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मानसून की वापसी शुरु:अप्रैल तक का पानी दे गई बारिश, भूजल स्तर भी आया ऊपर, इस बार मानसून को लौटने में 4-5 दिन की देरी

रायपुर13 दिन पहले
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उत्तर भारत में मानसून की वापसी की शुरुआत हो गई। राजधानी से मानसून अमूमन 15 अक्टूबर को लौट जाता है, लेकिन इस बार चार-पांच दिन की देरी हो गई। अगले दो-तीन दिन में अधिकतम एक सेमी बारिश के आसार ही हैं, लेकिन अगर वह न भी हो तो मानसून से राजधानी और प्रदेश को इस बार भरपूर पानी दिया है। खासकर राजधानी के लिए गंगरेल बांध में इतना पानी है कि अप्रैल अंत तक किसी तरह की कमी के आसार नहीं हैं। यही नहीं, शहर का भूजल स्तर पर इस साल 5 से 8 मीटर ऊपर आ गया है। शहर के लगभग ढाई लाख लोग नलकूप और बोर पर निर्भर हैं, लेकिन भूजल स्त्रोतों का वाटर लेवल भी अप्रैल में ही कम होने की संभावना है।

राजधानी से मानसून की विदाई लगभग इसी समय, यही लाभदायक
2019 - 10 अक्टूबर
2018 - 05 अक्टूबर
2017 - 17 अक्टूबर
2016 - 15 अक्टूबर
2015 - 18 अक्टूबर

मानसून के जरिए राजधानी में इस साल लगभग 1030 मिमी पानी बरसा है। यह सामान्य से 7 प्रतिशत अधिक है, इसीलिए सतह से लेकर भूजल तक, सभी जगह पानी की जरूरत पूरी हो गई है। नदी, तालाब और पोखर लबालब हैं, इसलिए भी भूजल को गर्मी में सहारा मिलेगा। लालपुर मौसम केंद्र के विज्ञानी एचपी चंद्रा के मुताबिक राजधानी से मानसून की वापसी के संकेत मिल रहे हैं, भले ही यह थोड़ा लेट है। पिछले 10 साल में केवल 2011 में ही मानसून रायपुर से 23 अक्टूबर को विदा हुआ था।

सब्जियां होंगी सस्ती
मानसून की वापसी और उत्तरी हवाओं का इंतजार इसलिए भी हो रहा है क्योंकि इस साल लॉकडाउन और बारिश की वजह से सब्जियां काफी महंगी बिक रही हैं। ज्यादातर सब्जियों की कीमत 60 से 80 रुपए किलो है। ठंड शुरू होते ही लोकल बाड़ियों की सब्जियां पहुंचने से लोगों को किफायती दाम पर सब्जियां मिलेंगी। बारिश नहीं थमी तो बाड़ियों में ही सब्जी खराब होने का खतरा रहता है।

ठंड का कारोबार
राजधानी में अक्टूबर से दिसंबर तक ठंड का मार्केट शुरू हो जाता है। शहर में जगह-जगह गर्म कपड़ों का बाजार सज जाता है। राजधानी ही नहीं उत्तरी भारत से भी बड़ी संख्या में कारोबारी आकर यहां गर्म कपड़ा बेचते हैं। अगले तीन-चार महीने तक दो हजार से ज्यादा परिवारों की रोजी-रोटी राजधानी के सर्द हवा से ही चलती है। इसलिए मानसून की विदाई का इंतजार हो रहा है।

चावल की इकोनॉमी
राजधानी सहित पूरे छत्तीसगढ़ में जून में मानसून का इंतजार इसलिए होता है क्योंकि यहां की 80 फीसदी से ज्यादा कृषि इकोनॉमी धान-चावल पर ही निर्भर है। अब तक 90% से अधिक फसल पक गई है। अब बारिश से इसकी बर्बादी तय है, क्योंकि तेज बारिश से खेतों में धान के पौधे गिरते हैं। अगर कट गया तो चावल की क्वालिटी खराब होती है। इससे फसल की कीमत और कारोबारी मुुनाफा प्रभावित होगा।

भास्कर नाॅलेज - इसलिए पड़ा मानसून नाम
अंग्रेजी शब्द मॉनसून पुर्तगाली शब्द (मॉन्सैओ) से निकला है। हालांकि शब्द का मूल उद्गम अरबी शब्द मॉवसिम (मौसम) से आया है। यह शब्द हिंदी के साथ-साथ उर्दू में भी इस्तेमाल होता है। इसकी एक कड़ी आधुनिक डच शब्द मॉनसन से भी मिलती है। इस परिभाषा के अनुसार विश्व की प्रमुख वायु प्रणालियां शामिल की जाती हैं। इनकी दिशा ऋतु के अनुसार बदलती रहती है। जहां तक मानसून का सवाल है, मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार प्रदेश में हवा की दिशा बदलना ही मानसून का आना और लौटना है। जब तक हवा दक्षिण-पश्चिम से आ रही है, तब तक यहां मानसून है। जब उत्तर-पश्चिम से आने लगेगी, अर्थात मानसून लौट गया।

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