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शिक्षण संस्थाओं पर कसेगा कानूनी शिकंजा!:सुप्रीम कोर्ट तय करेगा स्कूल-कॉलेजों पर उपभोक्ता कानून लागू होगा या नहीं, स्वीकार की छात्रों की याचिका

नई दिल्लीएक महीने पहले
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फाइल फोटो
  • यूनिवर्सिटी के खिलाफ छात्रों की याचिका विचार के लिए मंजूर की गई

क्या शिक्षण संस्थान की सेवाओं में कमी के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत केस दायर हो सकता है, इसके कानूनी परीक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय पीठ ने तमिलनाडु की विनायक मिशन यूनिवर्सिटी के खिलाफ मनु सोलंकी और अन्य छात्रों की याचिका स्वीकार कर ली है। कोर्ट ने 15 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा था- ‘इस विषय पर अदालत के अलग-अलग विचार हैं।

जैसे- शिक्षण संस्थान उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के प्रावधानों के दायरे में होंगे या नहीं, इसलिए याचिका पर विचार जरूरी है।’ कोर्ट ने यूनिवर्सिटी से कहा कि वह राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसले के खिलाफ दायर इस याचिका पर छह सप्ताह में जवाब दे।

छात्रों का दावा: शैक्षणिक सत्र बर्बाद हुआ, इसलिए हर छात्र को 1.4 करोड़ मुआवजा दें
छात्रों ने कहा है कि संस्थान ने झूठे वादे कर दाखिले के लिए आकर्षित किया। बाद में पता चला कि डिग्रियां भारतीय चिकित्सा परिषद से मान्यता प्राप्त नहीं हैं। इसलिए सेवा में खामी, शैक्षणिक सत्र गंवाने और मानसिक प्रताड़ना के लिए हर छात्र को 1.4-1.4 करोड़ रु. मुआवजा दिया जाए।

यूनिवर्सिटी का तर्क- शिक्षा कोई वस्तु नहीं, न संस्थान किसी तरह की सेवा प्रदान करते हैं

विनायक मिशन यूनिवर्सिटी ने कोर्ट में कहा- शिक्षा कोई वस्तु नहीं है, न ही संस्थान किसी प्रकार की सेवा देते हैं। यह बात सुप्रीम कोर्ट ही अपने पहले के फैसलों में कह चुका है। इसलिए यह मामला उपभोक्ता फोरम में दायरे में नहीं आता। मुआवजे का सवाल ही पैदा नहीं होता।

शिक्षण संस्थान के खिलाफ छात्र या अभिभावक कहां शिकायत कर सकते हैं? क्या प्रावधान हैं? हाईकोर्ट और उपभोक्ता फोरम, दोनों ही जगहों पर केस दायर किए जाते रहे हैं। ज्यादा केस कोर्ट पहुंचते हैं या उपभोक्ता फोरम में? ऐसे 90% से ज्यादा केस हाईकोर्ट पहुंचते हैं। क्योंकि, हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार व्यापक हैं। उपभोक्ता फोरम की शक्तियां सीमित हैं। कोर्ट जाएं या उपभोक्ता फोरम, कैसे तय होता है? आर्थिक रूप से कमजोर छात्र अमूमन उपभोक्ता फोरम में ही शिकायत करते हैं। हाईकोर्ट में केस दायर करना काफी महंगा है। उपभोक्ता फोरम में बिना वकील के शिकायत होती है। समय और पैसा, दोनों ही कम लगते हैं। उदाहरण के लिए अगर गाजियाबाद के व्यक्ति को उपभोक्ता फोरम में केस करना है तो अपने शहर में कर सकता है, जबकि हाईकोर्ट में केस करने के लिए उसे लखनऊ या इलाहाबाद जाना पड़ता है। शिक्षण संस्थानों के खिलाफ शिकायत के संबंध में उपभोक्ता संरक्षण कानून में क्या व्यवस्था है? इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पक्ष और विपक्ष, दोनों तरह के फैसले दिए हैं। उदाहरण के लिए अनुपमा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग बनाम गुलशन कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शिक्षा कोई वस्तु नहीं है। इसलिए, संस्थानों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत नहीं लाया जा सकता। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने ही पी. श्रीनीवसुलु बनाम पीजे एलेक्जेेंडर मामले में कहा था कि शिक्षण संस्थान उपभोक्ता संरक्षण कानून के अधीन आते हैं। ऐसे ही कई मामलों की वजह से भ्रम की स्थिति है। इसलिए अब नई व्यवस्था होना जरूरी है। शिक्षण संस्थानों के उपभोक्ता कानून के दायरे में आने से क्या बदलेगा और कैसे? पहले उपभोक्ता फोरम की शक्तियां बढ़ानी होंगी। अभी फोरम आदेश का पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी का आदेश नहीं दे सकता। दूसरे क्षेत्र से संबंधित मामलों में आदेश का पालन नहीं होने पर फरियादी को हाईकोेर्ट ही जाना पड़ता है।

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