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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर 4 ग्राउंड रिपोर्ट:महिला उद्यमियों के लिए अलग इंक्यूबेशन सेंटर सिर्फ हैदराबाद में, बंगाल में फैसले लेती हैं बेटियां; बेंगलुरु वुमन फ्रेंडली

एक महीने पहले
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तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में सफल और करोड़पति आंत्रप्रेन्योर महिलाओं को ढूंढ़ने निकलो तो लगता है कि यहां का निजाम महिलाएं ही चला रही हैं। दशकों से पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दौर देखा गया है, पर राजनीति में महिलाओं की मुखर आवाज भी उतनी ही पुरानी है। बंगाल में जब भी कोई आंदोलन छिड़ा है, महिलाएं सामने आई हैं।

देश में पेशेवर कामकाजी महिलाओं की भागीदारी भले ही नाममात्र की हो, लेकिन बेंगलुरु शहर की वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी 39% है, जो देश के किसी अन्य शहर की तुलना में सबसे अधिक है। केरल की स्वस्थ तस्वीर और खासतौर पर यहां महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य की जड़ें, समय में कहीं बहुत पहले गहराई में दबी दिखती हैं। इसकी असली वजह यहां के सामाजिक आंदोलन रहे हैं। सोच और संस्कृति में बदलाव की 4 ग्राउंड रिपोर्ट पढ़ें ...

हैदराबाद में महिलाओं के काम करने को लेकर खुला माहौल, लगता है यहां का निजाम महिलाएं ही चलाती हैं

हैदराबाद के पॉश इलाके जुबली हिल्स के शानदार बंगले के अपने ड्राॅइंगरूम में बैठी आंत्रप्रेन्योर राधा रानी ठोक बजाकर बोलती हैं ‘वो जो आप कई साल पहले एसटीडी बूथ पर फोन करते थे और उसका बिल आया करता था न, वो बिलिंग मशीनें मेरी थी, सिक्का डालकर जो आप फोन करते थे वो मेरे थे, देश में ज्यादातर मीटर और स्वाइप मशीनें और बायोमीट्रिक मेरी कंपनी की डिजाइन की हुई हैं।’

तेलंगाना की राजधानी और निजाम के शहर हैदराबाद में सफल और करोड़पति आंत्रप्रेन्योर कोई एक राधारानी नहीं है, बल्कि यहां आंत्रप्रेन्योर महिलाओं को ढूंढ़ने और बात करने निकलो तो लगता है कि यहां का निजाम महिलाएं ही चला रही हैं। सूई, सिलाई, चूड़ी से लेकर शिप, हवाई जहाज, एग्रो प्रोडक्ट्स तक के पुर्जे औरतें बना रही हैं, डिजाइन कर रही हैं, बेच रही हैं।

हाल ही में 100 अमीर और सफल महिला आंत्रप्रेन्योर की रिपोर्ट आई है जिसमें सबसे ज्यादा 14 महिलाएं आंध्र प्रदेश-तेलंगाना से हैं और इनमें भी 11 हैदराबाद से हैं। आखिर ऐसा क्या है हैदराबाद में कि देशभर में यहां सबसे रईस और तादाद में सबसे ज्यादा आंत्रप्रेन्योर महिलाएं हैं। पहली बात कि तेलंगाना देश का पहला राज्य है जहां महिला आंत्रप्रेन्योर को विकसित करने और उन्हें मौके देने के लिए अलग से इंक्यूबेशन सेंटर ‘वी हब’ की स्थापना की गई।

सरकार ने सिर्फ महिला आंत्रप्रेन्योर के लिए बाकायदा अलग से विभाग बनाया। हैदराबाद में बिजनेस वुमन के मुद्दे पर वी हब की सीईओ दीप्ती रावुला बताती हैं कि इसकी कई वजहें हैं जैसे ‘तेलगु समुदाय में हमेशा से औरतों को घर के फैसलों में शामिल किया जाता है, उनकी एजुकेशन और जॉब को लेकर उन्हें बराबरी का दर्जा है। हैदराबाद की सोसाइटी औरतों के काम करने को लेकर ओपन है, सुरक्षित है।

