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मिसाल / पति कोमा में, फिर भी हर दिन टाटीबंध जाकर मजदूरों की मदद कर रहीं डॉ. प्रज्ञा कहती हैं- दुआ से बड़ी कोई दवा नहीं, यहां आकर पति के लिए वही बटोर रही हूं

Husband in coma, yet every day, going to Tatibandh, helping laborers, Dr. Pragya says - there is no medicine bigger than dua, coming here and collecting the same for husband
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Husband in coma, yet every day, going to Tatibandh, helping laborers, Dr. Pragya says - there is no medicine bigger than dua, coming here and collecting the same for husband

दैनिक भास्कर

May 31, 2020, 11:08 AM IST

रायपुर. गौरव शर्मा. प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए टाटीबंध में कई समाजसेवी काम कर रहे हैं। इन्हीं में एक हैं डॉ. प्रज्ञा तारा। 62 वर्ष की उम्र में भी वे रोज टाटीबंध जा रहीं हैं और मजदूरों को भोजन, चप्पल मुहैया करा रहीं हैं। दूसरी ओर उनके पति की हालत गंभीर है। पिछले 15 दिनों से वे कोमा में हैं और एम्स के आईसीयू में भर्ती हैं। प्रज्ञा कहती हैं कि दुआ से बड़ी कोई दवा नहीं होती। इसीलिए वे रोज मजदूरों की सेवा कर अपने पति के लिए दुआएं बटोर रहीं हैं। दरअसल, सिख समाज, साहू समाज, मनवा कुर्मी समाज और बौद्ध समाज समेत कई संगठन टाटीबंध में मजदूरों की मदद के लिए काम कर रहे हैं। यहां जो सबसे पहला स्टॉल है, यहीं फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. प्रज्ञा तारा रोज 5 घंटे मजदूरों की सेवा कर रहीं हैं। वे बताती हैं कि लॉकडाउन के बाद मजदूरों के पैदल ही घर लौटने की खबरों से वे बहुत विचलित थीं। इसी बीच उनके पति की तबियत भी बिगड़ गई। लॉकडाउन के चलते सही इलाज मिलने में काफी परेशानी हुई और तबियत बिगड़ती चली गई। जब तक एम्स में भर्ती कराया, पति कोमा में जा चुके थे। इस घटना ने उन्हें और अंदर तक हिलाकर रख दिया क्योंकि अपने ही शहर में जब उन्हें इलाज कराने में इतनी परेशानी हुई हुई तो बाहर से आ रहे मजदूरों को न जाने कितनी परेशानियां उठानी पड़ रही होंगी। बस तभी से वे रोज टाटीबंध आकर मजदूरों की सेवा कर रहीं हैं। उनका कहना है कि मजदूरों की मदद करके उन्हें हौसला मिलता है क्योंकि वे उन्हें दुआएं देते हैं। उन्हें इसी की जरूरत है। 

सुबह से बनाती हैं फूड-नाश्ता पैकेट, दोपहर में सेवा और रात को अस्पताल
डॉ. प्रज्ञा और उनकी टीम रोज साढ़े 3 से 4 हजार फूड-नाश्ता पैकेट मजदूरों में बांटती है। इसके लिए वे सुबह 5 बजे से काम करना शुरू कर देती हैं। दोपहर में टाटीबंध पहुंच जाती हैं और बस से आने वाले सभी मजदूरों को नाश्ता-खाना, फल, मास्क और जूते-चप्पल बांटती हैं। 5-5.30 घंटे यहां सेवा करने के बाद पति की देखरेख के लिए वे अस्पताल चली जाती हैं। यहां वे रात 10 बजे तक रहती हैं। उनका कहना है कि सरकारें प्रवासी मजदूरों के लिए कई घोषणाएं कर रहीं हैं। लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि जिनके लिए मदद भेजी जा रही है, क्या वो उन तक पहुंच भी रही है।

मंजीत कौर भी दिन-रात जुटीं ताकि कोई न हो परेशान
समर्थ संस्था की मंजीत कौर बल और उनकी टीम भी पिछले 2 महीनों से मजदूरों की सेवा कर रही है। पहले इस टीम ने प्रवासी मजदूरों के आश्रय गृह के प्रबंधन से लेकर भोजन के इंतजाम तक, हर मोर्चे पर काम किया। मजदूरों के लिए कोई व्यवस्था नहीं करने पर सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरकर धरना भी दिया। इसके बाद व्यवस्थाएं सुधरी और अब ये टीम ऐसे लोगों की मदद कर रही है जिन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है। जैसे गर्भवती महिलाएं जिन्हें सबके साथ बस में नहीं भेजा जा सकता। वे उन्हें सकुशल उनके घर तक पहुंचवा रही हैं। 

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