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नक्सली हमले की दर्दनाक कहानी बलराज सिंह की जुबानी:ग्रेनेड फटने से एसआई घायल हो गए मैंने पगड़ी फाड़कर पट्‌टी लगा दी, पेट को चीरती हुई निकल गई एक गोली, रायपुर में चल रहा इलाज

रायपुर7 दिन पहलेलेखक: प्रमोद साहू
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स्पेशल डीजी आरके विज ने बलराज को पगड़ी भेंट की। - Dainik Bhaskar
स्पेशल डीजी आरके विज ने बलराज को पगड़ी भेंट की।

पंजाब के तरनतारन गांव के रहने वाले बलराज सिंह की। उनकी तीन बहनें हैं। बकौल बलराज, उनके गांव में हर आदमी आर्मी में जाना चाहता है। बलराज सिंह कोबरा बटालियन के जवान हैं। उन्होंने जब देखा कि उनके एसआई को ग्रेनेड फटने के बाद पांव में छर्रे घुस गए हैं, तो उनके पास उस वक्त फर्स्ट एड नहीं था। बलराज सिंह सरदार हैं और पगड़ी पहनते हैं। लिहाजा, उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी, उसके कपड़े फाड़े और एसआई की पट्टी की। इसे देखते हुए छत्तीसगढ़ के स्पेशल डीजी आरके विज उनसे मिलने हास्पिटल पहुंचे और उन्हें पगड़ी भेंट की।

आइए, बलराज सिंह की कहानी जानते हैं उन्हीं की जुबानी
पगड़ी के सिवा कुछ था नहीं एसआई साहब की पट्टी करने, क्या करता: बासागुड़ा से 2 अप्रैल की रात 9 बजे हम गाड़ियों से निकले और तर्रेम पहुंचे। टेकलगुड़ा और जोनागुड़ा तक फोर्स को जाना था। वहां नक्सलियों के होने की सूचना थी। वहां से सर्चिंग करते हुए वापस आना था। 2000 जवानों की टीम अलग-अलग दिशा से निकली थी। जंगल में सर्चिंग करते हुए 12 किलोमीटर की दूरी तय कर 3 अप्रैल की सुबह लगभग 8 बजे जोनागुड़ा की पहाड़ियों के पास पहुंचे थे। वहां से टेकलगुड़ा और जोनागुड़ा गांव नजदीक था। नक्सली यहीं थे। उन इलाकों को सर्च किया गया, लेकिन तब वहां कोई नहीं था।

फोर्स थक गई और ऑपरेशन लगभग खत्म हो गया। जोनागुड़ा टीले में फोर्स रुक गई। लगभग 400 जवान थे। दो घंटे रुकने के बाद हमें वापस लौटना था। इसी दौरान अचानक फायरिंग शुरू हुई। पहाड़ियों से गालियां चलने लगी। पेड़ और टीले की आड़ लेकर जवानों ने भी जवाबी फायरिंग शुरू की। ग्रेनेड, रॉकेट लांचर से भी हमला हो रहा था। मेरे सामने एसआई साहब चल रहे थे। अचानक उनके सामने ग्रेनेड फटा और छर्रा उनके पैरों में लगा। पैरों से खून बहने लगा। वे पेड़ की आड़ लेकर बैठ गए। दर्द से चिल्ला रहे थे, लेकिन मरहम-पट्टी करने वाले भी घायल हो चुके थे। कुछ वहीं शहीद हो गए थे।

एसआई साहब का दर्द से बुरा हाल था। तब मैंने अपनी पगड़ी खोली और फाड़कर एसआई के पैरों में कसकर बांध दिया और फिर मोर्चा संभाल लिया। फायरिंग करते-करते हम नजदीक के गांव की ओर गए। नक्सली हमारा पीछा कर रहे थे। ये पूरी तरह उनका इलाका था, जिसके चप्पे चप्पे से वो वाकिफ थे और हम अनजान। नक्सली वहां आ गए और फायरिंग की। सामने से एक गोली आई और मेरे पेट को चीरकर निकल गई। खून बहने लगा। मैं वहीं बैठ गया। जवानों ने उठाने की कोशिश की तो उन्हें मना किया और कहा कि अभी मोर्चा संभालें। जवान सामने फायर करते हुए आगे बढ़ते रहे। तीन किलोमीटर चलने के बाद हम सीलगेर पहुंचे। यहां से हमें हेलीकॉप्टर से एयर लिफ्ट किया गया।

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