हौसले से दिव्यांग ने किया पोस्‍ट ग्रेजुएशन:काम की तलाश है पर ‘व्यवस्था की दिव्यांगता’ आड़े आ रही

पलारी7 महीने पहलेलेखक: चंद्रशेखर वर्मा
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पैरों के सहारे ही कंप्यूटर चलाते हुए गबौद के दिव्यांग सुलेंद्र कुर्रे। - Dainik Bhaskar
पैरों के सहारे ही कंप्यूटर चलाते हुए गबौद के दिव्यांग सुलेंद्र कुर्रे।

गबौद निवासी 25 साल के सुलेंद्र कुर्रे के दोनों हाथ नहीं है पर गरीब किसान के इस बेटे ने हौसले की बदौलत पीजी (हिंदी साहित्य में एमए) कर लिया है। रोजगार की तलाश है और दिव्यांग होने के नाते सरकार से उम्मीद भी करता है कि वह उसे आत्मनिर्भर बनाने में मदद करे पर अफसरों के चक्कर लगाकर थक चुका है।

सुलेंद्र रोजगार की तलाश में मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर तक के चक्कर लगा चुका है पर आज भी उसके हाथ खाली ही हैं। सुलेंद्र कहता है आज मैं शरीर से दिव्यांग हूं पर मन से नहीं। यह विश्वास मेरे परिवार व पत्नी ने ही मेरे मन में पैदा किया है।

पिता के कंधे बने शिक्षा का सहारा, कंप्यूटर, मोबाइल पर भी नियंत्रण है गबौद के दिव्यांग सुलेंद्र कुर्रे का
हर गरीब की तरह सुलेंद्र की कहानी भी अलहदा नहीं है, संघर्ष कर उसने शिक्षा तो प्राप्त कर ली ताकि समाज के पढ़े लिखे लोगों की पंक्ति में खड़ा हो सके पर पेट भरने रोटी भी जरूरी है, जो उसे रोजगार से ही मिलेगी। सुलेंद्र बताता है कि प्राइमरी से मिडिल तक की शिक्षा उसने गृहग्राम गबौद में ही पूरी की।

पिता की मदद से पैरों से कलम पकड़ना सीखा फिर धीरे-धीरे पकड़ मजबूत होती गई और वह पैरों से लिखने में दक्ष हो गया। इसके बाद पैरों से ही कंप्यूटर भी ऑपरेट करना सीख गया। मोबाइल चलाने में समस्या आड़े आई पर होठों की मदद से वह इसे भी नियंत्रित करने में सफल रहा। आज वह मोबाइल पर होठों से नंबर भी सेव कर लेता है।

इसके बाद 9वीं से 11वीं तक की पढ़ाई गबौद से 3 किमी सोनारदेवी से पूरी की। चल तो सकता नहीं था अत:पिता के कंधों पर बैठकर स्कूल जाता और शाम को उन्हीं के कंधों पर बैठकर वापस आता। हॉस्टल में विकलांग होने के कारण एडमिशन नहीं मिलता था। इसके बाद 12वीं व कॉलेज की पढ़ाई बलौदाबाजार में पूरी की।

गांव से 20 किमी दूर शहर तक रोज आना संभव नहीं था इसलिए गरीब पिता बलिराम कुर्रे ने किराए का छोटा सा कमरा बलौदाबाजार में ले लिया और वे ही उसे खाना बनाकर खिलाते तथा स्कूल-कॉलेज तक लेकर जाते थे। गांव में मां विश्वंतीन कुर्रे आंगनबाड़ी कार्यकर्ता है। वह इस दौरान गांव में ही रहकर जीवन बसर करती रही तथा 2 एकड़ खेत भी जोतती रही ताकि खाने लायक अनाज पैदा हो सके।

दीप्ति की सोच ने सुलेंद्र को बनाया जीवनसाथी ​​​​​​​​​​​​​​इस बीच सुलेंद्र 25 साल का हो चुका था इसलिए पिता ने विवाह भी कर दिया। विवाह के लिए समाज के परिचय सम्मेलन में गए तो हिंदी साहित्य में एमए दीप्ति की नजर इस पढ़े-लिखे युवा पर पड़ी। दीप्ति ने बताया कि उसने ऐसे ही व्यक्ति को जीवनसाथी बनाने का मन बना रखा था जो पढ़ा लिखा हो पर सुलेंद्र से मिलने पर उसे लगा कि दिव्यांग होने पर भी जो पढ़ाई-लिखाई में इतना कुशाग्र हो वह जरूर बिरला ही होगा। मुझे सुलेंद्र से प्रभावित होते देर न लगी,तत्काल घर वालों को राजी किया और विवाह पक्का किया।

मुझे मदद नहीं, काम चाहिए, हुनरमंद भी हूं: सुलेंद्र
सुलेन्द्र ने बताया-शुरुआती दिनों में कभी कभी ऊपर वाले से शिकायत रहती थी क्योंकि मुझे औरों से अलग जो बनाया है। धीरे धीरे स्वयं पर विश्वास हुआ और सारा काम पैरों के माध्यम से आसानी से कर लेता हूं। डाटा ऑपरेटर के रूप में कार्य करने का अनुभव है। कोरोनाकाल में सारे संस्थान बंद होने की वजह से थोड़ी दिक्कत हुई है।

वह बताता है-दुनिया संवेदना तो जाहिर करती है लेकिन बात जब सहयोग की आती है धीरे-धीरे सभी किनारे होने लगते है। मुझे सहयोग नहीं काम चाहिए क्योंकि मुझमें हुनर है और शिक्षित भी हूं। मेरी पत्नी दीप्ति कुर्रे हमेशा प्रोत्साहित करती है। आज वह भी पोस्ट ग्रेजुएट हो गई है। कोई तो होगा जो हमारी काबिलियत की पहचान करेगा। उम्मीद और विश्वास के सहारे ही जीवन चल रहा है।

होठों से चलाता है मोबाइल
वैसे तो सुलेेंद्र के दोनों हाथ नहीं मगर मोबाइल में नंबर सेव करना, नंबर डायल करना और बात करना बखूबी जानता है। किसी से बात करना भी हो तो होठों से ही नंबर ढूंढकर उससे बात कर लेता है।​​​​​​​

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