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जनसंख्या नियंत्रण:सबसे बड़े अस्पताल में कोरोना काल में एक भी पुरुष नसबंदी नहीं, दशक में 15 हजार ही

रायपुर20 दिन पहलेलेखक: पीलूराम साहू
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प्रदेश में परिवार नियोजन के लिए महिलाएं आगे हैं। - Dainik Bhaskar
प्रदेश में परिवार नियोजन के लिए महिलाएं आगे हैं।
  • परिवार नियोजन सिर्फ महिलाओं के भरोसे, पुरुष सिर्फ 2 प्रतिशत ही

जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन का सबसे आसान उपाय यानी नसबंदी प्रदेश में अब भी केवल महिलाओं की ही जिम्मेदारी रह गई है, क्योंकि इसमें वही आगे हैं। पुरुषों की नसबंदी ज्यादा सुरक्षित होने के तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद हालत यह है कि प्रदेश में पिछले एक दशक में जितने भी नसबंदी आपरेशन हुए हैं, उनमें पुरुष नसबंदी का अनुपात केवल 2 प्रतिशत ही है। पिछले एक दशक में पूरे छत्तीसगढ़ में 10 साल की बात करें तो 3.5 लाख से ज्यादा महिलाओं ने नसबंदी करवाई। इसकी तुलना में केवल 15 हजार पुरुषों ने नसबंदी करवाई है।

शहरों की हालत तो और बुरी है। जैसे, राजधानी-प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अंबेडकर अस्पताल में पिछले डेढ़ साल में एक भी पुरुष ने नसबंदी नहीं करवाई है। प्रदेश में परिवार नियोजन के लिए महिलाएं आगे हैं। दो बच्चों के बीच गैप रखना हो या दो बच्चों के बाद परिवार नियोजन करवाना हो, महिलाएं ही नसबंदी कराती हैं। इसके अलावा कॉपर टी लगवाने से लेकर गर्भ निरोधक लेने में महिलाएं आगे हैं।

डॉक्टरों के अनुसार जब दूसरे बच्चे की डिलीवरी होती है, तब ज्यादातर महिलाएं नसबंदी को प्राथमिकता देती हैं। 15 से 20 फीसदी महिलाएं शिशु की उम्र एक साल होने के बाद परिवार नियोजन कराने के लिए आ रही हैं। कोरोनाकाल होने के कारण अस्पतालों में नसबंदी कम हुई है। यही नहीं नसबंदी शिविरों का आयोजन भी स्थगित रहा। ऐसे शिविरों में दूरबीन पद्धति से नसबंदी की जाती है।

थोक में कभी 50 तो कभी इससे ज्यादा महिलाओं की नसबंदी होती है। फिलहाल इस पर अघोषित रूप से रोक लगी हुई है। प्रसूति व महिला रोग विशेषज्ञों का कहना है कि पुरुष की तुलना में महिलाओं की नसबंदी जटिल होती है। यह मेजर सर्जरी की केटेगरी में आती है इसलिए एनीस्थिसिया देकर नसबंदी की जाती है। महिलाओं की नस पेट के अंदर होती है इसलिए रिस्क ज्यादा होता है। पुरुषों की नस पेट के बाहर होती है इसलिए नसबंदी ऑपरेशन में ज्यादा रिस्क नहीं होता।

कोरोनाकाल में 80 प्रतिशत तक कमी
कोरोना के कारण महिलाओं की नसबंदी में भी 70 से 80 फीसदी की कमी आई। अंबेडकर में कोरोना के पहले हर साल औसतन 1500 से 2000 महिलाओं की नसबंदी की जाती रही है। इस साल केवल 250 से 350 महिलाओं की नसबंदी हुई। डाॅक्टरों के अनुसार कोरोना से पहले रोजाना एक-दो पुरुष भी नसबंदी के लिए पहुंचते थे। इस तरह, साल में पुरुषों की भी औसतन 720 नसबंदी हो जाती थी, लेकिन डेढ़ साल में तो एक भी पुरुष नसबंदी के लिए नहीं पहुंचा। इसकी वजह केवल कोरोना संक्रमण का डर ही रहा है।

संभवत: कोरोना के डर के कारण पुरुष ज्यादा पीछे हट गए

  • यह सही है कि पिछले डेढ़ साल में अंबेडकर अस्पताल में एक भी पुरुष ने नसबंदी नहीं करवाई है। जबकि कोरोना से पहले रोजाना 1 से 2 नसबंदी की जा रही थी। यह संभव है कि कोरोना के डर के कारण पुरुष ज्यादा पीछे हट गए हैं। - डॉ. ए. वसीम, सहायक अधीक्षक व सर्जन, अंबेडकर अस्पताल

एक्सपर्ट व्यू

डा. ज्योति जायसवाल, एचओडी-गायनी, पं. नेहरू मेडिकल कालेज

महिलाओं का ऑपरेशन ज्यादा कठिन, पुरुषों का आसान, फिर भी वे पीछेमहिलाओं की नसबंदी पुरुषों की तुलना में काफी कठिन होती है। एक तो यह चिकित्सकीय भाषा में मेजर सर्जरी मानी जाती है, इसलिए बिना एनीस्थिसिया दिए यह ऑपरेशन नहीं किया जा सकता। दूसरा, महिला की उम्र अधिक हो तो सर्जरी में और दिक्कत आती है। इसकी तुलना में पुरुषों की नसबंदी बेहद आसान है। केवल यह भ्रांति फैल गई है कि पुरुष कमजोर हो जाते हैं, जबकि ऐसा कुछ संभव ही नहीं है। यह हर किसी को वर्षों से समझा रहे हैं, लेकिन लोग नहीं मानते। जहां तक पिछले डेढ़ साल का सवाल है, कोरोना के कारण कम नसबंदी हो रही है। लोगों खासकर पुरुषों में यह जागरूकता लाना जरूरी है कि उनकी नसबंदी सुरक्षित भी है और आसान भी।

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