भीगी आंखें,भीगे सपने ऐसी मांओं की कहानियां:मां को कभी कुछ बोलना नहीं पड़ता, वो मेरी खामोशी की ज़ुबां बहुत अच्छे से समझती है

रायपुर15 दिन पहले
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ये राजस्वी की बनाई हुई तस्वीर है, जिसमें उसने मां की ममता को कुछ इस तरह से उकेरा है, रंग भरे हैं। - Dainik Bhaskar
ये राजस्वी की बनाई हुई तस्वीर है, जिसमें उसने मां की ममता को कुछ इस तरह से उकेरा है, रंग भरे हैं।

10 साल की राजस्वी चौहान...। पांचवीं की बच्ची, जिसकी मां राशि और पिता शुभेंद्र बोल-सुन नहीं सकते। रायपुर के शैलेंद्र नगर में रहती है। मदर्स डे पर उस बच्ची के नजरिए से मां को समझते हैं। जानिए, क्या कहती है वो बच्ची... “ मां बोल-सुन नहीं सकती, लेकिन वो बेस्ट टीचर है। मुझे उनसे बात करने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं है। मुझे कब, क्या, कितना, कहां, कैसे चाहिए...इन सारे सवालों के जवाब मम्मी मेरे बिना कहे ही मुझे दे देती हैं। जब से मैंने होश संभाला, मां को ऐसे ही पाया। खुशी हो या तकलीफ, मां बगैर कुछ कहे ही न जाने कहां से अपने आप सबकुछ समझ जाती है। मां मन, आंखें और दिल सब पढ़ लेती है। मेरी फैमिली ज्वांइट फैमिली है, संयुक्त परिवार में हम सब साथ रहते हैं। केवल मेरे साथ ही नहीं, परिवार के बाकी सदस्यों के साथ भी मां का ऐसा ही रिश्ता है।

मेरा रोना, मेरा हंसना मेरा चेहरा मां को बता देता है। कभी उदास हुई, तो मां पूछने लगती है..क्या हुआ? कभी खुश होती हूं तो मुस्कुराती हैं। चूंकि पापा ब्लाइंड स्कूल में बच्चों को ड्राइंग सिखाते हैं। मुझे भी ड्राइंग का शौक हुआ। अब तो मैं अपनी बात ड्राइंग के जरिए भी मां से कह पाती हूं। मम्मी पापा दोनों को ही साइन लैंग्वेंज आती है।

लेकिन मैंने कभी ये सीखी नहीं, सीखूंगी भी नहीं, क्योंकि हमारे बीच तो खामोशी में भी बात हो जाती है। मेरे लिप मूवमेंट को भी मम्मी समझ जाती हैं। कभी-कभी मम्मी मेरे लिप मूवमेंट के जवाब में अपने होंठों को भी हिलाती है...। मम्मी क्या चाहती है ये मैं भी समझ जाती हूं। मम्मी के साथ मैं काम में भी हाथ बंटाती हूं। किचन में हम टीम की तरह होते हैं.... ऐसी टीम जो बिना कुछ कहे सारे काम आसानी से कर लेती है। जब मैं पढ़ाई करती हूं या ड्राइंग करती हूं तो उस वक्त मम्मी मेरे साथ बाकी बच्चों के पेरेंट की तरह ही मदद करती हैं। मेरी मम्मी मेरे लिए बेस्ट गिफ्ट हैं।

स्पीचलेस इमोशन- मम्मी-पापा बोल-सुन नहीं सकते, खामोशी ही ज़ुबां है

राजस्वी अपनी पेंटिंग के सहारे भी अपनी भावनाएं अपनी मम्मी राशि से बयां करती है।
राजस्वी अपनी पेंटिंग के सहारे भी अपनी भावनाएं अपनी मम्मी राशि से बयां करती है।

बेटे का इंतजार- 9 महीने पहले ढाई साल का बेटा गायब हो गया

जीनत खान चौरसिया कालोनी मस्जिद के पीछे रहती हैं। 9 महीने पहले घर के पास से उनका ढाई साल का बेटा मुस्तफा गायब हो गया। बहुत तलाश की, कहीं न मिला। रिपोर्ट लिखाई। वो दिन था और आज का दिन है, रोज थाने जाती हैं। पुलिस वालों से एक ही सवाल करती हैं- मेरा बेटा मिला क्या? जीनत के लिए पुलिस थाने की सीढ़ियां उम्मीदों का सहारा है।

अपने बेटे की तस्वीर लिए फिरती हैं। पति फिरोज किसी तरह जीनत को संभाले हुए हैं। दिन-रात पलकों की कोर से पानी रिसता रहता है। टीस कभी कम नहीं हुई। वो कहती है कि मैं क्या करूं- आंख बंद करती हूं, तो भी वो ही नज़र आता है। जाने क्या हुआ जो अल्लाह ने मुझसे मेरे लख्ते-जिगर को जुदा कर दिया। क्या मेरी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है।

मेरा बच्चा कोई मुझे लौटा दे...मैं उम्र भर दामन फैलाकर उसके लिए दुआएं मांगती रहूंगी। उसकी हालत देखकर अब पुलिस वालों का दिल भी रोता है, लेकिन उनका कहना है कि वे क्या करें? सिर्फ कोशिश कर सकते हैं...कर रहे हैं।

वो रोज उम्मीद के साथ थाने आती है एक ही सवाल-मेरा बेटा मिला क्या?
वो रोज उम्मीद के साथ थाने आती है एक ही सवाल-मेरा बेटा मिला क्या?

