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घर खरीद पर पूरे देश में होगा एक करार:बिल्डर-खरीदार करार की शर्तें हर राज्य में अलग हैं, इन्हें एक जैसा करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी

नई दिल्ली9 दिन पहले
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सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्वनी उपाध्याय ने बताया कि लगातार ऐसे केस आ रहे हैं कि बिल्डर की मनमानी के आगे खरीदार बेबस हैं। कोर्ट में पता चलता है कि एग्रीमेंट ही बहुत जटिल बना है। (प्रतीकात्मक फोटो) - Dainik Bhaskar
सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्वनी उपाध्याय ने बताया कि लगातार ऐसे केस आ रहे हैं कि बिल्डर की मनमानी के आगे खरीदार बेबस हैं। कोर्ट में पता चलता है कि एग्रीमेंट ही बहुत जटिल बना है। (प्रतीकात्मक फोटो)

देशभर में घर खरीदारों और बिल्डरों के बीच करारनामे का एक समान प्रारूप लागू करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए राजी हो गया है। चीफ जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने सोमवार को कहा- ‘20 राज्यों में करार की शर्तें अलग-अलग हैं। हमें देखना होगा कि केंद्र सरकार कोई मॉडल बना सकती है या नहीं?’ सुप्रीम कोर्ट में बेंगलुरू के वेस्टएंड हाइट्स (डीएलएफ) के 62 फ्लैट खरीदारों ने याचिका दायर की है।

उन्होंने रेरा अधिनियम और संविधान के आर्टिकल 14 और 21 की भावना के अनुरूप निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्यों में एक समान ‘बिल्डर-बायर एग्रीमेंट’ लागू करने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं की वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि विभिन्न राज्यों में करारनामों में बहुत असमानताएं हैं। ऐसे में हम बिल्डर कंपनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को आगे नहीं बढ़ा पाते। इसलिए, करारनामे की शर्तें पूरे देश में एक समान और न्यायसंगत होनी चाहिए। चीफ जस्टिस बोबड़े ने कहा- ‘हम इस मुद्दे को देंखेंगे। एक हफ्ते बाद सुनवाई करेंगे।’

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एक जैसे मॉडल की जरूरत क्यों पड़ी?
हर राज्य में करार की शर्तें अलग-अलग हैं। कहीं 20 पेज का तो कहीं 12 पेज का करारनामा बनता है। यह अभी बहुत जटिल होता है, जिसे पूरा पढ़ने के बावजूद उसके कानूनी पेंच समझना आम लोगों के लिए लगभग नामुमकिन है। इसी का फायदा उठाकर कुछ बिल्डर एग्रीमेंट में मनमानी शर्तें जोड़ देते हैं, जिसके असल मायने खरीदार को बाद में पता चलते हैं। करारनामा सिर्फ 2 पेज का भी हो सकता है। अंग्रेजी के बजाय स्थानीय भाषा में हो तो ठीक रहेगा।

राज्यों के करारनामों में कितना अंतर?
बहुत ज्यादा। राज्यों ने अपने-अपने नियम बना रखे हैं। हमारे पास लगातार ऐसे केस आ रहे हैं कि बिल्डर की मनमानी के आगे खरीदार बेबस हैं। कोर्ट में पता चलता है कि एग्रीमेंट ही बहुत जटिल बना है।

किस-किस तरह की गड़बड़ियां हैं?
उदाहरण के लिए ज्यादातर राज्यों में बिल्डर एग्रीमेंट में यह शर्त भी जुड़वा देते हैं कि अगर फ्लैट की किस्त का चेक बाउंस हुआ तो खरीदार को 12% से 18% तक ब्याज हर्जाने के रूप में देना होगा। जबकि, इस बात का जिक्र कहीं नहीं होता कि अगर पजेशन 3 के बजाय 5 साल में दिया तो बिल्डर को भी खरीदार से वसूली रकम पर इतना ही ब्याज देना होगा।

एक जैसे एग्रीमेंट में क्या होना चाहिए?
जैसे अभी समय पर फ्लैट का पजेशन नहीं देने पर बिल्डर पर कार्रवाई या जुर्माने का कड़ा प्रावधान नहीं है। अगर किसी बिल्डर ने इटालियन टाइल्स, स्वीमिंग पूल इत्यादि का जिक्र किया है और उसे वो पूरा नहीं करता तो उस पर कार्रवाई का नियम एग्रीमेंट में दर्ज नहीं होता। ऐसी कई बातें हैं, जो एग्रीमेंट में जोड़नी जरूरी हैं।

एक मॉडल से कैसे फायदा होगा?
अगर खरीदार भुगतान में देरी करता है या बिल्डर समय पर पजेशन नहीं देता तो दोनों ही पक्षों पर एक बराबर जुर्माना लगना चाहिए। बिल्डर हवा-हवाई वादे नहीं कर पाएंगे। उदाहरण के तौर पर कई बिल्डर फ्लैट में फाइव स्टार सुविधाएं देने की बात करते हैं, लेकिन ऐसा होता कुछ नहीं।

एक समान मॉडल कैसे बन सकता है?
नया खाका केंद्र को तय करना चाहिए, तभी राज्यों में एक साथ लागू हो सकेगा। यह कम से कम पेज में और स्थानीय भाषा में होना चाहिए।

एक जैसा मॉडल संभव, इससे खरीदार सुरक्षित हो सकेंगे
उत्तर प्रदेश के रेरा प्रमुख राजीव कुमार ने बताया कि अभी जो समस्या है, वह रेरा के गठन के समय निर्माणाधीन प्रोजेक्ट या पहले के प्रोजेक्ट की है। एक मॉडल से खरीदारों के हित सुरक्षित रहेंगे। वहीं, क्रेडाई के चेयरमैन जक्षय शाह ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में प्राेजेक्ट की मंजूरी आदि में काफी समय लगता है। रेरा के ट्रैक रिकॉर्ड को देखकर एक जैसा मॉडल बनता है तो हमें कोई समस्या नहीं है।’

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