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गुजरात हाईकोर्ट का राज्य सरकार से सवाल:मामला नाम छिपाकर शादी करने और जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन कराने का है ही नहीं तो लव-जिहाद की धारा हटाने का विरोध क्यों?

अहमदाबाद3 महीने पहले
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गुजरात हाईकोर्ट की फाइल फोटो। - Dainik Bhaskar
गुजरात हाईकोर्ट की फाइल फोटो।

गुजरात उच्च न्यायालय ने बुधवार को राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि धर्म सुधार कानून के तहत किसी महिला के पति और ससुराल वालों के खिलाफ एफआईआर रद्द करने में क्या आपत्ति है? कोर्ट का कहना है कि पीड़िता ने दावा किया था कि प्राथमिकी सही नहीं थी और वह राज्य के पहले "लव जिहाद" मामले में अपने वैवाहिक जीवन को जारी रखना चाहती है, इसके बावजूद सरकार आपत्ति क्यों दर्ज करा रही है। इस मामले की अगली सुनवाई 20 सितंबर को होनी है।

लव-जिहाद का पहला मामला था
बता दें, गुजरात में 15 जून, 2021 से अमल में आए गुजरात धर्म स्‍वतंत्रता संशोधन कानून 2021 के तहत दर्ज हुआ यह पहला मामला था। वडोदरा की एक 25 वर्षीय युवती ने जून, 2021 में गौत्री पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसमें उसने जबर्दस्‍ती धमकी देकर फरवरी, 2021 में विवाह करने तथा धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगाया था।

याचिका में यह भी बताया गया था कि आरोपित ने अपना असली मुस्लिम नाम समीर कुरैशी छिपाकर सेम मार्टिन के नाम से इंटरनेट मीडिया पर उससे जान पहचान बढ़ाई और उसके अश्‍लील फोटो भी खींच लिए थे। बाद में उन्‍हें वायरल करने की धमकी देकर उसने युवती से विवाह कर लिया था। वडोदरा पुलिस ने इस मामले में कुरैशी को गिरफ्तार कर लिया था तथा जिला सत्र अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका भी ठुकरा दी थी।

महिला ने कहा - उसने ये आरोप लगाए ही नहीं
इस मामले में नया मोड़ एक महीने बाद ही आ गया था, जब शिकायतकर्ता महिला ने खुद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि उसके पति, ससुराल वालों व काजी पर लगाया गया आरोप गलत है। विवाह के लिए उस पर कोई दबाव नहीं डाला गया तथा धर्म परवर्तन के लिए भी कोई जबर्दस्‍ती नहीं की गई थी। इसलिए उसकी ओर से 17 जून, 2021 को दर्ज प्राथमिकी को रद कर दिया जाए।

वैवाहिक कलह के कुछ छोटे मुद्दों को सांप्रदायिक बना दिया गया
महिला ने अपनी याचिका में कहा है कि वह अपनी वैवाहिक कलह के कारण कुछ छोटे मुद्दों की रिपोर्ट कराने के लिए वडोदरा के गोत्री पुलिस स्टेशन गई थी। इसके बारे में उसका मानना था कि आईपीसी की धारा 498 ए के तहत कवर किया जा सकता है। याचिका में यह भी कहा गया था कि 'कुछ धार्मिक-राजनीतिक समूहों ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और लव जिहाद के कोण को लाकर इस मुद्दे को सांप्रदायिक बना दिया गया था। ऐसे तथ्य और अपराध जिनका याचिकाकर्ता महिला ने कभी भी उल्लेख या आरोप नहीं लगाया था, को प्राथमिकी में शामिल कर लिया गया था।'

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