छत्तीसगढ़ में मां के 9 स्वरूप फोटो में देखें:एक जिले में धड़, दूसरे में सिर के साथ विराजमान हैं मां महामाया; 136 साल से सागौन के 24 खंभों पर टिका है मां दंतेश्वरी मंदिर

रायपुर12 दिन पहले
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छत्तीसगढ़, अपनी प्राचीन विरासतों को समेटे प्राकृतिक और धार्मिक रूप से समृद्ध है। देवी मां भी अलग-अलग रूप में यहां विराजमान हैं। यहां 51 शक्ति पीठों में शामिल मां के मंदिर हैं, तो मां महामाया एक जिले में सिर और दूसरे में धड़ के साथ विराजमान हैं। जहां माता सती के दांत गिरे, वहां मां दंतेश्वरी का मंदिर 136 साल से सागौन के 24 खंभों पर टिका है। शारदीय नवरात्रि पर मां के इन 9 स्वरूपों को फोटो और जानकारी के साथ दैनिक भास्कर आपके लिए लाया है।

51 शक्ति पीठों में है रतनपुर की मां महामाया
बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित 51 शक्तिपीठ में इस मंदिर की मान्यता है। करीब एक हजार साल पहले कल्चुरी शासकों की रतनपुर में राजधानी थी। वहां के राजा ने यहां देवी महामाया का जागृत रूप देखकर इस मंदिर का निर्माण कराया था। मान्यता है कि यहां देवी के सिर की पूजा होती है। यह मंदिर मनोकामना ज्योतिकलश के विश्व रिकॉर्ड के लिए जाना जाता है। यहां 27 हजार ज्योतिकलश एक साथ प्रज्जवलित होते हैं।

दो हजार फीट की ऊंचाई पर विराजित हैं मां बम्लेश्वरी
रायपुर से करीब 170 किमी दूर राजनांदगांव के डोंगरगढ़ में करीब 2 हजार फीट की ऊंचाई पर मां बम्लेश्वरी सिंदूरी रंग में विराजित हैं। करीब ढाई हजार साल पहले डोंगरगढ़ को कामावती नगर के नाम से जाना जाता था। यहां के राजा वीरसेन की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने विमला देवी (क्षेत्र की अधिष्ठात्री) और शिवजी की उपासना की। एक साल बाद बेटा हुआ, जिसका नाम रखा गया मदनसेन। आभार व्यक्त करने के लिए राजा ने पहाड़ पर मां का मंदिर बनवाया।

इस शक्ति पीठ में ब्राह्मण नहीं, यादव करते हैं पूजा
बस्तर के दंतेवाड़ा में स्थित है मां दंतेश्वरी का मंदिर। मान्यता है कि यहां माता सती के दांत गिरे थे। यह मंदिर करीब 136 साल से अंदरूनी भाग में लगे सागौन के 24 खंभों पर टिका है। इस पर ओडिशा के शिल्पकारों ने नक्काशी की है। यहां ब्राह्मण नहीं, बल्कि यादव पूजा करते हैं। यहां विराजमान भगवान विष्णु की मूर्ति भी लकड़ी से निर्मित है। जबकि मां दंतेश्वरी की प्रतिमा संगमरमर की है। 1880 में वारंगल के राजा हीराला चितेर ने मंदिर का निर्माण करवाया था।

घुंचापाली में स्वयंभू हैं मां चंडी, लगातार बढ़ रहा आकार
महासमुंद से करीब 40 किमी दूर बागबाहरा विकासखंड से लगे ग्राम घुंचापाली में मां चंडी विराजमान हैं। बताया जाता है कि माता की प्रतिमा स्वयंभू है। मान्यता है कि विशाल प्रतिमा का आकार लगातार बढ़ रहा है। घुंचापाली स्थित चंडी मंदिर भालू के आने को लेकर भी प्रसिद्ध है। मंदिर में रोजाना भालू का परिवार आरती के समय आता है और प्रसाद खाकर जंगल में लौट चला जाता है। इसके चलते इसे भालू वाला मंदिर भी कहते हैं।

