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भास्कर 360°:ऐतिहासिक किसान आंदोलन, जो देश में बदलाव की बड़ी वजह बने

नई दिल्ली2 महीने पहले
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तस्वीर राजपथ की है। 1988 में किसानों ने मांगों को लेकर ट्रैक्टर ट्रॉली से घेराव किया था। - Dainik Bhaskar
तस्वीर राजपथ की है। 1988 में किसानों ने मांगों को लेकर ट्रैक्टर ट्रॉली से घेराव किया था।
  • दो माह से अधिक समय से चल रहा आंदोलन हाल ही में उग्र हो गया है

केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में दो महीने से भी अधिक समय से चल रहे किसान आंदोलन ने अभी तक कई उतार चढ़ाव देख लिए हैं। दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के पहले तक किसानों ने किस मैनेजमेंट के साथ शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन को चलाया यह भी लोगों ने देखा, लेकिन दिल्ली में हुई हिंसा के बाद इस आंदाेलन पर सवाल उठने लगे हैं।

आंदोलन की शुरुआत से लेकर अब तक किसानों और सरकार के बीच 11 राउंड में 45 घंटे से अधिक की बातचीत हो चुकी है। सरकार ने इन कृषि कानूनों में 20 से अधिक बदलाव करने के लिए लिखित में आश्वासन भी दे दिया था, लेकिन इस एक घटना से इस लंबी प्रक्रिया पर पानी फिरता दिख रहा है। देश में आजादी के पहले से ही कई ऐसे किसान आंदोलन हुए है जिन्होंने तत्कालीन सरकार को झुकने पर मजबूर किया है। फिर चाहे नील की खेती हो, विनोबा भावे का भूदान आंदोलन लगान वसूली हो, जमीदारी प्रथा हो या फिर बंधुआ मजदूरी हो।

किसानों के आंदोलनों के कारण ही उन्हें इससे मुक्ति मिल सकी है। हालांकि किसानों का संघर्ष अभी भी जारी है। उसका कारण है, फसलों के उचित दाम की उनकी सबसे पुरानी मांग आज भी अधूरी है। जानकारों का मानना है कि यही वो कारण है, जिसने किसानों को आर्थिक रूप से काफी पीछे धकेल दिया है। वर्तमान में दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन में एमएसपी की गारंटी प्रमुख मांगों में से एक है। आइए इस रिपोर्ट में जानते हैं देश में आजादी से पहले और बाद में हुए उन आंदोलनों के बारे में जिन्होंने देश की राजनीति की दिशा बदल दी।

1988 दिल्ली के बोट क्लब पर आंदोलन, राजीव को मानना पड़ा था 35 सूत्रीय चार्टर

किसान नेता महेंद्रसिंह टिकैत ने 1988 में 5 लाख किसानों को एक सप्ताह तक दिल्ली के बोट क्लब पर इकट्‌ठा कर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थी। करीब 14 राज्यों के किसान शामिल हुए थे। किसानों के समूह ने विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक कब्जा कर लिया था। किसानों ने अपने ट्रैक्टर और बैल गाड़ियां भी बोट क्लब में खड़े कर दिए थे। उस वक्त बोट क्लब में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के लिए बनाए जा रहे मंच पर किसान बैठ गए। टिकैत ने चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार उनकी बात नहीं सुन रही इसलिए वे यहां आए हैं। अंतत: राजीव सरकार ने किसानों के 35 सूत्री चार्टर को स्वीकार किया।

1967 नक्सलबाड़ी आंदोलन, खेती की जमीन से शुरू हुआ था आंदोलन

इस आंदोलन में किसानों की मुख्य मांग बड़े काश्तकारों को खत्म करना, बेनामी जमीनों के समुचित वितरण की थी। दरअसल बंगाल में कम्युनिस्टों के सत्ता में होने के कारण किसान आंदोलन अपने उफान पर था। इससे घबराए जमींदारों ने बटाईदारों को बेदखल करना शुरू कर दिया। इनमें से एक किसान बिगुल ने अपने पक्ष में दीवानी अदालत का आदेश प्राप्त कर लिया, लेकिन जमींदार उसे कब्जा देने के लिए तैयार नहीं हुआ। जवाब में किसानों ने पार्टी के स्थायी नेतृत्व की अगुवाई में किसान समितियां और हथियारबंद दस्ते बना कर जमीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। झूठे दस्तावेज जलाए गए, कर्ज के प्रोनोट नष्ट किए जाने लगे। बाद में यह नक्सलवादी आंदोलन बन गया।

1947 तेलंगाना आंदोलन, छोटे किसानों का ‘गोरिल्ला युद्ध’

आजादी के तुरंत बाद 1947 से 1951 तक तेलंगाना (पूर्व की हैदराबाद रियासत) में सामंती अर्थव्यवस्था के खिलाफ आंदोलन चला। आंध्र प्रदेश में यह अांदोलन जमीदारों-साहूकारों के शोषण की नीति के खिलाफ शुरू हुआ। ‘कम कीमत पर गल्ला वसूली’ इस आंदोलन का मुख्य कारण था। किसानों की अधिकांश मांगें आर्थिक समस्याओं से संबंधित थीं। इसमें छोटे किसानों ने जमीदारों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। हालांकि आंदोलन असफल रहा, लेकिन रेड्‌डी और कम्मा जैसी पिछड़ी जातियों को फायदा हुआ। वो आज यहां सत्ता की धुरी हैं।

आज़ादी पूर्व आंदोलन

1. चंपारण संघर्ष : नील की खेती के विरुद्ध 1917 में महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, नजहरुल-हक आदि नेताओं ने किसान आंदोलन किया।

2. खेड़ा संघर्ष : 1919 में गुजरात में फसल नष्ट होने से किसान लगान स्थगन की मांग कर रहे थे। कमान गांधीजी, पटेल जैसे नेताओं के हाथ थी।

3. मालावार का किसान विद्रोह : मालावार में 1921 में अकाल की हालत और ब्रिटिश शासकों के शोषण के कारण आंदोलन शुरू हुआ।

आंदोलन से किसानों को कई अधिकार मिले लेकिन वे नाकाफी

एकता परिषद के संयोजक पीवी राजगोपाल बताते हैं कि ब्रिटिश भारत और आजादी के बाद अनेक आंदोलनों की वजह से किसानों के हित में कई कानून बने। कई कानून बनने के बावजूद किसानों की हालात में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ जिसकी वजह से आत्महत्या और पलायन दोनों के मामले बढ़ रहे हैं। सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और उस पर खरीद की अनिवार्यता का कानून अभी तक नहीं बना।

मंडी सिस्टम भी लचर है, जिसे ख़त्म करने की बजाय एकीकृत एपीएमसी मंडी कानून से उसे दुरुस्त और प्रभावी करने की जरूरत है। आर्थिक सर्वेक्षण में रिसर्च और विकास पर निवेश पर जोर दिया गया है, जिसका कृषि क्षेत्र में घोर अभाव है। कृषि क्षेत्र में विकास के लिए कंपनियों के सीएसआर फंड के निवेश के प्रावधान का कानून भी बनना चाहिए।

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