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विश्वकर्मा जयंती:कल कारखानों में नियमों के साथ होगी पूजा... नहीं होंगे बड़े कार्यक्रम

रायपुरएक महीने पहले
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  • 17 सितंबर को सर्व पितृ मोक्ष के साथ श्राद्ध पक्ष का भी समापन होगा

दुनिया के पहले इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा की जयंती 17 सितंबर को मनाई जाएगी। इसी दिन सर्व पितृ मोक्ष के साथ 16 दिनी श्राद्ध पक्ष का भी समापन हो जाएगा। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इस बार पितरों और भगवान विश्वकर्मा की पूजा नियमों के दायरे में रहकर करनी होगी। नदी घाटों और तालाबों में न तो सामूहिक तर्पण दिया जाएगा और न ही फैक्ट्री-कारखानों में सामूहिक पूजा होगी। इस दिन शहर मेें कहीं बड़े कार्यक्रम की अनुमति भी नहीं होगी। दरअसल, हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या यानी 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक भगवान विश्वकर्मा देवताओं के शिल्पकार और वास्तुकार थे। इसी वजह से उन्हें दुनिया का पहला इंजीनियर भी कहा जाता है। हर साल इस दिन शहर में जगह-जगह कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

इस दिन उद्योग-फैक्ट्रियों की मशीनों समेत सभी तरह की मशीनों की पूजा की जाती है। श्रमिकों के लिए रक्तदान, श्रमिक कार्ड बनाने के लिए शिविर लगाए जाते हैं। हालांकि, इस बार कोविड 19 के संक्रमण की वजह से ऐसे बड़े कार्यक्रम कहीं नहीं होंगे। सीमित लोगों की मौजूदगी में भगवान की पूजा-अर्चना की जाएगी।

इस बार सोशल डिस्टेंसिंग के साथ करनी होगी पूजा-अर्चना
शहर में हर साल बड़ी धूमधाम से भगवान विश्वकर्मा की जयंती मनाई जाती है। फैक्ट्री-कारखानों के अलावा सार्वजनिक जगहों पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कई जगहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमाें का आयाेजन हाेता है। हालांकि, इस बार काेराेनाकाल में सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार बड़े आयोजन नहीं हाेंगे। इस साल लाेगाें काे फिजिकल डिस्टेंसिंग के साथ साधारण तरीके से पूजा करनी होगी। अन्य दूसरे अनुष्ठान भी सरकारी गाइडलाइन का पालन करते संपन्न कराए जाएंगे।

शिवजी के लिए सोने का महल बनाया था विश्वकर्मा ने
ऋग्वेद मे विश्वकर्मा के नाम से 11 ऋचाएं हैं। इसके हर मंत्र में लिखा है ऋषि विश्वकर्मा भौवन देवता आदि। इसमें इन्हें इंद्र व सूर्य का विशेषण भी बताया गया है। इसके अलावा यजुर्वेद में भी इनके नाम का जिक्र 16 मंत्रों में मिलता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानती थीं, वह अष्टम् वसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनीं। उन्हीं से संपूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ।

पुराणों में उन्हें कहीं योगसिद्धा तो कहीं वरस्त्री के रूप में भी संबोधित किया गया है। एक अन्य मान्यता के मुताबिक भगवान ब्रह्मा के आदेश पर विश्वकर्मा ने ही देवताओं के लिए महलों का निर्माण किया था। भगवान शंकर के लिए सोने का महल भी विश्वकर्मा ने ही बनाया थ्वा, जिसे रावण ने वरदान में उनसे प्राप्त कर लिया था। इनकी पूजा से व्यापार, व्यवसाय और उद्योग में प्रगति होती है।

कम मूर्तियाें की स्थापना होगी
हर साल भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमाएं कारखानों और सार्वजनिक जगहों पर स्थापित की जाती हैं, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से इस बार कम प्रतिमाओं की स्थापना होने की आशंका है। मूर्तिकारों की मानें तो 15 दिन पहले तक प्रतिमाओं के ऑर्डर आ जाते हैं, लेकिन इस बार बहुत देरी से ऑर्डर आ रहे हैं। इसमें भी 4 फीट से कम ऊंचाई की प्रतिमाओं की मांग ज्यादा है।

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