यहां परंपरागत और कॉस्मोपॉलिटिन कल्चर का मिश्रण है। यहां आईटी, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ज्वेलरी, रीयल इस्टेट, डिफेंस, एग्रो लाइफ साइंस और ढेरों रिसर्च इंस्टीटयूट्स हैं जिनसे संबंधित इंजीनियरिंग, पोस्ट ग्रेजुएशन करना यहां लड़कियों के लिए आम बात है।’ वी हब में उन महिला आंत्रप्रन्योर के बैठने की व्यवस्था है जिनके पास ऑफिस नहीं है। कुर्सी, टेबल, कंप्यूटर और इंटरनेट के 5,000 रुपए महीने में यहां ऑफिस बनाकर बैठा जा सकता है।

फिलहाल यहां 80 महिला आंत्रप्रन्योर बैठती हैं। वी हब के मौजूदा प्रोग्राम से फिलहाल 3500 महिलाएं जुड़ी हैं। वी हब इन महिलाओं की ओर से इनके प्रोडक्ट के लिए नेटवर्किंग, मार्केटिंग और कैपिटल के लिए काम करता है। यहां का ऑफिस इस्तेमाल करने वाली कोमल बताती हैं कि वह देश की पहली महिला हैं जो वीगन कंडोम बनाती हैं। क्योंकि केमिकली ल्यूब्रीकेटिड कंडोम महिलाओं के लिए खतरनाक हैं। दो साल पहले ही कोमल ने इस बिजनेस को शुरू किया है और पूरे देश में उनके डीलर हैं।

निर्मल जिले की रहने वाली उज्मा बेगम हैदराबादी चूड़ियां बनाती हैं। अब वह महीने में तीन लाख रुपए तक कमा रही हैं। चूड़ियों की हाईटेक डिजाइनिंग और शहरों से ऑर्डर दिलवाने में वी हब ने मदद की। करोड़ों के टर्नओवर की इन्नोमेट मैटीरियल एडवांस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चलाने वाली सरिता चिलाकपति बताती हैं, कॉस्मोपॉलिटिन सिटी होने की वजह से तकनीकी और टैलेंटेड वर्कफोर्स की कमी नहीं।

शहर का ईको सिस्टम ऐसा है कि औरतों को काम करने का माहौल देता है। 20 हजार करोड़ रुपए की टर्नओवर की एग्रोप्रोडक्ट कंपनी चलाने वाली नेहा रेड्डी का कहना है कि 40 साल पहले उनकी सास ने यह कंपनी शुरू की थी। सास-बहू इसे चलाती हैं। नेहा की सास ने सुधा रेड्डी जो कंपनी की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, माइक्रोबायलॉजी में एमएससी हैं।

नेहा के अनुसार हैदराबाद में बायो टेक्नोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, केमिस्ट्री और बायोटेक जैसी एडवांस पढ़ाई करने वाली लड़कियों की तादाद बहुत है। शहर का मिजाज इंटरप्राइसिंग है। हैदराबाद में सरकार ने ऐलिप नाम से एक इंडस्ट्रियल एरिया डेवलप किया है जहां सिर्फ महिलाओं को ही जमीन दी जाती है। नेहा की कंपनी इसी इलाके में है।

वी हब हो या ऐलिप सरकार यह सुनिश्चित करती है कि अगर बिजनेस औरतें कर रही हैं तो औरतें ही करेंगी। इसके लिए महिला आंत्रप्रन्योर्स को मुश्किल इंटरव्यू से गुजरना पड़ता है। तमाम सवालों के जवाब देने पड़ते हैं। इन सबसे इतर बात करें तो महिलाओं को आंत्रप्रन्योर बनाने में फिक्की के हैदराबाद चैप्टर की चेयरपर्सन उषा मान्ने का बड़ा योगदान है।

फिक्की की तरफ से आईआईटी हैदराबाद के साथ एमओयू साइन किया गया है, जिसमें आईआईटी महिलाओं को डिजिटल कपड़ों और ज्वेलरी के नए-नए डिजाइन की ट्रेनिंग दे रहे हैं। इसी तरह फिक्की का इंडियन इंस्टीटयूशन ऑफ इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी के साथ भी एक एमओयू है जिसमें वह स्टार्टअप्स को डेटा, डिजिटल मार्केटिंग की ट्रेनिंग दी जाती है।

