रोजगार उपलब्धता:मनरेगा हड़ताल का असर, 1 लाख की जगह 10 मजदूर प्रतिदिन काम कर रहे

पलारी2 महीने पहले
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देवरीकला एवं सेल में तालाब में पानी भरे हुए स्थल का गहरीकरण हेतु मस्टररोल जारी कराया गया - Dainik Bhaskar
देवरीकला एवं सेल में तालाब में पानी भरे हुए स्थल का गहरीकरण हेतु मस्टररोल जारी कराया गया

मनरेगा ग्रामीण स्तर पर रोजगार उपलब्धता की दृष्टि से एक वरदान से कम नहीं है जहां फसल कटाई के बाद ग्राम वासियों के पास कोई कार्य नहीं होता। इस खाली समय में वे अपने आजीविका हेतु केवल इस महती योजना पर निर्भर रहते हैं। वर्तमान में योजना में कार्यरत समस्त अधिकारी कर्मचारी 4 अप्रैल से 2 सूत्रीय मांग को लेकर बेमुद्दत हड़ताल पर चले गए हैं।

गत वर्ष 2021-22 में जिले में माह अप्रैल से औसत प्रति दिवस 1 लाख से 1 लाख 15 हज़ार श्रमिक कार्यरत होते थे। वर्तमान में औसत लगभग 10 हजार श्रमिक प्रति दिवस कार्य कर रहे हैं। यह कार्य एमआईएस पर ही है, फील्ड पर एक भी श्रमिक को रोजगार नहीं मिल रहा है। इसी कड़ी में जिले में प्रति दिवस विगत सप्ताह 7 हज़ार से 10 हज़ार श्रमिक कार्य किए गए हैं। यदि रोजगार उपलब्धता की बात की जाए तो केवल 227 मानव दिवस का रोजगार 31 परिवार के 38 सदस्यों को उपलब्ध कराया गया है।

इससे स्पष्ट होता है कि एमआईएस पर ही रोजगार उपलब्ध कराने का कार्य किया जा रहा है। सभी मस्टरोल शून्य किया जा रहा है या फिर फर्जी उपस्थिति दर्ज करा कर राशि गबन करने की योजना तैयार कर ली गई है। बलौदाबाजार जिले में 2 लाख 50 हजार परिवार में 4 लाख 90 हजार सदस्य पंजीकृत हैं। जिला रोजगार उपलब्धता की दृष्टि में प्रदेश में विगत 3 वर्षों में तीसरे पायदान पर रहा है।

पानी भरे स्थल का गहरीकरण, पलायन कर चुके लोगों के नाम पर बनाया मस्टररोल

देवरीकला एवं सेल में तालाब में पानी भरे हुए स्थल का गहरीकरण हेतु मस्टररोल जारी कराया गया है। इसी प्रकार बलौदाबाजार विकासखंड के ग्राम डोटोपार में मृत एवं पलायन कर गए व्यक्तियों का मस्टररोल जारी किया गया है। आखिर यह फर्जीवाड़ा किसकी शह पर हो रहा है और क्यों किया जा रहा है?इस पर छत्तीसगढ़ शासन को अपना ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।

रू.11 करोड़ का भुगतान लंबित, सरपंच भी परेशान

मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर चले जाने से पूर्व में किए गए कार्यों का भुगतान भी लटका हुआ है चाहे मजदूरी की बात की जाए या सामग्री की जिले में लगभग 11 करोड़ रुपए से अधिक की सामग्री राशि लंबित है जिससे सरपंचों का मनोबल योजना के प्रति धीरे-धीरे गिरने लगा है।

पंच कर्ज से लदे हुए हैं एक तरफ शासन उन पर कार्य करने के लिए दबाव बना रहा है तो दूसरी तरफ सरपंच साहूकार के कर्ज से परेशान हैं। यह दोहरी नीति पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग हेतु समझ से परे है।

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