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कोरोना पर उम्मीद:सीएसआईआर महानिदेशक बोले- वैक्सीन ही कोरोना का इलाज नहीं, स्वदेशी समेत 7 दवाओं पर ट्रायल जारी; जल्द मिल सकती है सस्ती दवा

नई दिल्लीएक वर्ष पहलेलेखक: अनिरुद्ध शर्मा
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सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ. शेखर सी. मांडे। - Dainik Bhaskar
सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ. शेखर सी. मांडे।
  • डॉ. शेखर मांडे बोले- एक हजार जीनोम सीक्वेंसिंग के बाद दवा और वैक्सीन बनाने में मदद मिलेगी
  • देश की 37 लैब में रिसर्च के लिए जुटे हैं वैज्ञानिक, वायरस के अलग-अलग क्लैड मिले मगर म्यूटेशन नहीं

कोविड-19 के खिलाफ देश की शीर्ष वैज्ञानिक अनुसंधान संस्था ‘काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च’ (सीएसआईआर) की 37 लैब में लॉकडाउन के दौरान वैज्ञानिक अलग-अलग शोध और तकनीक तैयार करने में जुटे हैं। सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ. शेखर सी. मांडे ने कहा कि ये एक गलतफहमी है कि वैक्सीन ही काेराेना का एकमात्र इलाज है। यह दवा या वैक्सीन दोनों में से कुछ भी हो सकता है। उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

सवाल: सीएसआईआर की लैब लगातार कोविड-19 वायरस पर निगरानी कर रही है, अभी तक क्या पता चला है यानी क्या स्थिति है?
कोरोनावायरस के सर्विलांस के लिए हमारी तीन लैब-सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (हैदराबाद), इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (नई दिल्ली) और इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी (चंडीगढ़) में देश के अलग-अलग हिस्सों से मरीजों के 100 ज्यादा सैंपल से मिले वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग की गई। इनमें वायरस के अलग-अलग क्लैड (स्ट्रेंड) तो मिले लेकिन अभी तक भारत विशेष म्यूटेशन नहीं मिला है। जो क्लेड मिले हैं, उनसे पता चलता है कि वह यूरोप, मध्य एशिया, साउथ एशिया और पश्चिमी एशिया से भारत पहुंचा है।

मई के आखिरी तक एक हजार वायरस सैंपल के जीनोम सीक्वेंसिंग करने का लक्ष्य है। सीएसआईआर यह डेटा ग्लोबल इनिशिएटिव ऑन शेयरिंग ऑल इंफ्लूूएंजा डेटा के साथ साझा करेगा। जीनोम सीक्वेंसिंग से न केवल वायरस की उत्पत्ति को समझने में मदद मिलती है बल्कि दवा या टीका बनाने की प्रक्रिया में यह मददगार साबित होता है।

सवाल: कोरोना का इलाज केवल वैक्सीन ही है?
ये एक गलतफहमी है कि वैक्सीन ही एकमात्र कोविड-19 का इलाज है। यह दवा या वैक्सीन दोनों में से कुछ भी हो सकता है। कोविड-19 पर शुरुआती शोध से हमारी समझ बढ़ रही है। 

सवाल: क्या सीएसआईआर ने कोविड-19 की कोई दवा ढूंढ़ी या किसी दवा का ट्रायल चल रहा है?
सीएसआईआर ने दो दर्जन से ज्यादा दवाओं को कोरोना के इलाज में नए सिरे से उपयाेग के लिए चुना है। इनमें से माइक्रोबेक्टिरियम डब्ल्यू पर ट्रायल शुरू कर दिया है और इसके अलावा फेविपीराविर और एचसीक्यूएस के ट्रायल के लिए भी अनुमति मिली है। आज-कल में ही दो ट्रायल एक साथ एम्स दिल्ली, एम्स भोपाल और पीजीआई चंडीगढ़ में शुरू होंगे। फेविपीराविर का पेटेंट खत्म हो चुका है इसलिए यदि यह ट्रायल सफल रहा तो दवा सस्ती भी होगी।