देश में किसी एक राज्य से सबसे ज्यादा 11 महिला सांसद पश्चिम बंगाल से, 9 टीएमसी और 2 भाजपा से

दशकों से पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दौर देखा गया है, पर राजनीति में महिलाओं की मुखर आवाज भी उतनी ही पुरानी है। जाग्योसेनी मंडल भी उन आवाजों में से एक हैं। उनके मुताबिक जब कभी भी बंगाल में कोई आंदोलन छिड़ा है, महिलाएं सामने आई हैं। यह तथ्य स्वतंत्रता आंदोलन से नक्सल मूवमेंट तक कायम रहा है और आज भी है। समाजशास्त्री सुस्मिता बनर्जी के मुताबिक इसके पीछे मूल कारण यहां की संस्कृति है, जो महिलाओं को चहारदीवारी के बाहर भी सक्रिय रहने और निर्णय लेने की आजादी देता है।

पश्चिम बंगाल इस वक्त देश का एकमात्र राज्य है जहां महिला मुख्यमंत्री है। 40 सीटों वाले इस राज्य में 11 महिला सांसद दिल्ली पहुंची हैं। यह किसी भी राज्य में महिला सांसदों की सबसे अधिक तादाद है। इनमें से 9 ममता की पार्टी टीएमसी और दो भाजपा से हैं। टीएमसी सांसद माला राय इसका श्रेय दीदी को देते हुए कहती हैं कि पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद दीदी ने 2011 में पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया। इससे महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा हुआ है।

चुनाव आयोग के मुताबिक बंगाल के कुल 7.32 करोड़ वोटर में 3.59 करोड़ (49.01%) महिला वोटर हैं। 1000 पुरुषों में 961 महिलाएं हैं।
चुनाव आयोग के मुताबिक बंगाल के कुल 7.32 करोड़ वोटर में 3.59 करोड़ (49.01%) महिला वोटर हैं। 1000 पुरुषों में 961 महिलाएं हैं।

भाजपा की राज्यसभा सांसद रूपा गांगुली कहती हैं कि बंगाल नारी शक्ति को जीता है। यहां जेंडर के आधार पर भेदभाव बिल्कुल नहीं है। कांग्रेस की महिला नेता कृष्णा देबनात कहती हैं, कि बंगाल शिक्षा और संस्कृति के लिए जाना जाता है, यहां की महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर भी सजग है।

चुनाव आयोग के मुताबिक बंगाल के कुल 7.32 करोड़ वोटर में 3.59 करोड़ (49.01%) महिला वोटर हैं। 1000 पुरुषों में 961 महिलाएं हैं। बीते दो विधानसभा चुनावों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक वोट डाला है। 2011 में 84.45% महिलाओं ने वोट डाला, जबकि पुरुष वोटिंग 84.22% रही। इसी तरह 2016 में 83.13% महिलाओं ने वोट डाला। उनकी तुलना में 82.23% पुरुष ही पोलिंग बूथ तक पहुंचे।

बेंगलुरु के वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी 39%, देश के बाकी शहरों की तुलना में सबसे अधिक

देश में पेशेवर कामकाजी महिलाओं की भागीदारी भले ही नाममात्र की हो, लेकिन बेंगलुरु इस क्षेत्र में लंबा सफर तय कर चुका है। सरकारी आंकड़े देखें तो बेंगलुरु की वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी 39% है, जो देश के किसी अन्य शहर की तुलना में सबसे अधिक है। इंडिया स्किल रिपोर्ट 2021 में नौकरी के लिए महिलाओं का सबसे पसंदीदा शहर बेंगलुरु है।

ये जानना दिलचस्प है कि आखिर नौकरी के लिए बेंगलुरु महिलाओं को क्यों आकर्षित कर रहा है। इंडिया स्किल रिपोर्ट को तैयार करने में मुख्य सहयोगी संस्था व्हीबोक्स की हेड ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टीज श्वेता झा बताती हैं, इसकी कई वजहें हैं। खासतौर पर शहर की कॉस्मोपॉलिटिन संस्कृति। कर्नाटक इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा का हब है। देशभर के युवा लड़के और लड़कियां यहां आते हैं।

