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किसान आंदोलन:किसानों का रेल रोको आह्वान, ट्रैकों पर बढ़ाई गई सुरक्षा

नई दिल्ली19 दिन पहले
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किसान आंदोलन - Dainik Bhaskar
किसान आंदोलन
  • दिल्ली आने वाली लाइनों पर आरपीएफ ने संभाला मोर्चा, विशेष टास्क फोर्स तैनात

कृषि कानूनों के विरोध में 18 फरवरी को किसानों ने गुरुवार को दोपहर 12 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक ट्रेनों को रोकने का ऐलान करते हुए इस दौरान यात्रियों को चाय पिलाने और ड्राइवरों व चालकों को माला पहनाने की की बात कही है। इसी को देखते हुए उत्तर रेलवे ने ट्रैकों के आस-पास सुरक्षा बढ़ा दी है।

किसानों के ऐलान के बाद बुधवार को दिल्ली खासकर हरियाणा व यूपी से सटे स्टेशनों पर आरपीएफ ने चौकसी बढ़ा दी है। सुरक्षा के लिए करीब आरपीएफ की अतिरिक्त कंपनियां लगाई गई है। स्टेशनों तक पहुंचने के मुख्य रास्तों के अलावा अन्य भी रास्ते बंद कर दिए गए हैं। किसी भी आपात स्थित से निपटने के लिए स्टेशनों के आसपास बैरिकेडिंग बढ़ा दी गई है। देशभर मेंं आरपीएफ की 20 विशेष टास्क फोर्स लगाई गई है। हरियाणा, पश्चिम बंगाल पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

दिल्ली एनसीआर में ट्रैकों पर आरपीएफ ने बढ़ाई पेट्रोलिंग
आरपीएफ ने बॉर्डर से सटे ट्रैक, व सिंघू बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर के आसपास स्टेशनों जैसे नरेला, आनंद विहार टर्मिनल, शाहदरा आदि के आसपास ट्रैकों पर पेट्रोलिंग बढ़ा दी है। रेलवे अधिकारियों के मुताबिक रेल यातायात अपने तय समय पर चलेगा। रेल परिचालन में बाधा डालना गैर कानूनी है। नियम तोड़ने वालों के खिलाफ आरपीएफ के साथ मिलकर नियमों के मुताबिक सख्त कार्रवाई की जाएगी।

उत्तर रेलवे सावधानी बरत रही है। रेलवे के संचालन में अगर कोई किसी तरह की बाधा डालता है तो उसके खिलाफ रेलवे एक्ट के तहत कार्रवाई की जा सकती है। अगर ट्रेन पर किसी तरह का सामान फेंका जाए या पटरी को नुकसान पहुंचा तो दोषी को रेलवे एक्ट की धारा 150 के तहत उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।
-दीपक कुमार, प्रवक्ता, उत्तर रेलवे

हर दिन घट रही है प्रदर्शनकारियों की संख्या

कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की तरफ सिंघू बार्डर पर चल रहे धरने में गिने -चुने प्रदर्शनकारी ही नजर आ रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। सोमवार को धरने में एक सौ से भी कम लोग दिखाई दे रहे थे, वहीं सिलसिला बुधवार को भी जारी है। गणतंत्र दिवस के पूर्व धरने में प्रदर्शनकारियों की तादाद इतनी रहती थी कि उन्हें बैठने के बदले खड़े रहकर ही वक्ताओं के भाषण को सुनना पड़ता था।

अब जिस तरह से उनकी संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है, उससे यही कहा जा सकता है कि प्रदर्शनकारी आंदोलन के नाम पर अब केवल मंच व टेंटों के जरिये सड़क को घेरे हुए हैं। अब पहले की तरह किसान मजदूर संघर्ष कमेटी पंजाब के मंच पर न तो गहमागहमी दिखाई देती हैं और ना ही लंगर में कोई भीड़ ही नजर आती है।

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