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किसानों के आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला:कानून होल्ड, कमेटी बनी, यह दो माह में रिपोर्ट देगी; लेकिन, किसान आंदोलन जारी रखने पर अड़े

नई दिल्ली5 दिन पहले
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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो
  • किसानो ने कहा -कमेटी भी सरकारी है, हम घर नहीं लौट रहे

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तीनों कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी। साथ ही एक कमेटी भी बना दी, जो सरकार और किसानों से बातचीत करके दो महीने में कोर्ट को रिपोर्ट देगी। कमेटी बनाने के कोर्ट के फैसले पर केंद्र सरकार ने कहा कि अब आगे कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वह मान्य होगा। लेकिन, दूसरी ओर किसानों ने कमेटी के सामने बात रखने से ही इनकार कर दिया।

किसान नेता राकेश टिकैत और डॉ. दर्शनपाल सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के चारों सदस्य नए कृषि कानूनों का खुलेआम समर्थन करते रहे हैं। ये ‘सरकारी लोग’ हैं। इसलिए आंदोलन खत्म नहीं होगा, बल्कि 26 जनवरी काे राजपथ पर परेड की तैयारियां और तेज की जाएंगी।

कमेटी में भारतीय किसान संघ के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के डायरेक्टर डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवट हैं। चीफ जस्टिस एसए बाेबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कमेटी को 10 दिन में काम शुरू करने के आदेश दिए हैं।

इससे पहले सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया- ‘कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं कि नए कानूनों से किसानों की जमीन छीन ली जाएगी। लेकिन, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में अनुबंध केवल फसल का होगा, जमीन का नहीं।’ इस पर कोर्ट ने कहा कि सरकार और किसान, दोनों ही अपने पक्ष अब कमेटी के सामने रखें।

आप भी जानिए... कमेटी के चारों सदस्यों के बारे में

भूपिंदर सिंह मान: कृषि कानूनों का खुलेआम समर्थन कर चुके हैं
किसान नेता हैं। राज्यसभा में मनोनीत सदस्य भी रहे हैं। 14 दिसंबर को कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को पत्र लिखकर कहा था कि उनका किसान संगठन तीनों कृषि कानूनों का समर्थन करता है।

अनिल घनवट: नए कृषि कानूनों के पक्ष में बोल चुके हैं
महाराष्ट्र में शेतकारी संघ के अध्यक्ष हैं। कहते रहे हैं कि नए कानूनों से गांवों में कोल्ड स्टोरेज में निवेश बढ़ेगा। अगर दबाव में सरकार कानून वापस ले लेती है तो किसानों को नुकसान होगा।

अशोक गुलाटी: कानूनों से किसानों को फायदा होने का दावा कर चुके हैं
कृषि अर्थशास्त्री हैं। नीति आयोग के तहत काम करने वाली एग्रीकल्चर टास्क फोर्स के सदस्य भी हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि नए कानूनों से किसानों को फायदा होगा।

प्रमोद जोशी: कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को किसानों के लिए फायदेमंद बता चुके हैं
अर्थशास्त्री हैं। 2017 में जब कानून बन रहे थे, तब एक लेख लिखा था। कहा था कि कानून बनने के बाद मूल्यों में उतार-चढ़ाव होने पर किसानों का जोखिम कम होगा। यह फायदे की बात है।

यह कमेटी दो महीने में सभी पक्षों से बात करने के बाद रिपाेर्ट सिर्फ सुप्रीम काेर्ट काे देगी। हालांकि, किसानों ने कमेटी से बात करने से इनकार कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट लाइव ऐसा नहीं हो सकता कि जब उन्हें (किसान) सुप्रीम कोर्ट के आदेश सही नहीं लगे तो वे इन्हें अस्वीकार करने लग जाएं...

एमएल शर्मा (किसानों के वकील): किसान किसी भी कमेटी के सामने नहीं जाना चाहते। कानूनों को रद्द करवाना चाहते हैं। उन्हें जमीन छिनने का डर है। {चीफ जस्टिस: किसान की जमीन नहीं बिकेगी। हम अंतरिम आदेश में कहेंगे कि किसानों की जमीन के आधार पर कॉन्ट्रैक्ट नहीं होगा। हम समाधान चाहते हैं। हमारे पास अधिकार हैं, जिसमें एक यह है कि हम कानून के अमल पर रोक लगा दें।

शर्मा: कोर्ट ही हमारी आखिरी उम्मीद है।
चीफ जस्टिस: सभी को न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि जब उन्हें (किसान) आदेश सही न लगे तो वे इसे अस्वीकार करने लगें। यह राजनीति नहीं है। किसानों के वकील दुष्यंत दवे ने कहा था कि किसान 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली नहीं निकालेंगे। मगर, अब सुनने में आ रहा है कि वे ट्रैक्टर रैली निकाल रहे हैं। गणतंत्र दिवस को बाधित करने की तैयारी है। सवाल यह उठता है कि वे समस्या का हल चाहते हैं या समस्या बनाए रखना चाहते हैं।

शर्मा: किसानों का कहना है कि सब उनसे बात करने आ रहे हैं तो प्रधानमंत्री उनसे बात करने क्यों नहीं आते?

चीफ जस्टिस: हम प्रधानमंत्री को नहीं कहेंगे कि वे किसानों से वार्ता के लिए बैठक में हिस्सा लें। कमेटी ज्यूिडशियल केस का हिस्सा होगी। वह कोर्ट के लिए काम करेगी। सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता: कृषि मंत्री इस मुद्दे पर किसानों से बात कर रहे हैं। एपी सिंह (किसानों के वकील): किसानों को विश्वास में लेना होगा। हमारे संगठन (भानु गुट) की ओर से बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं आंदोलन में हिस्सा नहीं लेंगे। विकास सिंह (किसानों के वकील): किसानों को आंदोलन के लिए रामलीला मैदान में जगह मिलनी चाहिए। चीफ जस्टिस: रैली के लिए प्रशासन को आवेदन दिया जाता है। पुलिस शर्तें रखती हैं। पालन नहीं करने पर अनुमति रद्द करती है। किसान वहां आवेदन दे सकते हैं।

प्रतिबंधित संगठन के आंदोलन में आने पर रिपोर्ट तलब
सुनवाई के दौरान वकील हरीश साल्वे ने कहा कि आंदोलन में ‘सिख्स फाॅर जस्टिस’ के बैनर लगे हैं। यह संगठन खालिस्तान समर्थक है। इस पर चीफ जस्टिस ने अटाॅर्नी जनरल केके वेणुगाेपाल से पूछा कि क्या वे इसकी पुष्टि करते हैं? वेणुगोपाल ने कहा कि यह प्रतिबंधित संगठन है। इस पर चीफ जस्टिस ने रिपोर्ट तलब करते हुए कहा- ‘हम पहले दिन से ही कह रहे हैं कि कानून-व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।’

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