बाद में नौकरी करने को लेकर भी बेंगलुरु उनकी पहली पसंद बन जाता है। बेहतर ट्रांसपोर्ट, बराबरी के मौके, ग्लोबल एक्स्पोजर, आईटी सेक्टर में ऑनसाइट काम करने के मौके, निजी स्पेस, सिंगल, कामकाजी लड़कियों के लिए बेहतरीन और सुरक्षित सोसायटी में रेंट पर फ्लैट की सुविधा, जेंडर भेद को लेकर बनती बेहतर समझ, ये सब वो बड़े कारण हैं जो महिलाओं और लड़कियों को इस शहर की ओर आकर्षित कर रहे हैं।

जनप्रिया इंजीनियर्स सिंडिकेट बिल्डर्स एंड डेवलपर्स लिमिटेड के सीओओ एंड ग्रुप सीएचआरओ नटराजन कहते हैं, यहां का पूरा कॉर्पोरेट माहौल ही जेंडर इन्क्लूसिव है। आमतौर पर जेंडर को लेकर यहां भेदभाव नहीं है। कंपनियों में डायवर्सिटी का अनुपात बेहतर तरीके से लागू नजर आता है।

महिलाओं की काबलियत उनकी ईमानदारी और दक्षता के आंकड़ों को देखते हुए मेरी इंडस्ट्री जो बिल्डर्स एंड डेवलपर्स की है वहां भी हम वेलफेयर, एचआर, अकाउंट, फाइनेंस और डिजाइन के आलावा साइट इंजीनियर के तौर पर भी नियुक्त कर रहे हैं और हमने ये पाया है कि इंजीनियरिंग, डिजाइन में अनियमितता और भ्रष्टाचार बिल्कुल नहीं देखा जा रहा है वो सीमेंट, बालू की चोरी जैसा भ्रष्टाचार नहीं करतीं हैं।

आंकड़ों की नजर से देखें तो यूरोप में 18% और अमरीका में 24-25% महिलाएं आईटी सेक्टर में हैं, जबकि भारतीय आईटी सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी 34% है। -सिम्बॉलिक इमेज
आंकड़ों की नजर से देखें तो यूरोप में 18% और अमरीका में 24-25% महिलाएं आईटी सेक्टर में हैं, जबकि भारतीय आईटी सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी 34% है। -सिम्बॉलिक इमेज

सिल्वर क्रेस्ट क्लोदिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बतौर जीएम एचआर एंड एडमिन कार्यरत गायत्री एच पी कहती हैं कि वो नाॅर्थ कर्नाटक के रायचुर से आती हैं और पिछले 20 साल से बेंगलुरु में रह रही हैं। वो कहती हैं हमें यहां स्पेस मिला है, लोग आपकी जिंदगी में ताक-झांक नहीं करते। कंपनियों की पॉलिसी महिलाओं के अनुकूल हैं। डायवर्सिटी को लेकर जागरूकता है और ईमानदारी है। गायत्री के बेटे ने हाल ही में इन्फोसिस ज्वाइन किया है। इंफोसिस में बोर्ड स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी 33% है और वैश्विक स्तर पर उनकी भागीदारी 36% तक है।

पीपलस्ट्रांग की ब्रांडिंग एंड कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन मैनेजर एलिम कहती हैं कि आमतौर पर ये ट्रेंड नोटिस हुआ कि सिटी ऑप्शन में बेंगलुरु होने पर 95 प्रतिशत मामलों में ज्वाइनिंग हुई जो किसी भी अन्य शहर की तुलना में सबसे अधिक है। ‘विमेन इन डेटा सांइस’ नामक नेटवर्क का संचालन करने वाली ऊषा रंगराजू के मुताबिक अंतरिक्ष- विज्ञान और तकनीक से लेकर ऑटोमोबाइल, मशीन लर्निंग, डेटा माइनिंग और डिफेंस जैसे क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी के जरिए महिलाएं अपनी पैठ बना रही हैं।

