एमआरपी का खेल कहीं लूट-कहीं छूट:पैक्ड आटा, चावल, दाल और तेल कहीं एमआरपी पर, तो कहीं इसी में डिस्काउंट भी; इस अंतर पर रोक का कानून ही नहीं

रायपुरएक महीने पहले
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एक ही एमआरपी पर हर दुकान में सामान का रेट अलग-अलग है। - Dainik Bhaskar
एक ही एमआरपी पर हर दुकान में सामान का रेट अलग-अलग है।

महंगाई, खासकर किराना तथा घरेलू इस्तेमाल में आने वाली चीजों की बढ़ती कीमतें अभी चर्चा का विषय है क्योंकि इनके रेट की वजह से रसोई का बजट बढ़ रहा है। आटा, दाल, चावल और तेल प्राथमिक जरुरतें हैं। राजधानी में पैक्ड आटा 32 से 35 रुपए किलो, दाल 90 से 100 रुपए किलो, चावल 35 से 60 रुपए किलो और तेल 150 से 200 रुपए लीटर तक बिक रहा है।

इन सभी उत्पादों के पैकेट पर अधिकतम खुदरा मूल्य या एमआरपी प्रिंट रहता है, लेकिन यही एमआरपी बड़ा खेल बन गया है। एक ही एमआरपी पर हर दुकान में सामान का रेट अलग-अलग है। कोई एमआरपी पर ही डिस्काउंट दे रहे हैं, तो कोई उसी चीज को पूरे एमआरपी पर बेचकर ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं। हैरतअंगेज बाद ये है कि सरकारी एजेंसियों के पास छत्तीसगढ़ ही नहीं, देशभर में एमआरपी को निर्धारित करने का कोई सिस्टम ही नहीं बन पाया है।

दैनिक भास्कर ने राजधानी समेत पूरे प्रदेश के 20 बड़े-छोटे कारोबारियों से बात की तो पता चला कि एमआरपी तय करने के लिए संबंधित कंपनियां पहले अपनी उत्पादन लागत निकालती हैं, फिर इसमें हर स्तर का खर्च जोड़ने के बाद मुनाफा शामिल करते हुए एमआरपी तय कर दिया जाता है। एमआरपी ऐसे तय होता है कि कच्चे माले के दाम कितने भी ऊपर-नीचे हों, विदेश से कच्चा माल आने में परेशानी हो, युद्ध चल रहा हो लेकिन एमआरपी पर बेचने से कारोबारियों को किसी तरह का नुकसान न हो। इतनी संभावनाओं को जोड़ने के बाद तय हुए एमआरपी पर सामान बेचने का कोई नियम नहीं है।

रायपुर में बड़े रिटेल आउटलेट में यही सामान एमआरपी पर छूट में मिल जाता है। छोटे आउटलेट पर लोगों को यह फायदा कम हो रहा है और मोहल्ले की दुकानों में बिलकुल नहीं, क्योंकि यहां सामान एमआरपी पर ही बिक रहा है। इस अंतर की वजह एक ही है, एमआरपी पर नियंत्र नहीं होना। भास्कर ने केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय तथा खाद्य मंत्रालय के अफसरों से बात की, तो उ चला कि इस दिशा में कोई विचार भी नहीं चल रहा है। इन्हें तो सिर्फ एमआरपी लिखे होने से मतलब है।

अगर 4 लोगों के परिवार, तो खाद्य सामग्री में डिस्काउंट से 400 रुपए तक मासिक बचत ऐसे
अगर आप रायपुर में रहते हैं, तो आपके पास बड़े रिटेल आउटलेट से खरीददारी का विकल्प है। यहां रेट एमआरपी से कम हैं। इसका उल्लेख बिल में रहता है। छोटे आउटलेट से मोहल्ले की दुकानों तक पहुंचते-पहुंचते डिस्काउंट कम या समाप्त होता जाता है। 4 लोगों का परिवार हो तो खपत और एमआरपी पर डिस्काउंट से महीने में 400 रुपए तक बचाए सकते हैं।

ग्राहक पंचायत का सरकार को प्रस्ताव- उत्पादन लागत भी प्रिंट हो
ग्राहक पंचायत संगठन ग्राहकों के हितों के लिए 1974 से आंदाेलन कर रहा है। इसके प्रयासों से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 लागू हुआ। अब ग्राहक पंचायत वस्तुओं पर एमआरपी के लिए आंदोलन हो रहा है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रविकांत जायसवाल ने कहा कि बाजार में बिकने वाली सामग्री की लागत-मुनाफा जोड़कर कीमत तय हों। छग अध्यक्ष जयंत हरदास ने कहा कि उत्पादन मूल्य प्रिंट होना चाहिए।

एमआरपी, एफआरपी और प्राइज कंट्रोल को ऐसे समझें

एमआरपी- मैक्सिमम रिटेल प्राइज (एमआरपी) यानी अधिकतम खुदरा मूल्य। यह देश में बिकने वाले सभी पैक्ड पदार्थों पर प्रिंट होता है। नियमानुसार, एमआरपी से अधिक रेट पर कोई प्रोडक्ट नहीं बेच सकते।

एफआरपी- फेयर एंड रेम्यूनेरेटिव प्राइज (एफआरपी) यानी उचित एवं लाभकारी मूल्य। कृषि उत्पादों पर केंद्र ने एफआरपी का नियम लगाया है। हालांकि दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर यह लागू नहीं किया गया है।

प्राइज कंट्रोल- नेशनल फॉर्मास्यूटिकल प्राइजिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने दवाइयों को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखा है। ऐसी 700 दवाइयां हैं, जिनकी दरें लागत और मार्जिन पर निर्धारित कर दी गई हैं।

रेट तय करने व नियंत्रण का कानून नहीं : केंद्र सरकार
पैक्ड प्रोडक्ट के दाम तय नहीं होते, न ही नियंत्रण के कोई नियम-कानून हैं। कंपनियों और उत्पादकों को एमआरपी घोषित करना होता है। एमआरपी से ज्यादा में प्रोडक्ट नहीं बिक सकता। नाप-तौल निगरानी करता है, लेकिन एमआरपी से भ्रम तो है। -आशुतोष अग्रवाल, उप निदेशक, खाद्य-पीडीएस मंत्रालय दिल्ली

क्या कहते हैं कारोबारी
खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता पर एमआरपी तय होती है। मार्केट में उतार-चढ़ाव से लगातार दाम बदलते हैं। डिमांड और सप्लाई पर भी दरें निर्धारित होती हैं। -जीतेंद्र दोषी, अध्यक्ष, कैट छत्तीसगढ़

70% खाद्य तेल विदेश से आता है। दरें अंतरराष्ट्रीय बाजार आधारित हैं। कंपनियां मार्जिन लेकर रेट तय करती हैं। इससे लोगों को नुकसान नहीं। -पोहूमल जेठानी, वरिष्ठ अनाज कारोबारी