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मंडे पॉजिटिव:कोलेस्ट्राल कम करने तिलहन कुसुम से तेल की दो किस्में तैयार, केंद्र को भेजा प्रस्ताव

रायपुर3 महीने पहले
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  • राज्य बीज विकास निगम ने किया अनुमोदन, कुसुम की नई किस्म चार माह में तैयार, इसमें तेल की मात्रा भी ज्यादा

(सुुधीर उपाध्याय) इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक पिछले 7 साल से लोकल तिलहन से खाने के ऐसे तेल पर काम कर रहे थे, जो ज्यादा निकले, सस्ता हो और जिनमें कोलेस्ट्राॅल कम करने के गुण ज्यादा हों। लंबी शोध के बाद वैज्ञानिकों ने यहां के तिलहन कुसुम (बर्रे) की ऐसी दो वैरायटी डेवलप कर ली है, जिनसे निकलने वाला तेल सस्ता भी होगा और देश में बिक रहे ब्रांडेड लो-कोलेस्ट्राल तेलों से बेहतर रहेगा। कुसुम-1 और कुसुम-2 नाम की इन वैरायटियों को प्रदेश की बीज समिति ने कई तरह के परीक्षण के बाद अनुमोदित कर दिया है। विवि से इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नोटिफाई करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने की तैयारी कर ली है। 
विश्वविद्यालय के अफसरों का कहना है कि भारत सरकार से नोटिफिकेशन होती ही दोनों वैरायटी संभवत: अगले रबी सीजन में प्रदेश के लिए रिलीज कर दी जाएंगी और बुअाई के चार महीने बाद, यानी फरवरी-मार्च 2021 तक इनके बीज बाजार में आ जाएंगे। इनसे तेल निकाला जा सकेगा। छत्तीसगढ़ में कुसुम को ग्रामीण इलाकों में बर्रे के नाम से भी जाना जाता है। इसके तेल में मोनो अनसेच्युरेटेड फैटी एसीड तथा पाॅली अनसेच्युरेटेड फैटी एसिड की मात्रा अधिक रहती है। 
इसलिए यह कोलेस्ट्राल रोधी माना जा रहा है। इसकी फसल का खास गुण ये है कि जैसे ही कुसुम का फल लगता है, इसके पौधे में कांटे उग अाते हैं और मवेशी इनसे दूर रहते हैं। 

120 दिन में तैयार होगी फसल 
वैज्ञानिकों के मुताबिक कुसुम की नई किस्में अन्य तिलहनी किस्मों की तुलना में जल्दी पकेगी। इसकी अवधि 120 से 125 दिन होगी। दूसरे सभी तिलहन पकने में 150 से अधिक दिन लगाते हैं। यही नहीं, कुसुम में तेल की मात्रा बीज के स्टाॅक के वजन की 35 प्रतिशत तक है। बीज एक एकड़ में 7.5 क्विंटल तक निकल सकता है। इससे किसानों को फायदा होने की पूरी संभावना है।

तिलहन में आएगी आत्मनिर्भरता
कृषि विवि प्रबंधन के मुताबिक तिलहन के मामले में भारत अभी आत्मनिर्भर नहीं है। प्रतिवर्ष लगभग 70 हजार करोड़ रुपए के खाने का तेल का आयात विदेशों से हो रहा है। ऐसे में तिलहन की नई किस्मों का विकास खाद्य तेलों में मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होगा। छत्तीसगढ़ में तिलहन रबी और खरीफ दोनों मौसम में लगायी जाती है। प्रमुख फसलों में सोयाबीन, मूंगफली, अलसी, सरसों है। कुसुम अब तेजी से बढ़ रही है।

कुसुम की दो नई वैरायटी विकसित की गई है। यह कांटेदार पत्तियों वाली किस्में हैं। इसे लगाने के लिए बाड़ लगाने की जरूरत नहीं होगी। हर तरह से किसानों के लिए यह वैराइटी अच्छी है। - डा. एसके पाटिल, कुलपति, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय

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