आंकड़ों की नजर से देखें तो यूरोप में 18% और अमरीका में 24-25% महिलाएं आईटी सेक्टर में हैं, जबकि भारतीय आईटी सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी 34% है। इनमें ज्यादातर बेंगलुरु में ही रहकर अपने सपनों को आकार दे रही हैं। आकांक्षा पटना से हैं और पिछले एक साल से बेंगलुरु में बतौर सिस्टम एनालिस्ट काम करती हैं। अब तक वो पटना और भुवनेश्वर में रह चुकी हैं लेकिन बेंगलुरु के अपने अनुभव के बारे में कहती हैं कि ये शहर खास है। मेरे साथ मेरे माता-पिता को भी मेरे यहां होने से मेरी सुरक्षा के प्रति निश्चिंतता होती है।

अनुमेहा और सोनल एक पॉश सोसायटी के शेयरिंग फ्लैट में रहती हैं और पिछले आठ साल से बेंगलुरु में हैं। अनुमेहा विशाखापत्तनम की है और सोनल दिल्ली की हैं, लेकिन बेंगलुरु उन्हें इसलिए खास लगता है कि आपके निजी स्पेस में यहां कोई दखल अंदाजी नहीं है। साथ ही जरूरत पड़ने पर आप लोगों को ज्वाइन भी कर सकते हैं जैसे अनुमेहा और सोनल की दोस्त रिद्धि जो दिल्ली से हैं सोसायटी के हर फंक्शन का हिस्सा बन जाती है। तीनों लड़कियां मिलकर तीन बेडरूम के फ्लैट का रेंट 45 हजार रुपए देती हैं और अन्य खर्च भी करती हैं, बेंगलुरु को नो नॉनसेंस वाला और अवसरों का शहर कहती हैं।

मैनेजमेंट और ह्यूमन रिसोर्स कंसल्टिंग फर्म ओडिस इन कॉर्पोरेशन के को फाउंडर और सीओओ दीपक कहते हैं बेंगलुरु में सुरक्षा और जेंडर को लेकर समाज और कंपनियों में कुछ संवेशनशीलता हैं जिससे बड़ा फर्क आता है, बोर्ड लेवल पर उनकी मौजूदगी है। आठ-दस सदस्यीय बोर्ड में 1-2 महिलाएं शामिल होती ही हैं।

बेंगलुरु की ये बातें कामकाजी महिलाओं को लुभाती हैं

  • एनसीआरबी के मुताबिक 2019 में दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ 12902 अपराध हुए वहीं मुंबई में 6519 और बेंगलुरु में 3486 केस हुए।
  • बेंगलुरु में 62% से अधिक लोग अप्रवासी हैं, इसके कारण संस्कृति विविधतापूर्ण है।
  • बेंगलुरु सैलरी के लिहाज से भी बेहतर शहर है। रैंडस्टैड इनसाइट्स सैलरी ट्रेंड्स रिपोर्ट 2019 के अनुसार बेंगलुरु निम्न आय वर्ग, मध्यम आय वर्ग और उच्च आयवर्ग यानी सभी तीन स्तरों के लिए उच्चतम वेतन प्रदान करता है।
  • जूनियर कर्मचारी की औसत सीटीसी 5.27 लाख, मिड लेवल कर्मचारी की 16.45 लाख और सीनियर्स की 35.45 लाख सालाना है।

केरल में नारी स्वास्थ्य देश के बाकी राज्यों की तुलना में सबसे बेहतर, क्योंकि सामाजिक ताने-बाने में महिला की सेहत अहम

भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण का पहला मामला केरल में आया। उस वक्त देश के पहले आइसोलेशन वार्ड्स में से एक में बुजुर्ग कोरोना मरीजों की सेवा करने वाली और खुद बीमारी की चपेट आने वाली नर्स रेशमा मोहनदास आज यहां महामारी की दूसरी लहर में भी फ्रंटलाइन पर डटी हुई हैं। रेशमा और उनके जैसी लाखों नर्सें केरल का वो चेहरा हैं, जिसे आमतौर पर लोग राज्य के बेहतर स्वास्थ्य ढांचे का कारण मानते हैं।

