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पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले का अपनी किताब में खुलासा:भारत से 1527 दौर की वार्ता करने वाले चीनी प्रतिनिधि कहावतों में कूटभाषा बोलते हैं, आपस में तेज-तेज बोल धमकाते हैं

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मुकेश कौशिक
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पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने पद से रिटायर होने के बाद अपनी पहली पुस्तक ‘द लॉन्ग गेम: हाउ द चाइनीज़ नेगोशिएट विद इंडिया’ में कई खुलासे किए हैं। - Dainik Bhaskar
पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने पद से रिटायर होने के बाद अपनी पहली पुस्तक ‘द लॉन्ग गेम: हाउ द चाइनीज़ नेगोशिएट विद इंडिया’ में कई खुलासे किए हैं।

लद्दाख में 16 महीने से चली आ रही सैन्य तनातनी खत्म करने को लेकर कई स्तरों पर वार्ताओं के 1527 दौर हो चुके हैं। ये बैठकें 20 घंटे तक भी खिंची हैं। फिर भी नतीजा यह है कि पूर्वी लद्दाख में दो मोर्चों पर टकराव की स्थिति है। चीन के साथ होने वाली बातचीत लंबी क्यों खिंचती है और नतीजे जल्दी क्यों नहीं सामने आते...इस बारे में दिलचस्प खुलासे हुए हैं। चीनी मामलों को नजदीक से देख चुके पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने पद से रिटायर होने के बाद अपनी पहली पुस्तक ‘द लॉन्ग गेम: हाउ द चाइनीज़ नेगोशिएट विद इंडिया’ में चीनी वार्ताकारों के हथकंडों का कच्चा चिट्ठा सामने रखा है।

गोखले ने शुरुआत 1949 से की है जब भारत ने चीन को मान्यता दी थी और फिर भारत के परमाणु विस्फोट, आतंकी मौलाना मसूद अजहर को यूएन की काली सूची में डालने को लेकर 10 साल चली बातचीत के अनुभवों से चीनी वार्ताकारों की हर चाल को बारीकी से पेश किया है।

जानिए क्या हैं चीन के हथकंडे

  • बातचीत का स्थान खुद तय करते हैं। वार्ता का एजेंडा अपने मीडिया को लीक कर उस पर भारत की राय जांचते हैं।
  • आरोपों की झड़ी लगाना। वार्ताकारों को कहना कि आप हल नहीं चाहते, अड़ियल हैं। अगर वार्ता बेनतीजा रही तो जिम्मा आपका।
  • वार्ता शुरू होने से पहले शर्तें थोपना। मसूद अजहर के मामले में वे जोर देते रहे कि भारत पहले पाकिस्तान से बात करे।
  • प्रतिनिधिमंडल में सिर्फ एक बोलता है, बाकी चुप रहते हैं। चीनी कहावतों में साथियों से कूट भाषा में बात करते हैं।
  • कुछ हिंदी जानकर भी अनजान बनते हैं। भारतीय जब आपस में हिंदी में बात करते हैं तो सारी बातें नोट करते जाते हैं।
  • आपस में तेज-तेज बोलकर सामने वालों को धमकाते हैं। वार्ता की मेज पर फैसला नहीं लेते। अपने पहले से तय एजेंडे पर अड़े रहते हैं।
  • वार्ता में पहले सिद्धांत तय करने पर जोर देते हैं। फिर खुद ही इन सिद्धांतों से मुकर जाते हैं। लेकिन, सामने वाले को उसी दायरे में रखते हैं।
  • बातचीत के दौरान कभी भी चुप्पी साध सामने वाले को बार-बार बोलने का अवसर देते हैं। मन मुताबिक बात हो तब भी ऐसा दिखाते हैं, जैसे उन्हें कुछ मंजूर नहीं है।

पर्दे के पीछे इनका काम

सेंट्रल फॉरेन अफेयर्स कमिशन: वार्ता के नतीजे तय करता है। सीधे राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मातहत है।
एमएसएस: स्टेट सिक्योरिटी मंत्रालय
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