CG से कोयला नहीं पहुंचा तो 3 राज्यों पर संकट:राजस्थान, UP और दिल्ली की हो सकती है बिजली गुल, देश की बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी SECL ने बिजली कंपनियों को जिम्मेदार बताया

रायपुर2 महीने पहलेलेखक: मिथिलेश मिश्र
छत्तीसगढ़ पूरे देश की जरूरत का 20 प्रतिशत कोयला देता है। यहां कोल इंडिया की सहयोगी कंपनी साउथ-इस्टर्न कोलफिल्ड्स लिमिटेड (SECL) की 41 खदानें हैं।

देश के कई राज्यों में बत्ती गुल होने का संकट खड़ा हो गया है। यह विद्युत उत्पादन कंपनियों और डिस्कॉम के कुप्रबंधन का नतीजा है। कोरोना काल में जब बिजली की मांग कम थी तो इन कंपनियों ने कोल इंडिया से कोयला लेने में आनाकानी की। यहां तक कि कोयला खरीदी से जुड़े करार को भी रिन्युअल नहीं कराया। जब अगस्त में बिजली की मांग बढ़ी तो कोयले की आपूर्ति की कड़ी टूट गई। इसका असर छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों को नहीं पड़ेगा, लेकिन आशंका है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में अंधेरा छा सकता है।

दरअसल, छत्तीसगढ़ पूरे देश की जरूरत का 20 प्रतिशत कोयला देता है। यहां कोल इंडिया की सहयोगी कंपनी साउथ-इस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड (SECL) की 41 खदानें हैं। इसमें से ओपन कास्ट खदानों की संख्या अधिक है। यहां से सालाना 150 लाख मीट्रिक टन कोयले का उत्पादन होता है। कोरबा जिले की ही खदानों से SECL 130 लाख मीट्रिक टन कोयला निकालती है। अफसरों के मुताबिक, कायदे से बिजली कंपनियों को 24 दिन उपयोग के बराबर कोयला स्टॉक रखना होता है। पिछले साल कोरोना संकट में लॉकडाउन लगा तो बिजली की मांग कम हो गई।

कई ताप बिजली घर पूरी तरह आयातित कोयले पर निर्भर थे। अब दाम अधिक होने से उनको भी घरेलू कोयला चाहिए।
कई ताप बिजली घर पूरी तरह आयातित कोयले पर निर्भर थे। अब दाम अधिक होने से उनको भी घरेलू कोयला चाहिए।

मांग कम थी तो उत्पादन घटाया, कोयला भी नहीं लिया
अफसरों ने बताया कि मांग कम होने से अधिकतर बिजली कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया। उस समय SECL के पास ही लाखों मीट्रिक टन कोयला था। बार-बार कहने के बावजूद कंपनियों ने वह कोयला नहीं लिया। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम जैसे उत्पादकों ने पूरे एक साल कोई कोयला नहीं खरीदा। उन्होंने उससे पहले से बकाया चले आ रहे करीब 600 करोड़ रुपए का भुगतान भी नहीं किया। अब अगस्त के बाद कुछ दक्षिणी राज्यों को छोड़कर जब सभी सेक्टर खुल गए हैं, बिजली की मांग बढ़ गई।

कुछ राज्यों का बकाया उनके यहां दिक्कत बढ़ाएगा
अब बिजली उत्पादन कंपनियों और निजी क्षेत्र के वितरकों को अधिक बिजली चाहिए। इस प्रक्रिया में देर लगेगी। उम्मीद जताई जा रही है, दशहरे के बाद देश के अधिकांश हिस्सों में बिजली संकट दूर हो जाएगा। हालांकि राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली और उसके आसपास के कुछ राज्यों में यह संकट लंबा खिंच सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण उनके बकाया भुगतान का मुद्दा है, जो बार-बार आपूर्ति को प्रभावित करेगा।

पिछली बरसात में कोरबा की कोयला खदानों में कुछ ऐसे भर गया था पानी।
पिछली बरसात में कोरबा की कोयला खदानों में कुछ ऐसे भर गया था पानी।

CM भूपेश बोले- आपूर्ति में कमी के लिए केंद्र जिम्मेदार
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आपूर्ति की कमी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उन्होंने कहा, जब देश को खाद की जरूरत थी तो खाद नहीं मिल पाया। अब कोयले की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। जो विदेश से कोयला आ रहा था, वह भी बंद हो गया। ऐसे में केंद्र सरकार कर क्या रही है। बिजली की कमी होगी तो उद्योग, परिवहन और किसान सभी प्रभावित होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा, अधिकारियों ने उन्हें आश्वस्त किया है कि छत्तीसगढ़ में कोयले की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय बाजार ने भी बिगाड़ा है गणित
कोयले पर शोध करने वाले प्रियांशु गुप्ता बताते हैं, देश में हर साल करीब 200 लाख मीट्रिक टन विदेशी कोयले का आयात होता है। इस उच्च गुणवत्ता वाले कोयले का बड़ा हिस्सा ताप बिजली घरों में इस्तेमाल होता है। शेष स्टील और स्पंज आयरन उद्योग के काम आता है। इसमें आई कमी ने भी गणित बिगाड़ा है।

