जन संकल्प से हारेगा कोरोना:परिवार एक टीम की तरह लड़ा कोरोना से, आधे अस्पताल और आधे घर में हुए स्वस्थ

रायपुर6 महीने पहले
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बैजनाथपारा का खान परिवार। - Dainik Bhaskar
बैजनाथपारा का खान परिवार।
  • गंभीर कोरोना संक्रमण होने के बावजूद दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति की बदौलत कोरोना को हराने वालेे राजधानी के जांबाज लोगों की कहानियां
  • पढ़िए आज तीसरी कड़ी- आईसीयू में 72 साल के माता-पिता, इसलिए देखरेख के लिए बहू भी वहीं हुई भर्ती, उनका पूरा परिवार था संक्रमित

ईश्वर की कृपा , इबादत, हौसला, वक्त रहते जांच और मुश्किल हालात में सही निर्णय लेने की समझ, परिवार की एकजुटता इन छह के आसरे हमारे परिवार ने कोरोना को आखिरकार हरा ही दिया। ये कहना है राजधानी के बैजनाथपारा इलाके में रहने वाले जावेद खान का। जिनके परिवार के 6 सदस्य एक साथ इस 8 अप्रैल को कोरोना संक्रमित हो गये। इस परिवार जिसमें बुजुर्ग बच्चे और युवा एक साथ सभी संक्रमित हुए सबने कैसे कोरोना को हरा दिया. जावेद खान की जुबानी ये पूरी कहानी....

पीछे मुड़कर सोचता हूं तो अहसास ही नहीं हो पाता कि हमारा पूरा परिवार आखिर कोरोना की चपेट में आया तो कैसे। दहशत के दौर में आसपास के मोहल्लों में जान-पहचान वालों की मौत की मनहूस खबरें शहर में आम हो रही थी। ऐसे वक्त में 6 अप्रैल के आसपास मुझे अपनी तबियत गड़बड़ लगी।

अगले ही दिन मेरे 72 साल के अब्बू अबदुल गफूर खान और 62 साल की अम्मी सलमा खान ने भी तबीयत अच्छी नहीं लगने की शिकायत की। मुझे लगा कि ये कोरोना हो सकता है, इसलिए हमने उसी दिन सजगता बरतते हुए पूरे परिवार का टेस्ट करवा लिया। जांच रिपोर्ट आने तक हम सब घर पर ही आइसोलेशन में रहे। घर पर ना तो किसी को बाहर से आने दिया और ना ही हम बाहर गए।

8 तारीख का दिन हमारे लिए मुसीबत लेकर आया। हम सारे के सारे सदस्य पॉजिटिव आ गये थे। मेरे अब्बा-अम्मी के अलावा पत्नी यासमीन 40 साल, 12 साल का बेटा हमजा और 6 साल का बेटा आदिल भी रहा। अब्बू-अम्मी बुजुर्ग हैं इसलिए दोनों का आक्सीजन लेवल हम चेक कर रहे थे। अब्बू का आक्सीजन लेवल 80 से नीचे आ रहा था। कोरोना संक्रमित होने के कारण उन्हें शायद तनाव भी हुआ, इससे बीपी लेवल तेजी से चेंज होने लगा।

पांच मिनट में बना ली रणनीति तय किया और तुरंत एक्शन भी

स्थिति किसी भी सूरत में ना बिगडे़ इसलिए हमने तत्काल आपस में बातचीत कर एक रणनीति बनाई। जिसमें तय किया कि अब्बू अम्मी को अस्पताल में भर्ती कराएंगे मेरी पत्नि को माइल्ड लक्षण थे फिर भी उनका फैसला था कि वो अब्बू अम्मी के साथ अस्पताल में एडमिट होंगी। पत्नी ने सलाह दी कि मैं बच्चों के साथ घर पर ही रहूं ताकि अगर अस्पताल में कोई दिक्कत आई या जरूरत पडी़ तो उसे किसी भी तरह बाहर से अरेंज कर सकूं। मैं बच्चों के साथ घर पर ही रह गया।

आईसीयू में एडमिट रहे अब्बू अम्मी-पत्नी ने वहां बनाई शिफ्ट

आक्सीजन लेवल कम होने के कारण अस्पताल में अब्बू को आईसीयू में आक्सीजन सपोर्ट पर रखना पडा़। अम्मी और मेरी पत्नी जनरल वार्ड में थे। यहां इन दोनों अस्पताल के अंदर अब्बू की हालत पर नजर रखने के लिए एक रणनीति और बनाई। जिसमें इन्होंने आपस में तय किया कि अम्मी दिन के वक्त और मेरी पत्नी रात के वक्त अब्बू की हालत पर बारीकी से नजर रखेंगी। अम्मी और सलमा ने इस दौरान अब्बू की सेवा की। मुझे वो वीडियो कॉल के जरिए जानकारी भी देते रहे। 8 दिन के अंदर अब्बू अम्मी और सलमा डिस्चार्ज होकर घर आ गये। इसके बाद पूरा परिवार एक साथ घर पर आइसोलेट रहकर ठीक हो गया।

समय पर जांच, इलाज की जल्दी शुरुआत यही मूल

परिवार के सारे सदस्यों का एकसाथ सही समय पर असहज लगने पर जांच करवाने का निर्णय सही रहा। इससे इलाज भी जल्दी शुरु हो गया। जांच सही समय पर हो जाने से गंभीर होते हुए भी मरीज की स्थिति ज्यादा क्रिटिकल नहीं होती है। स्वस्थ होने की संभवानाएं भी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। परिवार में संक्रमण के मामले इस लहर में बहुत ज्यादा बढे़ हैं इसलिए एक सदस्य के भी असहज होने पर एहतियात के तौर पर सब टेस्ट करवा लें तो ये सबसे ज्यादा बेहतर रहता है। -डॉ.ओपी सुंदरानी, इंचार्ज, क्रिटिकल केयर, अंबेडकर अस्पताल

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