चूंकि यह दवाएं पहले से इस्तेमाल में हैं, इनके मॉलीक्यूल सेफ हैं। इसलिए इनके लिमिटेड ट्रायल करने पड़ेंगे। एक-दो महीने में देश को खुशखबरी मिल सकती है। फिलहाल इन तीन दवाओं के अलावा आयुष की चार देसी औषधियों अश्वगंधा, मुलेठी, गुड़ची पीपली और आयुष-64 (एंटी मलेरिया ड्रग) पर भी ट्रायल शुरू किया जा रहा है।

सवाल: क्या सीएसआईआर वैक्सीन विकसित करने की दिशा में भी कुछ कर रहा है?
सीएसआईआई ने मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित करने के प्रोजेक्ट को फंड किया है जिसमें नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस-पुणे, आईआईटी-इंदौर, प्रेडोमिक्स और भारत बायोटेक शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत ऐसा एंटीबॉडी तैयार होगा, जो कोविड-19 संक्रमण वाले मरीज के शरीर में वायरस का न्यूट्रिलाइज कर सकेगा।

सवाल: क्या यही प्लाज्मा ट्रीटमेंट है, जिसका सफल प्रयोग दिल्ली के अस्पताल में भी कुछ मरीजों पर किया गया?
नहीं, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित करना प्लाज्मा ट्रीटमेंट से अलग है। प्लाज्मा ट्रीटमेंट में किसी ठीक हो चुके मरीज का प्लाज्मा नए मरीज के शरीर में सीधे ही डाला जाता है। प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी वायरस को न्यूट्रीलाइज कर भी सकते हैं और नहीं भी। लेकिन मोनोक्लोनल वाले तरीके में वायरस को न्यूट्रीलाइज करने वाले एंटीबॉडी (इम्यून सेल) की पहचान करके उसे क्लोन करके तैयार किए जाते हैं। ये ज्यादा कारगार होता है। हालांकि प्लाज्मा ट्रीटमेंट में सीएसआईआर की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कैमिकल बायोलॉजी (कोलकाता) में शोध जारी है और ट्रायल शुरू किए गए हैं।

सवाल: लैब उपकरणों या मेडिकल स्टाफ की सेफ्टी के लिए सीएसआईआर लैब में क्या योगदान किया?
सीएसआईआर के नेशनल एयरोस्पेस लैब ने मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा के लिए पीपीई कवरऑल तैयार किया। बेंगलुरू की एक निजी कंपनी को इसकी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की गई और वह प्रतिदिन 5 हजार कवरअॉल तैयार कर रहा है। 15 मई से इसका उत्पादन 30 हजार कवरऑल प्रतिदिन हो जाएगा। इसी लैब में बाइपैप वेंटीलेटर विकसित किया है। एक से दो दिन में इसकी टेक्नोलॉजी को मंजूरी के लिए भेजा जा रहा है, तमाम कंपनियों ने पहले से ही इसे बनाने में अपनी दिलचस्पी दिखाई है।

तकनीकी ट्रांसफर में हमें बस एक दिन लगता है। कंपनियों को हो सकता प्रोडक्ट के उत्पादन से पहले उसका कच्चा माल जुटाने में दो-तीन हफ्ते लग जाए और चौथे हफ्ते तक प्रोडक्ट इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होने लगेगा। इसके अलावा चेेन्नई की लैब ने कोविड-19 की आपातकालीन स्थिति में महज 5 से 7 दिन में 100 से 200 बेड का आइसोलेशन वार्ड या अस्पताल विकसित करने की तकनीक व मॉडल विकसित किया है।

सवाल: पेपर बेस्ट टेस्टिंग किट महीनेभर में बाजार में होगी?
कोविड-19 की टेस्टिंग के लिए आरटीपीसीआर सबसे सटीक है। इसमें सीएसआईआर ने सैंपल पुलिंग की तकनीक विकसित की। एक बार में 1 की बजाय 5 टेस्ट से न केवल टेस्ट सस्ता होगा बल्कि इसकी सटीकता भी कम नहीं होती। दूसरा, हमने फेलुदा नामक पेपर बेस्ड टेस्टिंग किट विकसित की, जिसकी टेक्नोलॉजी टाटा संस को ट्रांसफर की जा चुकी है। आप उम्मीद कर सकते हैं कि अगले तीन से चार हफ्ते में वह बाजार में उपलब्ध होगा।

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