विवि
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शहर में मिट्टी वाला क्षेत्र यानी कंक्रीटीकरण से बचा हुआ क्षेत्र कम होता चला गया। इसके होने से पानी जमीन में जाता। ग्लोबल वार्मिंग के कारण झड़ी लगने वाली स्थिति खत्म हो गई है। पहले तीन-चार दिन झड़ी लगती थी। रिमझिम बारिश होने पर पानी ज्यादा से ज्यादा जमीन के अंदर पहुंचता था। तेज बारिश में पानी बहकर निकल जाता है। इसके बाद अगर जमीन ज्यादा गीली हो चुकी होती है तो भी पानी बह जाता है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम होना चाहिए। गार्डनों या रिक्रिएशन क्षेत्रों में पेवर ब्लाक लगाए जाने चाहिए।

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