सफल ऑपरेशन:30 लाख में एक को होने वाली दुर्लभ बीमारी की सर्जरी

रायपुरएक वर्ष पहले
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मरीज के साथ डॉक्टर कृष्णकांत साहू। - Dainik Bhaskar
मरीज के साथ डॉक्टर कृष्णकांत साहू।
  • एसीआई में 40 साल के युवक के पेट की महाधमनी का किया सफल ऑपरेशन

अंबेडकर अस्पताल के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में दुर्लभ बीमारी इंफ्रारीनल एओर्टिक डायसेक्शन से ग्रसित 40 वर्षीय व्यक्ति की सफल सर्जरी की गई। यह केस 30 लाख में किसी एक को होता है। कार्डियो थोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी विभाग के एचओडी डॉ. कृष्णकांत साहू ने यह सर्जरी की। मरीज पूरी तरह स्वस्थ है और सोमवार को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।

डॉ. साहू ने बताया कि युवक तीन माह से पेट व कमर दर्द से परेशान था। धमनी की आंतरिक दीवार क्षतिग्रस्त हो गई थी। इससे ब्लड की सप्लाई धमनी के बाहर होने लगी थी। इस बीमारी को मेडिकल की भाषा में एओर्टिक डायसेक्शन या महाधमनी विच्छेदन कहते हैं। किडनी के ठीक नीचे महाधमनी में डायसेक्शन बहुत ही दुर्लभ है।

इस बीमारी में सबसे बड़ी समस्या बीमारी की पहचान कर समय पर इलाज न हो पाना है। सर्जरी के दौरान क्षतिग्रस्त महाधमनी के हिस्से को काटकर शरीर से अलग किया गया। इसके स्थान पर 7 बाई 14 मिमी के आकार की कृत्रिम नस (आर्टिफिशियल ग्राफ्ट) लगाया गया। इसे दोनों पैरों की नसों से जोड़ा गया।

इससे दोनों पैरों में ब्लड की सप्लाई शुरू हो गई। सर्जरी के दौरान पैरों में खून सप्लाई को रोक दिया गया था। इससे दोनों पैर खराब होने की आशंका बढ़ जाती है। ऑपरेशन के दौरान ब्लड सप्लाई को लगभग 18 मिनट के लिए रोका गया। इस बीच किडनी एवं अन्य अंगों की रक्षा के लिए विशेष प्रकार की दवाई दी गई।

प्रदेश के किसी मेडिकल कॉलेज में यह पहला ऑपरेशन है। इसे डीबेकी टाइप 3 या स्टेनफोर्ड टाइप बी एओर्टिक डायसेक्शन है। समय पर इलाज न मिलने पर 50 प्रतिशत मरीजों की मौत 24 से 48 घंटे में हो जाती है। किडनी खराब होने और पैर के काले पड़ जाने का तथा पेट से नीचे लकवा का बहुत ही ज्यादा रिस्क होता है। डॉ. साहू के अनुसार वर्तमान में राज्य के लगभग 90 प्रतिशत थोरेसिक एवं वैस्कुलर सर्जरी एसीआई में हो रही है।

पथरी समझकर करवाया इलाज मरीज के बड़े भाई टी. अरैया के अनुसार उन्होंने अपने भाई को कटक के मेडिकल कॉलेज के स्थानीय डॉक्टर से इलाज करवाया। इसे किडनी की पथरी समझकर इलाज किया गया। एम्स में पेट की महाधमनी की एंजियोग्राफी (एओर्टोग्राम) की गई तो पता चला कि पेट के अंदर स्थित महाधमनी में किडनी के ठीक नीचे स्थित महाधमनी की आंतरिक दीवार फट गई है।

इसके कारण ब्लड आंतरिक एवं मध्य दीवार के बीच भर रहा था। इसके कारण पेट से नीचे अंगों में ब्लड सप्लाई पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पा रही थी। मरीज व उनके परिजन डॉ. साहू के पास पहुंचे। डॉ. साहू ने एंजियोग्राफी फिल्म को देखकर सर्जरी प्लान की। सर्जरी में सीटीवीएस सर्जन डॉ. निशांत चंदेल, एनेस्थेटिस्ट डॉ. अनिषा नागरिया व डॉ. अनिल गुप्ता, नर्सिंग स्टाफ राजेंद्र, चोवाराम व मुनेश, टेक्नीशियन भूपेंद्र की मुख्य मुख्य भूमिका रही।

ऐसे होती है बीमारी

- यह बीमारी 60 या 70 साल की अधिक उम्र में कोलेस्ट्रॉल जमने से या फिर नसों की जन्मजात बीमारी से होती है। - आंतरिक चोट के कारण कम उम्र के लोगों को और अत्यधिक ब्लड प्रेशर से भी यह बीमारी होती है।

ऐसे हुई सर्जरी

मरीज को बेहोश कर पेट को खोला गया। पेट खोलने के बाद किडनी के ऊपर महाधमनी को लूप किया गया, जिससे जरूरत पड़ने पर ब्लड सप्लाई को नियंत्रित किया जा सके। खून पतला करने का इंजेक्शन देने के बाद किडनी के नीचे महाधमनी में क्लैंप लगाकर ब्लड सप्लाई को रोक दिया गया।

इसके बाद महाधमनी के हिस्से को काटकर शरीर से अलग कर दिया गया तथा टियर को रिपेयर किया गया। कृत्रिम ग्राफ्ट लगाते समय यह ध्यान दिया गया कि पेट में स्थित अन्य अंगों को कोई नुकसान न हो। ऑपरेशन के बाद मरीज को 24 घंटे वेंटिलेटर में रखा गया तथा खून पतला करने की दवाएं दी गई। 4 दिन तक केवल आईवी फ्लूड पर रखा गया।

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