SECL के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमत बढ़ी है। ऐसे में अधिकतर बिजली उत्पादकों ने आयात बंद कर दिया है। उनको यहां के खदान से आपूर्ति की जानी है। यह व्यवस्था बनाने में वक्त लग रहा है। कई जगहों पर रेलवे की रैक भी समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही है। ऐसे में आपूर्ति का संकट बढ़ा हुआ है। गुजरात जैसे तटीय क्षेत्रों की बिजली कंपनियां अंतरराष्ट्रीय और देशी बाजार के कीमतों के बीच खेलना चाहती हैं। ऐसे में वे लंबे समय का करार नहीं कर रही हैं।

बरसात की वजह से कोयला ढुलाई के रास्ते को भी नुकसान पहुंचा, जिससे आपूर्ति प्रभावित हुई।
बरसात की वजह से कोयला ढुलाई के रास्ते को भी नुकसान पहुंचा, जिससे आपूर्ति प्रभावित हुई।

मानसून से भी प्रभावित हुआ है उत्पादन
अधिकारियों ने बताया, 2020 में अप्रैल से सितंबर के बीच छह महीने में 28 करोड़ 2 लाख टन कोयले का उत्पादन हुआ था। 2021 की इसी अवधि में 31 करोड़ 5 लाख टन कोयला उत्पादन हो चुका है। यानी उत्पादन में 12% की वृद्धि हो चुकी है। हालांकि मानसून से उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है। छत्तीसगढ़ में SECL की कई खदानों में बरसात का पानी घुस गया। रास्तों को नुकसान हुआ। इसकी वजह से भारी मशीनों को नहीं उतारा जा सका। SECL ने इस वर्ष 172 लाख टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य तय किया था। अभी तक 58 लाख टन का ही उत्पादन हो पाया है। कंपनी का वार्षिक डिस्पैच लक्ष्य 192 लाख टन है। अब तक के लक्ष्य 99.50 लाख टन के मुकाबले 76.20 लाख टन कोयला ही डिस्पैच हुआ है।

रोजाना 3 लाख मीट्रिक टन कोयला भेज रहा है SECL
SECL अधिकारियों ने बताया, अभी उनके पास देश की जरूरत के 4 दिन का कोयला स्टॉक रखा हुआ है। रोजाना 3 लाख मीट्रिक टन कोयला भेजा जा रहा है। छत्तीसगढ़ के ताप बिजली घरों की जरूरत रोजाना 29 हजार से 30 हजार मीट्रिक टन की है। इतना कोयला कभी भी उपलब्ध कराया जा सकता है। कन्वेयर बेल्ट टूटने अथवा रैक की कमी की वजह से कभी-कभी कुछ दिक्कत हो सकती है। सामान्यतः: यहां बिजली घरों से जुड़ी खदानें ही उनकी जरूरत पूरा कर लेंगी। अकेले कोरबा की खदान ही 80 हजार मीट्रिक टन प्रतिदिन का उत्पादन करती हैं।

SECL का अधिक उत्पादन का दावा
SECL के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. सनीश चंद्र का कहना है, कंपनी ने पावर सेक्टर को पिछले वर्ष की तुलना में, पहली छमाही में करीब 25 प्रतिशत अधिक कोयला दिया है। बारिश की दीर्घावधि और सितंबर में बारिश के दिनों की संख्या अधिक रहने के बावजूद हमारा उत्पादन पिछले वर्ष से अधिक है। उन्होंने कहा, निर्बाध विद्युत आपूर्ति के लिए पावर सेक्टर को कोयला उपलब्ध कराने के लिए SECL प्रतिबद्ध है।

कोयला संकट से नई नीलामी की आहट
रिसर्चर प्रियांशु गुप्ता इस कोयला संकट में नए कोल ब्लॉक की नीलामी की आहट देखते हैं। कहते हैं कि सरकार लगातार कोल ब्लॉक को नीलाम करने की कोशिश कर रही है, लेकिन कोयले में स्थायी भविष्य न देखकर कंपनियां उसमें रुचि नहीं दिखा रही हैं। पिछली दो बार से इन्होंने जितने कोल ब्लॉक नीलामी में रखे वे नहीं बिके। अब नए सिरे से बोली मंगाई जा रही है। आशंका है कि इस संकट का हवाला देकर सरकार निजी कंपनियों के हाथों औने-पौने दाम में कोयला खदानें नीलाम कर देगी।

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