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मद्रास हाईकोर्ट के कमेंट पर सुनवाई:EC की सफाई- हम चुनाव करवाते हैं, सरकार हाथ में नहीं लेते; सुप्रीम कोर्ट बोला- HC की टिप्पणियों को कड़वी दवाई के तौर पर लें

नई दिल्ली11 दिन पहले

मद्रास हाईकोर्ट की बेंच ने देश में कोरोना की दूसरी लहर के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि आयोग के अधिकारियों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज किया जाना चाहिए।चुनावी राज्यों में संक्रमण की तेज रफ्तार पर मद्रास हाईकोर्ट के इस कमेंट के खिलाफ चुनाव आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अपनी सफाई पेश की।

हाईकोर्ट की टिप्पणियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि हम चुनाव करवाते हैं, सरकार अपने हाथ में नहीं लेते। अगर दूर इलाके में प्रधानमंत्री 2 लाख लोगों की रैली कर रहे हों तो आयोग भीड़ पर गोली नहीं चलवा सकता। इसे देखना आपदा प्रबंधन विभाग का काम है। मीडिया को भी ऐसी टिप्पणियों की रिपोर्टिंग से रोका जाना चाहिए।

इस पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने कहा कि मीडिया को जजों की मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करने से नहीं रोका जा सकता। जजों की टिप्पणियां न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं। इनकी भी उतनी ही अहमियत होती है जितनी कोर्ट के औपचारिक आदेश की। कोर्ट ने आयोग को नसीहत देते हुए कहा कि आप हाईकोर्ट की टिप्पणियों को वैसे ही लीजिए जैसे डाक्टर की कड़वी दवाई को लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

हालांकि मद्रास हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग ने वोटों की गिनती के बाद विजय जुलूसों पर रोक लगा दी थी। रविवार को नतीजों के बाद पार्टी कार्यालयों और मतगणना केंद्रों के बाहर लगी भीड़ पर भी चुनाव आयोग ने कहा था कि इन्हें रोकने में नाकाम रहे पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जज घर से सोचकर नहीं आते कि कोर्ट में क्या बोलना है
चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि हत्या का आरोप अनुचित है। जज को अपने फैसले में लिखना चाहिए कि टिप्पणी का क्या अर्थ है? जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हम आपकी बात समझते हैं। लेकिन हम हाईकोर्ट के जजों को निराश नहीं करना चाहते। ऐसा नहीं है कि जज घर से सोचकर आते हैं क्या बोलना है। संवैधानिक संस्था के रूप में हम चुनाव आयोग का सम्मान करते हैं।

जनता का सवाल : भीड़ पर गोलियां नहीं चलवानी थी, रैलियों पर प्रतिबंध लगाना था, यह किसका काम है?

  • आयोग का कहना है कि रैलियों में भीड़ देखना आपदा प्रबंधन का काम है। लेकिन कोविड प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर नोटिस लेना आयोग का ही काम है।
  • आखिरी फेज में बड़े नेताओं ने रैलियां न करने का फैसला लिया। रैलियां पहले ही बंद हो जातीं तो स्थिति बेहतर होती।
  • 2 मार्च को चुनाव के पहले नोटिफिकेशन से 2 मई के नतीजों तक चुनावी राज्यों में रोज कोरोना के नए केस 150 गुना तक बढ़ गए।
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