मगर राज्य की स्वस्थ तस्वीर और खासतौर पर यहां महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य की जड़ें, समय में कहीं बहुत पहले गहराई में दबी दिखती हैं। पब्लिक हेल्थ के विशेषज्ञ डॉ. एसएस लाल कहते हैं कि केरल में महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य का श्रेय यहां के सभी राजनीतिक दल लेना चाहते हैं, लेकिन इसकी असली वजह यहां के सामाजिक आंदोलन रहे हैं। यहां समाज और खास तौर पर महिलाएं स्वास्थ्य सुधारों के प्रति सजग हैं।

केरल में ग्रास रूट लेवल पर भी महिलाएं ही महिलाओं का स्वास्थ्य मॉनीटर करती हैं। आशा वर्कर्स मोहल्लों-गांवों में घर-घर जाकर महिलाओं की सेहत का हिसाब रखती हैं।
केरल में ग्रास रूट लेवल पर भी महिलाएं ही महिलाओं का स्वास्थ्य मॉनीटर करती हैं। आशा वर्कर्स मोहल्लों-गांवों में घर-घर जाकर महिलाओं की सेहत का हिसाब रखती हैं।

आज भी परिवार में दादियां ही सबके स्वास्थ्य की खबर रखती हैं। उनकी मदद के लिए दूर-दराज इलाकों तक फैला पब्लिक हेल्थ का ताना-बाना है जिसमें 6000 डॉक्टरों समेत 15000 हेल्थ वर्कर हैं। मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा रहे त्रावणकोर, कोच्चि और कोझिकोड रियासतों को मिलाकर आज का केरल बना है। रियासत काल से ही यहां के सामाजिक ताने-बाने में महिला स्वास्थ्य एक अहम हिस्सा रहा है।

1950 के दशक में केरल पहला राज्य था जिसने लॉन्च होने के साथ ही परिवार नियोजन कार्यक्रम को गंभीरता से लागू किया था। 1950 से 1961 के बीच छोटे से राज्य में 70 परिवार नियोजन केंद्र खुल चुके थे और इनमें से 53 में नसबंदी की सुविधा मौजूद थी। 1970 से 1973 के बीच यहां महिलाओं ने खुद आगे आकर सामूहिक नसबंदी कैंपों में हिस्सा लिया। आज संतानों की संख्या और पहले प्रसव की उम्र के मामले में केरल बाकी राज्यों से कहीं बेहतर है।

रियासतों के समय से ही महिलाओं की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य के प्रति सजगता दिखी है। तिरुवनंतपुरम स्थित सेंटर फॉर डेवलपमेंटल स्टडीज की सीनियर प्रोफेसर व शोधकर्ता जे. देविका कहती हैं कि यहां शुरू से ही शहरों के समानांतर तालुक और पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य ढांचा खड़ा किया गया है। 1996 में संविधान संशोधन के बाद जब विकेंद्रीकरण की नीति अपनाई गई तो केरल ने इसे भी गंभीरता से लागू किया।

यहां जनता और खासतौर पर महिलाओं की भूमिका प्रशासन, राजनीति और नीति निर्धारण में बढ़ गई। उसी दौर के बदलाव का असर है कि आज राज्य के स्वास्थ्य बजट का एक तिहाई हिस्सा स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों को जाता है। नतीजा ये कि केरल में लगभग शत-प्रतिशत प्रसव संस्थागत होते हैं। नवजात मृत्यु दर व प्रसूता मृत्यु दर कम रहती है।

राज्य के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी डॉ. मोहम्मद अशील गर्व से कहते हैं कि राज्य के हर कोने में हर महिला स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ले सकती है। पब्लिक हेल्थ कार्यकर्ता वी. रमन कुट्‌टी कहते हैं कि खराब आर्थिक स्थिति और बढ़ती बेरोजगारी और राज्य की 12.6% आबादी बुजुर्गों की होने के बावजूद पिछले 60 साल से लगातार नवजात व शिशु मृत्यु दर, जन्म दर, जीवन प्रत्याशा, लिंगानुपात और प्रसूता मृत्यु दर जैसे हेल्थ इंडिकेटर्स में केरल का प्रदर्शन देश में सबसे अच्छा रहा है।

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