जिनके नाम पर जिले का नाम पड़ा
अंबिकापुर का महामाया मंदिर। मां के 52 शक्ति पीठों में से एक है। मां दुर्गा यहां की मुख्य देवी हैं। मान्यता के अनुसार अंबिकापुर स्थित महामाया मंदिर में देवी का धड़ स्थित है। जबकि इनका सिर बिलासपुर जिले के रतनपुर के महामाया मंदिर में है। इसके पीछे भी किवंदति प्रचलित है कि मराठा सैनिक देवी की मूर्ति को ले जाना चाहते थे, लेकिन सफल नहीं हुए। मूर्ति कितनी प्राचीन है, इसके संबंध में कोई जानकारी नहीं है। मां अंबिका के नाम पर विश्रामपुरी का नाम अंबिकापुर पड़ा।

मल्हार में 10वीं सदी की मूर्ति है मां का आकर्षक रूप
बिलासपुर से करीब 40 किमी दूर पुरातात्विक स्थल मल्हार है। यहां शुद्ध काले ग्रेनाइट से बनी मां डिडनेश्वरी की प्रतिमा लोगों की आस्था का केंद्र है। मल्हार में पुरातत्व के अनेक मंदिरों के अवशेष हैं। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण 10 वीं-11 वीं ईस्वी में हुआ था। ये मूर्ति कला का उत्तम नमूना है। शुद्ध काले ग्रेनाइट से बनी प्रतिमा से अनोखी ध्वनि निकलती है।

यहां देवी स्थान पर मिलते हैं भीम के पद चिन्ह
महासमुंद से करीब 25 किमी दूर स्थित है खल्लारी माता का मंदिर। इसे स्थान को भीमखोज नाम से भी जाना जाता है। माता यहां 750 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजमान हैं। मान्यता है कि महाभारत काल में जब पांडव वनवास में थे तो यहीं पर भीम पहली बार हिडिंबा से मिले थे। इस स्थान पर पग चिन्ह भी है, जिसे महाबली भीम का बताया जाता है। यह निशान स्पष्ट रूप से पहाड़ी की चोटी पर दिखाई देता है।

यहां देवी मां की सेविकाएं कराती हैं स्नान
रायपुर से करीब 65 किमी दूर गरियाबंद में स्थित है जतमई माता का मंदिर। यहां दूसरा मंदिर घटारानी का है। इन दोनों मंदिरों के बीच करीब 2 किमी का अंतर हैं। जतमई माता मंदिर वनदेवी को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में कमार जनजाति ने करवाया था। जतमई देवी के अलावा यहां मां दुर्गा, भगवान राम और नरसिंह भगवान की मूर्ति स्थापित की गई है। पानी की धारा माता के चरणों को स्पर्श करते हुए बहती है। ऐसा कहा जाता है कि यह जलधाराएं माता जी की सेविका हैं। जिसके नीचे लोग खड़े होकर स्नान करते हैं।

तालाब से प्रकट हुई थी गंगा मैया
बालोद के झलमला गांव में करीब 105 साल पहले तांदुला नदी के नहर का निर्माण चल रहा था। पानी की कमी को पूरा करने के लिए तालाब बनाने डबरी की खुदाई की गई। जिसे बांधा तालाब नाम दिया गया। मान्यता है कि एक दिन एक केवट मछली पकड़ने के लिए तालाब में गया। तब जाल में मछली की जगह पत्थर की प्रतिमा फंस गई। केवट ने उसे साधारण पत्थर समझ कर फेंक दिया। फिर गांव के बैगा को सपने में दर्शन दिए। जिसके बाद प्रतिमा निकाल कर प्राण प्रतिष्ठा कराई गई।