हर पल दुआ- सीने से लगाए रहती है, कभी निहारती रहती है

दंतेवाड़ा की गीता ध्रुव की दो साल की बच्ची तान्या को ब्लड कैंसर हो गया। जैसे ही पता चला, मां का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। डॉक्टरों ने मां के हौसले को देखकर कोशिशें शुरू की। अभी राजधानी रायपुर के अंबेडकर अस्पताल में तान्या का इलाज चल रहा है। मां के हौसले के कारण अभी थोड़ी ठीक है। पिछले एक साल से गीता सो नहीं पाई है।

हर पल, हर लम्हा तान्या का ख्याल। तान्या जब जाग रही होती है, तो उसे मां सीने से लगाए रहती है। जब तान्या सोती है, तो उसे बिस्तर पर बैठकर निहारती रहती है। अगर हल्की सी छींक भी आ जाए, तो बहुत घबरा जाती है। तान्या को तो इस बीमारी के बारे में पता भी नहीं। जब दूसरे बच्चे अस्पताल में खेलते हैं, तो उनके साथ तान्या भी हंस-खेल लेती है।

उसे देखकर उसकी मां थोड़ी देर के लिए खुश होती है और फिर रोने लगती है। फिर किसी आशंका से दौड़कर जाती है और तान्या को उठाकर अपने पास ले आती है, सीने से लगाकर रोती रहती है। डॉक्टर कहते हैं कि मां की दुआ में असर होता है, ये गीता को देखकर पता चलता है।

दो साल की तान्या को ब्लड कैंसर जबसे पता चला, सोई नहीं है मां...
दो साल की तान्या को ब्लड कैंसर जबसे पता चला, सोई नहीं है मां...

शहीदों की मांएं

जो बेटे मां की जान थे, उन बेटों ने ‘मां’ के लिए जान दी

वो माएं बेटों को याद करती हैं, जो बेटे ‘मां’के लिए चले गए। वो कहती हैं-बेटा होता, तो कहता- मां, मैं हूं..पर वो नहीं है, फिर भी लगता है...वो यहीं कहीं है

नज़र दरवाजे पर लगी रहती है कि कहीं वो तो नहीं

महेंद्र सात साल का था, जब उसने अपने पिता को वर्दी में देखा। खूंटी में टंगी वर्दी निकालकर पहन ली, बोला-मैं भी फोर्स में जाऊंगा। बड़ा हुआ, तो फोर्स में चला गया। आज जब किसी वर्दी वाले को देखती हूं, तो लगता है महेंद्र आ रहा है। जब भी घर आता, सबसे पहले मुझे गले लगा लेता। लिपट जाता। जैसे छोटा बच्चा हो। आखिरी बार जब गया, तो कहकर गया, जल्दी आता हूं। पांच दिन बाद ही उसकी खबर आई कि मुठभेड़ में वो शहीद हो गया है। आज भी दरवाजे को देखती हूं तो लगता है, बस अभी आएगा। -शहीद महेंद्र साहू की मां अमरीका।

कहा था राखी में आएगा...पर उसकी खबर ही आई

गोलू सबका लाडला था। कोई दिन ऐसा न होता, जब वो मुझे फोन नहीं करता। बचपन में खूब दौड़ भाग करता, तो मैं कहती कि पुलिस में जाएगा क्या? मेरा कहा हुआ वो सच हो गया। जब फोर्स में गया, तो वहां की बातें बताता था। कोई भी त्यौहार उसके बिना कभी नहीं मनाया। उसकी मुस्कान देखकर ही त्यौहार लगता था। मुझे याद है, फोन पर कहा था कि राखी में आ रहा हूं मां, लेकिन वो नहीं आया। खबर आई कि वो नहीं रहा। शहीद हो गया। सारे त्यौहार अब फीके हो गए हैं। -शहीद युगल वर्मा की मां यशोदा।

ज़िंदगी कम जी, लेकिन सबकी यादों में ज़िंदा है

गांव की मिट्‌टी आज भी उसे भूली नहीं है। छोटा था तो गांव वालों को कहता था, देखना, एक दिन सिपाही बनूंगा। देश के लिए कुछ करुंगा। सिपाही बन गया। सुकमा में ड्यूटी लगी, तो वहां से चिटि्ठयां लिखा करता था। उसकी चिटि्ठयां आज भी हैं मेरे पास। उसके शब्दों को देखकर लगता है, जैसे मेरे पास ही है। शादी को सिर्फ 11 महीने हुए थे कि उसके शहीद होने की खबर आ गई। उसकी ज़िंदगी कम रही, लेकिन सबकी यादों में जिंदा है वो। -शहीद खिलानंद की मां श्यामवती।

वो घुमाने को कहता, अब घूमने का मन ही नहीं

उसे क्रिकेट खेलना बहुत पसंद था। 12 वीं पास होते ही पुलिस में भर्ती हो गया। उस समय गांव से ज्यादा लोग पुलिस में नहीं थे, इसलिए उसका नाम हो गया था। मेरे लिए हमेशा कुछ न कुछ लाता रहता है। मुझे हमेशा कहता, चल मां...शहर घुमाउंगा...। कहां शहर घुमाता। उसके पास डयूटी बहुत थी। मैं जानती थी, लेकिन ये नहीं जानती थी कि इतनी जल्दी चला जाएगा। अब कहीं घूमने का मन नहीं करता।
-शहीद झाडूराम की मां दयामती।